उभरते उद्योग जगत की फेहरिस्त में जिस कदर मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग ने एक लंबी छलांग लगाई है उसके मद्देनजर भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में क्षेत्रीय फिल्मों का दौर भी अब अपने पूरे शबाब पर है और इन सबके बीच भोजपुरी फिल्में भी अपना असर छोड़ने में सफल साबित हुईं हैं।
100 करोड़ रुपये से ऊपर का सालाना कारोबार करने वाली भोजपुरी फिल्मों के भविष्य के बारे में इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अब कॉर्पोरेट घराने भी इसमें पैसा लगाने और निवेश करने में गुरेज नही कर रहे हैं। इसका सबसे ताजा उदाहरण अभी हाल ही में मशहूर फिल्म निर्माता अभय सिन्हा जिनके बैनर तले ‘बंधन टूटे ना, धरती कहे पुकार के’, ‘देवा’ सहित कई अन्य बड़ी फिल्में बनी हैं।
उनकी कंपनी ‘याशी फिल्म्स’ के साथ महिंद्रा एंड महिंद्रा ने गठजोड़ किया है। इस गठजोड़ के तहत महिंद्रा की ‘मुंबई मंत्रा मीडिया प्राइवेट लि’. अभय सिन्हा की पांच फिल्मों में पैसा लगाएगी। इस बाबत अभय सिन्हा का कहना है कि कॉर्पोरेट घरानों के पैसा लगाने से भोजपुरी फिल्मों को एक नई मजबूती मिलेगी और बेहतर एवं उन्नत तकनीक के इस्तेमाल के साथ साथ डिस्ट्रीब्यूशन का काम और मजबूत होगा।
उधर महिंद्रा एंड महिंद्रा का कहना है कि भोजपुरी फिल्में एक परिवर्तन के दौर से गुजर रही हैं और जिस कदर अब फिल्मों के विषयों पर भी काम होना शुरू हुआ है उससे साफ जाहिर है कि इसका भविष्य उज्ज्वल रहने वाला है। कंपनी द्वारा निवेश की जाने वाली राशि के बारे में कंपनी का कहना है कि इस वक्त अमूमन हरेक भोजपुरी फिल्मों का बजट तकरीबन सवा से ढाई करोड़ रुपये तक बैठता है, लिहाजा हमने फिलहाल पांच फिल्मों में पैसा लगाने की सोची है। अभय बताते हैं कि अनिल धीरुभाई अंबानी समूह की कंपनी ऐडलैब्स से भी सकारात्मक दिशा में उनकी बात चल रही है।
हालांकि इस बारे में अभी कुछ भी तय नहीं हो पाया है। इन रुझानों को देखकर तो यही लगता है कि आखिरकार भोजपुरी फिल्में कॉर्पोरेट घरानों को भी अपनी ओर खीचनें में सफल हो रही हैं मगर क्यों? इस पर भोजपुरी फिल्मों को फिर से एक नई दिशा देने वाले अजय सिन्हा जिन्होने ‘ससुरा बड़ा पईसे वाला’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया, उनके मुताबिक मल्टीप्लेक्सों का चलन बढ़ने के कारण अब हिंदी फिल्मों का हिट होना या पिटना वहीं तय हो रहा है, जबकि बिहार, यूपी जैसे राज्यों में जहां सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल् ज्यादा हैं वहां अब हिंदी फिल्मों की बजाय भोजपुरी फिल्में ज्यादा कारोबार कर रही हैं।
जबकि हिंदी फिल्मों में भी कंटेंट का स्तर गिरने के कारण और उच्च वर्ग के दर्शकों को ध्यान में रखकर फिल्में बनने के कारण वहां के दर्शक इन फिल्मों से जुड़ाव महसूस नही कर रहे हैं। लिहाजा वहां हिंदी फिल्मों के बजाय अब भोजपुरी फिल्मों को ज्यादा तरजीह मिल रही है और वह बेहतर मुनाफा भी दे रही हैं। सिन्हा आगे कहते हैं कि अगर सिर्फ मुंबई के ही सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉलों और थिएटरों की बात करें तो साल के दस महीने वहां भोजपुरी फिल्में ही चला करती हैं। इतना ही नही बल्कि मुझे उम्मीद है कि 2012 तक भोजपुरी फिल्मों के दर्शक राजस्थान, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में भी होंगे।
फिर भी भोजपुरी फिल्मों के लिए राहें इतनी आसान नही हैं। क्योंकि बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो 50 लाख रुपये लगाकर 5 करोड़ रुपये कमाना चाहते हैं। इस बारे में भोजपुरी फिल्मों के महानायक कुणाल सिंह का कहना है कि ऐसे लोगों के आ जाने के कारण ही भोजपुरी फिल्मों का स्तर थोड़ा नीचे गया है और इसे पैसा कमाने की मशीन समझ कर लोग हर तरह की सीमाओं को लांघ रहे हैं। जिसकी वजह से ज्यादातर फिल्मों में द्विअर्थी गानों, फूहड़ता और अश्लीलता की भरमार होती है। इसके अलावा कुणाल राज्य सरकारों की बेरूखी को भी भोजपुरी फिल्मों की दशा का जिम्मेवार मानते हैं।
उनका कहना है कि मराठी फिल्मों को जहां 30 लाख रुपये की सब्सिडी मिलती है और बांग्ला फिल्मों को सब्सिडी दी जानी बिल्कुल निश्चित होती है वहीं बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारें इस मामले में उदासीन रवैया अपनाई हुई हैं। सब्सिडी और समर्थन के नाम पर चवन्नी तक राज्य सरकार इन फिल्मों को नहीं दे रही हैं। जबकि वहां के सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉलों को अगर जिंदा रखने का काम भोजपुरी फिल्में कर रही हैं तो इसे कम करके नहीं आंकना चाहिए।
भोजपुरी फिल्मों की रिकवरी का जहां तक सवाल है तो इस बारे में भोजपुरी फिल्म्स अवार्ड कमिटी के अध्यक्ष विनोद गुप्ता के मुताबिक रिकवरी का मसला उन्ही फिल्मों के लिए परेशानी का सबब है जो मनोरंजन के नाम पर फूहड़ता परोस रहे हैं जबकि जिन फिल्मों में स्क्रिप्ट और दूसरी चीजों पर काम किया गया है वो फिल्में न केवल अपना पैसा निकाल पाने में सफल साबित हो रही हैं।
रुपहले सपने
खुद को स्थापित करने के लिए जूझ रहा है भोजपुरी फिल्म उद्योग
कई कॉर्पोरेट घराने भी पैसा लगाने को हैं इच्छुक
पिछले साल 69 फिल्मों के मुकाबले इस साल 100 फिल्में हैं फ्लोर पर