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मुल्क की सुरक्षा पर हो रही सियासत

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 11:02 AM IST

रक्षा मंत्रालय ने हथियारों की खरीद के वास्ते इस साल की रक्षा खरीद नीति देर से ही सही, लेकिन तैयार कर ली है।


एक तरफ, जहां दुनिया की बड़ी-बडी क़ंपनियों के साथ-साथ देसी हथियार और रक्षा उपकरण निर्माता महीनों से इस नीति का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, वहीं मंत्रालय को रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी की फुर्सत की प्रतीक्षा है।

दरअसल, मंत्री जी खुद अपने ‘श्रीमुख’ से इस नीति की घोषणा करना चाहते हैं, लेकिन इस वक्त 22 जुलाई के लिए वह संसद में गणित बिठाने में मशगूल हैं। इसी वजह से भारतीय कंपनियां अब हथियार और रक्षा उपकरणों की खरीद-बिक्री के बारे में बिना स्पष्ट किसी नीति के साथ ही ब्रिटेन में हो रहे फॉर्नबॉर्ग एयरशो में हिस्सा ले रही हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि वहां उन्हें मोटे सौदे मिल सकते हैं।

इसीलिए डर यह है कि यह नई नीति के नतीजे भी रक्षा खरीद नीति, 2006 के परिणामों से अलग नहीं होंगे। 2006 की नीति में खरीद और बिक्री के साथ-साथ मुल्क में रक्षा उपकरणों व हथियारों के निर्माण का प्रावधान भी पहली बार शामिल किया गया था। इसके तहत भारतीय निर्माताओं को भी हथियारों और उपकरणों को बनाने की छूट दी गई थी। इसमें प्राइवेट कंपनियां भी शामिल थीं। यह बात अलग है कि जब तक रक्षा खरीद नीति, 2006 प्रभावी रही, इसके तहत मुल्क में एक भी रक्षा उपकरण या हथियार नहीं बनाए जा सके।

इस नीति की नाकामयाबी का इल्जाम तो रक्षा मंत्रालय को अपने सिर लेना ही पड़ेगा। मुल्क में जो भी हथियार निर्माण प्रावधान के तहत बनाए जाते हैं, उन्हें सेना के तीन अंगों की दीर्घावधि एकीकृत परिप्रेक्ष्य योजना (एलटीआईपीपी)की जरूरतों को पूरा करना होता है। 15 सालों की यह योजना सेना की सेना की 2002 से 2017 तक होने वाले आधुनिकीकरण की सारी जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाई गई थी। इसी के आधार पर इन 15 सालों के वास्ते रक्षा मंत्रालय को 10वीं, 11वीं और 12वीं रक्षा योजना में खरीद और उसके लिए पैसे जुटाने की योजना बनानी थी। लेकिन ऐसा हुआ कुछ भी नहीं।

एक ऑडिट रिपोर्ट का कहना है कि 2006 में 10 रक्षा योजना पूरी भी हो गई, लेकिन एलटीआईपीपी को कोई खोज-खबर नहीं है। अब रक्षा मंत्रालय ने एलटीआईपीपी की अवधि को पांच साल बढ़ाकर 2022 तक करने का इरादा कर लिया है, लेकिन अब भी उस योजना की कोई खबर नहीं है। इसके बजाए मंत्रालय ने लोकसभा की रक्षा मामलों की स्थायी समिति को यह बताया है कि एलटीआईपीपी 2009 तक ही तैयार हो पाएगी। इसका मतलब यह हुआ कि लंबी अवधि की किसी योजना के बिना ही पिछले सात सालों से हर वर्ष रक्षा पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। 

स्वदेशीकरण के नारे की कलई भी इस बात से खुल जाती है कि रक्षा मंत्रालय एक भी ऐसी देसी प्राइवेट कंपनी की तलाश नहीं कर पाई है, जिसे वह ‘रक्षा उत्पादन रत्न’ का तमगा दे सके। इन ‘रत्नों’ को अहम रक्षा उपकरणों का विकास करने के सरकारी सहायता मिलती। रक्षा मंत्रालय का एक भी प्राइवेट कंपनी को ‘रत्न’ का तमगा नहीं दे पाने की असल वजह से सरकारी रक्षा कंपनियों के टे्रड यूनियनों का कड़ा विरोध। यह दिखलाता है कि कैसे राजनेताओं के दिमाग में राष्ट्रीय सुरक्षा भी वोट के आगे घुटने टेक देती है।

First Published : July 14, 2008 | 11:45 PM IST