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जरूरी है पेंशन बिल पर संसद की मंजूरी

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:05 PM IST

भारत के पेंशन बाजार में निजी खिलाड़ियों को भी इजाजत देने की पैरवी करने वाले ज्यादातर लोग वित्त मंत्री के इस बयान से जरूर खुश होंगे, जिसमें उन्होंने पेंशन नियामक से पूछा है कि क्या पेंशन कोष और नियामक विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) विधेयक पारित किये बगैर बाजार को खोला जा सकता है।


चूंकि यह विधेयक वामपंथी दलों के विरोध के कारण एक साल से भी ज्यादा से लटका हुआ है और सरकार के पास बहुमत नही हो सकता है, ऐसे में कोशिश सुधारों को गति देने की है। अगर ये कोशिश कामयाब हुई, तो करोड़ों भारतीय, अक्षम हो चुके कर्मचारी पेंशन कोष संगठन (ईपीएफओ) के भरोसे नही रहेंगे और अपना पेंशन फंड प्रबंधक चुनने की उम्मीद कर सकेंगे।

इतना ही नहीं, वे उस योजना का भी चुनाव कर सकेंगे, जिसमें वे निवेश करना चाहते हैं। लेकिन समस्या यह है कि संसद की मंजूरी के बगैर मौजूदा योजना के बुनियादी तत्वों में बदलाव करने से गलत नजीर कायम होगी। यह समझना जरूरी है कि पीएफआरडीए विधेयक में क्या प्रावधान हैं? इसमें पेंशन फंड नियामक को वैधानिक अधिकार दिए गए हैं।

यह नियामक फंड प्रबंधकों की तैनाती के बारे में नियम बनाएगा। इसका काम यह भी सुनिश्चित करना है कि फंड प्रबंधक नियमों का पालन करें। मसलन अगर कोई फंड प्रबंधक किन्ही खास कंपनियों में करोड़ों रुपये का निवेश करता है तो नियामक को ऐसे वैधानिक अधिकार हैं कि वह फंड प्रबंधक का लाइसेंस रद्द कर सकता है या जुर्माना लगा सकता है।

अगर पीएफआरडीए के पास कार्रवाई करने के अधिकार नही होते हैं, तो वह उसके साथ पेंशन फंड प्रबंधकों द्वारा किए गए करार के आधार पर कार्रवाई कर सकता है। लेकिन ऐसी किसी कार्रवाई को दीवानी अदालतों और प्रक्रियाओं के जरिये अमली जामा पहनाना होगा और इसमें सालों लग सकते हैं।

ऐसे में करोड़ों लोगों को जिंदगी भर की कमाई को फंड प्रबंधक के लिए सौंपने के लिए कहना, बेवकूफी ही नही, बल्कि खतरनाक भी होगा। संसद को दरकिनार करने की इच्छा का यह कोई पहला उदाहरण नही है। ऐसा पहले भी हुआ है। 1950 के आसपास योजना आयोग का गठन कार्यपालिका के आदेश से ही हुआ था। अब यही आयोग यह फैसला करता है कि किसी छोटे या बड़े राज्य की वार्षिक योजना कितनी होनी चाहिए।

कभी-कभी कानून इतना ढीला-ढाला होता है कि सरकार भी इसकी आड़ लेने से नहीं हिचकती। अब वर्ष 2003 के वित्तीय जवाबदेही और बजट प्रबंधन कानून को ही ले लीजिए। इस कानून का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी सरकार को अनाप शनाप खर्च करने की इजाजत नही दी जाए। इसमें वित्तीय संशोधन प्राप्त करने के लिए लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।

इतना ही नहीं अगर सरकार कानून के तहत निर्धारित राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पाने में नाकाम रहती है, तो उसे संसद में लिखित सफाई पेश करनी पड़ती है। ऐसे और भी कई उदाहरण  हैं, जिनमें सरकार ने संसद को दरकिनार करने की कोशिश की है। ठीक वैसे ही जैसे अदालतों की जांच परख से बचने के लिए कानून को न बताने की कोशिश की जाती है।

जहां इस अखबार ने पेंशन बाजार को खोले जाने का स्वागत किया है, वहीं हम पिछले रास्ते से जाने की सलाह नही देंगे, क्योंकि इससे गलत नजीर कायम होगी। इसके बजाय सरकार को इस विधेयक के लिए संसद की मंजूरी लेने की कोशिश करनी चाहिए।

First Published : September 7, 2008 | 10:55 PM IST