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दिलफेंक कमलनाथ की राजनीतिक अदा है जुदा

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 2:43 PM IST

कमलनाथ दूसरे नेताओं की तरह नहीं हैं। जहां मध्यप्रदेश के दूसरे दिग्गज नेता, अर्जुन सिंह शब्दों की मितव्ययिता के लिए प्रसिद्ध हैं, कमलनाथ शब्दों को लुटाते हैं।


स्टाइल है- दिलफेंक, तपाक से जवाब देते हैं और हाजिरजवाब माने जाते हैं। ऐसे में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की वार्ता में कमलनाथ की भूमिका एकदम सटीक रही है। अमेरिका ने भारत और चीन पर भारी प्रहार करते हुए माना है कि इन्हीं दो देशों की वजह से संगठन में वार्ता ठप हो गई।

कारण? चीन के वाणिज्य मंत्री द्वारा हस्तक्षेप केवल एक शब्द तक सीमित था- जब किसानों द्वारा उगाये गए अन्न के व्यापार पर रोक लगाने की बात आती थी, वे कह देते थे- नहीं ( भाषा के प्रतिबंध की आड़ में चीन को अपना रुख साफ करने के लिए कुछ कहना नहीं पड़ा)। जो कमी थी, कमलनाथ ने पूरी की। हम अपने किसानों के हितों से कभी समझौता नहीं करेंगे। कमलनाथ दिल्ली में पत्रकार सम्मेलन में दहाड़े। जिनेवा बैठक में उन्होंने अपना ट्रेडमार्क आक्रामक रौद्र रूप दिखाया।

भारत डब्ल्यूटीओ में रहेगा ही नहीं। उन्होंने कहा कि आप हमारे जैसे गरीब देश पर जोर डालेंगे, तो हम डब्ल्यूटीओ से निकल जाएंगे। यद्यपि उनकी कई और उक्तियों की तरह यह भी ज्यादा गंभीरता से नहीं ली गई। लेकिन असर जरूर पडा। जहां अमेरिका ने वार्ता में अड़चन का कारण भारत और चीन की जिद बताया, वहीं कई देशों ने अनौपचारिक तौर पर भारत के प्रति संवेदना जताई। आखिर यदि संसार के आधे किसान मानने लगें कि विश्व व्यापार अनुचित है और असमान है, तो बात आगे कैसे बढ़ सकती है?

डब्ल्यूटीओ में भारत ने क्या कहा? सवाल यह था कि वैश्वीकरण के बाद भारत, चीन और ब्राजील जैसे विकासशील लेकिन बड़े देशों को कृषि और उद्योग का बाजार कितना खोलना चाहिए। इन तीनों देशों को डर यह है कि अमेरिका जैसे बड़ी कृषि अर्थव्यवस्थाओं में कृषि सहायिकी के चलते जब अन्न के आयात-निर्यात में अन्न इधर आना शुरू हो जाएगा, तो सस्ता अनाज हमारे किसानों को बेरोजगार कर देगा। उधर अमेरिका जैसे देश कहते हैं कि अप्रकट आर्थिक सहायता की वजह से भारतीय किसान जो अनाज उगा रहे हैं, उसका सही भाव कुछ और ही है।

अत: भारत को रचनात्मक व्यापार के हित में होना चाहिए, न कि एक वर्ग विशेष का हित बचाने के लिए स्वतंत्र व्यापार में एक अड़चन डालनी चाहिए। बहुत तू-तू मैं-मैं हुई जिनेवा में। संयोग से बैठक उसी समय हुई, जब यहां संसद में आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा था। यहां तो संप्रग सरकार विश्वास मत जीत गई। लेकिन जिनेवा में बोलचाल बंद हो गई- और अमेरिका में चुनाव की वजह से अब शायद एक वर्ष तक ठप ही रहेगी। जिनेवा में तो कमलनाथ का व्यक्तित्व हावी रहा ही, यहां भी वह मुखरित हुए।

