किसी कंपनी के सीईओ और ग्राहकों में क्या कोई संबंध है? एक स्तर पर उत्तर बहुत साफ है।
एक खराब सीईओ होने से संगठन का प्रदर्शन खराब हो जाता है और इससे कंपनी के ग्राहक दूर चले जाते हैं वहीं एक अच्छे सीईओ के कार्यकाल में कंपनी के ग्राहकों में बढ़ोतरी होती है।
हालांकि जब सेवा की गुणवत्ता में कमी आती है तो इसके समीकरण इतने आसान नहीं होते। सफल सीईओ वह होता है जो अच्छा लाभ और शेयरधारकों को बेहतर लाभांश दिलाता है। यह जरूरी नहीं है कि वे ग्राहकों को भी बेहतर गुणवत्ता के उत्पाद उपलब्ध कराएं और उसकी कंपनी सराहनीय सेवाएं दे।
यह सवाल उस समय दिमाग में आया, जब बुधवार को समाचार माध्यमों की सुर्खियों में यह खबर आई कि अरुण सरीन ने इस्तीफा दे दिया है। सरीन के बारे में यह कहीं से नहीं कहा जा सकता कि वे सफल सीईओ नहीं थे। उन्होंने दुनिया की बड़ी मोबाइल कंपनियों में से एक को खड़ा किया और चुनौतीपूर्ण वातावरण में लाभ भी दिलाया।
कंपनी को 13.2 अरब डॉलर का रिकॉर्ड लाभ हुआ, ज्यादातर विश्लेषकों की भविष्यवाणियों को गलत साबित करते हुए बिक्री में 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वोडाफोन के निवेशक, जो हमेशा सशंकित रहते हैं, और वे लोग भी जिन्होंने 2 साल पहले सरीन को हटाए जाने की मुहिम छेड़ी थी, सरीन के जाने से खुश नहीं हैं।
पिछले साल सरीन ने निश्चित रूप से बहुत ही प्रभावशाली प्रदर्शन किया था जब वोडाफोन ने दिल्ली के ताजमहल होटल में हचिंसन वाम्पोवा के ज्यादातर शेयरों को खरीदकर कंपनी के अधिग्रहण की घोषणा की थी। उस समय तमाम समस्याओं के बावजूद डील को प्रमुखता दी गई। उस समय ये सवाल उठे थे कि भारतीय साझेदार, एस्सार समूह किस तरह से अपने अधिकारों का प्रयोग करेगा और क्या इस डील में फारेन इनवेस्टमेंट सीलिंग, कर नियमों आदि की अवहेलना की गई है।
सरीन ने भारतीय प्रेस के इन सभी आक्रामक सवालों का प्रशंसनीय गंभीरता के साथ जवाब दिया (जबकि वोडाफोन के अन्य अधिकारी निजी तौर पर बड़बड़ा रहे थे कि सारी समस्याएं मीडिया ने खड़ी की है)। एक ग्राहक के रूप में मैने यह महसूस किया कि यही वह आदमी है जिसने मेरे मोबाइल की कंपनी के ज्यादा शेयरों को खरीद लिया है।एक साल बीतने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि आश्वासनों ने एक बार फिर निराशा ही दी है।
नए नाम वोडाफोन-एस्सार होने के बाद भी सेवा की गुणवत्ता में सुधार या कमी नहीं आई है। पूरी तरह से देखें तो वोडाफोन-एस्सार और अन्य मोबाइल सेवा प्रदाताओं में अंतर बहुत कम नजर आता है। सरीन का प्रर्दशन बहुत बेहतरीन रहा, लेकिन मेरे मोबाइल के सेवा प्रदाता के रूप में वे गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं कर सके। यह सही है कि भारत ने वोडाफोन के ताज में एक रत्न और जोड़ दिया है।
मंगलवार को जारी वोडाफोन के एक बयान में कहा गया है कि भारत से आने वाले राजस्व में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और ग्राहकों की संख्या बढ़कर 15 मिलियन हो गई है। इस तरह से रणनीति के मामले में सरीन पूरी तरह से सफल रहे। दुनिया के दूसरे सबसे बड़े बाजार में खरीदारी करके उन्होंने वोडाफोन की वित्तीय हालत में उल्लेखनीय योगदान दिया। लेकिन ग्राहकों की संख्या बढ़ने के साथ उन्होंने भारतीय इलाके में सेवा की गुणवत्ता में कोई खास सुधार नहीं हुआ।
मुख्य रूप से ऐसा इसलिए हुआ कि भारत के असुरक्षित मोबाइल बाजार में मांग को देखते हुए ग्राहकों की संख्या तेजी से बढ़ाने पर अधिक ध्यान दिया गया। पिछले एक दशक में भारत में मोबाइलधारकों की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन अभी भी 12 से 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ बाजार में संभावनाओं के द्वार खुले हुए हैं।
अगर सेवाओं की गुणवत्ता के अपवाद को हटा दिया जाए तो मैं निर्विवाद रूप से मैं इस सीईओ से प्रभावित हूं। कुल मिलाकर सरीन का स्थान यूरोप के बेहतरीन सीईओ में है। उन्हें सेवा की गुणवत्ता के मामले में हर देश में दोषी नहीं ठहराया जा सकता। मैं उनपर शायद ही आरोप लगा सकती हूं, क्योंकि यह नहीं कहा जा सकता कि रतन टाटा या रुपर्ट मर्डोक के कारण मेरे टाटा स्काई के कनेक्शन में समस्या है या पेप्सी की बोतल में तिलचट्टा निकलने के लिए इंदिरा नूयी दोषी हैं।
लेकिन समस्या यही है कि ग्राहक इसे एक दूसरे से जोड़कर देखता है। विज्ञापन और विपणन का पेशेवर आपसे कहेगा- बाजार और बाजार के शेयर्स हमेशा उम्मीदों के अनुरूप नहीं चलते हैं। मीडिया के व्यापक प्रसार के बाद अब कोई सीईओ अपने को शेयरधारकों और विश्लेषकों तक सीमित नहीं रख सकता। एक सीइओ की छवि उसकी कंपनी के उत्पादों के साथ जुडी होती है और चर्चा में बने रहे सीईओ के मामले में तो यह और भी फिट बैठता है।
भारत जैसे बाजारों में जहां सामानों और सेवाओं की मांग अभी भी आपूर्ति से आगे निकल जाती है, कोई भी पाठक पढ़ने के स्तर तक ही सीईओ की प्रतिष्ठा, कंपनी के प्रदर्शन और उपभोक्ता सेवाओं की गुणवत्ता में अंतर कर सकेगा। यहां पर, उदाहरण के लिए सफल बैंक जिनकी सेवाओं में कोई अंतर नहीं है, लेकिन उसके सीईओ कार्पोरेट क्षेत्र के सितारे होते हैं।
टेलीकॉम, उपभोक्ता वस्तुओं या रिटेल चेन्स आदि के मामलों में भी यही स्थिति है। मुद्दा यह है कि कुछ सीईओ ने यह दिखाया है कि मुख्य कार्यकारी और ग्राहकों के अनुभव के बीच में सीधा संबंध संभव है। कंपनी चाहे छोटी हो या बड़ी। रिचर्ड ब्रैनसन और स्टीव जाब्स इसके एक उदाहरण हैं। इस तरह के उदाहरण हालांकि दुर्लभ हैं, लेकिन वे इस बात की सलाह जरूर दे सकते हैं कि ऐसे संगठन हो सकते हैं, जिनके सीईओ की अच्छी छवि का मानदंड कंपनी की सेवाएं भी हों।