Categories: लेख

तस्वीरों की जुबानी, तिब्बतियों की कहानी

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 5:41 PM IST

दुनिया में आज भी ऐसी जगहें हैं जहां के निवासियों को अपने ही देश में निर्वासितों की तरह जिंदगी गुजारनी पड़ रही है। तस्वीरों के माध्यम से कुछ ऐसी ही जिंदगियों की वास्तविकता से रूबरू कराने की कोशिश की है विजय क्रांति ने।


विजय 30 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं लेकिन फोटोग्राफी उनका जुनून है। उनका कहना है कि कुछ करने के लिए थोड़ा जुनूनी होना बेहद जरूरी है। विजय ने अपनी तस्वीरों के जरिए तिब्बती लोगों की खस्ता हालत से दुनिया को रूबरू कराने की एक पहल की है। ये तस्वीरें उन बेबस तिब्बती लोगों की है जो आज भी मौजूदा व्यवस्था का दंश झेलने को मजबूर हैं।

तस्वीरें शब्दों से ज्यादा बोलती हैं और भावों को व्यक्त करती हैं, इसका इन तस्वीरों के जरिए बखूबी अंदाजा हो जाता है। भले ही तिब्बत के बारे में चीन सरकार का दावा है कि वहां बहुत खुशहाली है लेकिन कुछ तस्वीरों से पता चलता है कि तिब्बती लोगों के लिए रोजगार, आवास और जीने की बुनियादी सुविधाएं तक भी नसीब नहीं हैं। विजय ने इन्हीं सच्चाइयों को सामने लाने की कोशिश की है।

चीन अधिकृत तिब्बत में पत्रकारों को इजाजत न मिलने के बावजूद भी विजय ने दो बार तिब्बत का सफर किया है। उनका पहला सफर ल्हासा के आस-पास के इलाके में था जहां उन्होंने लगभग 1000 किलोमीटर की यात्रा की। उनका दूसरा सफर युन्नान, सिचुआन, छिगाई और टार के इलाके में था। वहां उन्होंने लगभग 5000 किलोमीटर की यात्रा तय की।

उन्होंने अपने इस सफर के दौरान चीन के इस दावे के सच को समझने की कोशिश की जिसके मुताबिक तिब्बत में संपन्नता कायम हो गई है और वे चीन सरकार के शासन से बेहद खुश हैं। विजय कहते हैं, ‘इस बात में कोई संदेह नहीं है कि तिब्बत के कुछ भागों में आधुनिकतम बदलाव आया है। आप यहां बड़े शानदार मॉल, चौड़ी सड़कें, बेहतरीन हाउसिंग कॉम्प्लेक्स और सड़कों पर तेज रफ्तार में महंगी लक्जरी गाड़ियां दौड़ती हुई देख सकते हैं।

लेकिन अगर आप तिब्बती और चीनी लोगों में फर्क करना जानते हैं तो आप समझ पाएंगे कि इन सुविधाओं का लाभ उठाने वाला तिब्बती है या चीन का नागरिक और किसके लिए यह विकास किया गया है।’ इस सफर की चुनौतियों के संदर्भ में बताते हुए इनका कहना है कि यह काम उन्होंने किसी संस्था के लिए नहीं किया है बल्कि यह उनकी खुद की कोशिश है।

उनका कहना है, ‘तिब्बत को अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के लिए खोलने से पहले चीन ने इस बात का पूरा ख्याल रखा कि यहां आने वाले पर्यटक उन चीजों को नहीं देखे जो चीन सरकार उन्हें नहीं दिखाना चाहती है। यह कुछ वैसा ही है जैसा कि हत्या के घटनास्थल को साफ सुथरा करने के बाद हत्या करने वाले एक अपराधी को बेदाग बता कर पेश किया जाए।

प्रोफेशनल फोटो पत्रकार के लिए हालात को सार्थक फ्रेम में रखकर वास्तविकता से रूबरू कराने की चुनौती होती है। ये तस्वीरें कुछ वैसे ही फ्रेम की झलक दिखाने की कोशिश जैसी है।’ विजय को तिब्बत शरणार्थियों के लिए काम करने के लिए 1993-94 में के. के. बिड़ला फाउंडेशन फेलोशिप के लिए चुना गया। उन्होंने 1979 में तिब्बत के लिए पहली हिंदी समाचार पत्रिका ‘तिब्बत देश’ की शुरूआत की और आज भी वह इसका संपादन कर रहे हैं।

First Published : August 19, 2008 | 1:03 AM IST