जब सरकार को विश्वास मत को लेकर रातों की नींद नसीब नहीं हो रही थी, तब कमलनाथ ने कहना शुरू किया: क्या जरूरत थी, सामरिक करार को इतना बडा मुद्दा बनाने की? उनसे पूछा होता, जो लोकसभा का चुनाव लड़ कर आए हैं, न कि उनसे जो राज्य सभा में आराम से विराजमान हैं, वे जिन्होंने उठ कर अपने हाथ से एक गिलास पानी भी नहीं पिया है। इशारा किस तरफ था, सबको मालूम है। बात गलत नहीं है। चुनाव लड़ने का मतलब कमलनाथ से ज्यादा कोई और नहीं जानता। संजय गांधी के मित्र, व्यापारी, जब राजनीति में आए तो नौसिखिये थे।

तब से अब तक, तेरह बार लोकसभा का चुनाव चुके हैं। 1977 से 1979 के दौरान जब लोकसभा में कांग्रेस के सदस्यों को दोनों हाथों की दस अंगुलियों पर गिना जा सकता था, तब भी कमलनाथ संसद सदस्य थे। उनका संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा रहा है। अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह और मध्यप्रदेश के बंटवारे के पूर्व शुक्ल बंधुओं को पछाड़ कर राजनीति में अडिग रहे हैं। नरसिंह राव की उतनी ही सेवा की, जितनी सोनिया गांधी की कर रहे हैं।

लेकिन बार-बार जोर डालते हैं कि राजनीति में हैं, तो अपने बलबूते पर- न पैतृक संपत्ति धरोहर में मिली है, न किसी वाद से उपजे हैं। मैनेजमेंट का गुर है कि छिंदवाड़ा बार-बार उन्हें ही चुनता है और जब उन्हें नहीं चुनता तो उनकी पत्नी को चुनता है। बीच-बीच में उनके व्यापार को लेकर सवाल उठाये गए हैं, लेकिन सबूत मिला नहीं या दिया नहीं गया। अपनी बात खुलकर रखते हैं और किसी के पीछे से निशाना नहीं साधते हैं। चाहते हैं वित्त मंत्री बनना और यह बात किसी से छिपी नहीं है। अपनी बिसात जानते हैं और चाहते हैं कि अन्य लोग भी इसे जानें।

कमलनाथ योग्य हैं, लेकिन संस्थागत योगदान में कुशल नहीं हैं। भक्तिपरक हैं और इससे औरों को उलझन होती है। यदि कोई सिर्फ कप्तान बनने की जिद करे और टीम न चला पाये, तो उसका क्या किया जाए। अब खबरें यह आ रही है कि कमलनाथ ने हवा सूंघ ली है। उन्हें लग रहा है कि आगामी विधान सभा चुनाव (दिसंबर) में कांग्रेस को उनकी जरूरत पड़ेगी। ऐसे में वह मुख्यमंत्री पद को ना नहीं करेंगे। क्या पता दिल्ली में क्या हो जाए- लोकसभा में कांग्रेस सरकार बना पाये या नहीं। कम-से-कम पांव तो जमे रहने चाहिए कहीं!

यदि वह वाकई मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन जाते हैं, तो भारतीय राजनीति के बारे में कई धारणाएं नेस्तनाबूद हो जाएंगी। पहली कि जाति विशेष होने के नाते ही संसद सदस्य चुनकर आते हैं। कमलनाथ तेरह बार इसे झुठला चुके हैं। दूसरी यह कि राज्य की राजनीति राज्य का ही रहने वाला समझ सकता है। कमलनाथ पंजाबी हैं, बंगाल में पले-बढ़े हैं और राजनीति मध्यप्रदेश में कर रहे हैं।

तीसरी यह कि राजनीति करने के लिए आदर्शों की तिलांजलि देनी पड़ती है। कमलनाथ चाहते तो जिनेवा में अमेरिका से हाथ मिला सकते थे। दबाव बहुत था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, उल्टे अमेरिका और विकसित देशों को इतनी खरी-खोटी सुनाई कि बाकी विकासशील देशों ने बगल वाले कमरे में ताली बजाई। कमलनाथ इसी लीक पर चलकर दिखाते हैं या नहीं, यह समय बताएगा।

First Published : August 1, 2008 | 11:20 PM IST