‘लोक हित’ के नाम पर औद्योगिक इस्तेमाल के लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण करने से पिछले कुछ महीनों में खूनी संघर्ष और सामाजिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हुई है।
पुराने पड़ चुके भूमि अधिग्रहण कानून में ही विवाद की एक और वजह छुपी हुई है। डेवलपर्स यदि चाहें तो ‘तात्कालिक जरूरत’ के नाम पर सारे नियमों को धता बताकर जमीन पर कब्जा कर सकते हैं। यह शब्द भी ‘लोक हित’ शब्द की तरह अस्पष्ट है और अदालतें उनकी व्याख्या करते हुए कई फैसले लिख चुकी हैं।
अंतत: मामले से जुड़े तथ्यों और अदालत के विवेक पर ही सब कुछ निर्भर रहता है, जैसा कि हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने शेखर होटल बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले में कहा है।
धारा 5-ए के मुताबिक अगर किसी जमीन को अधिग्रहण के लिए अधिसूचित किया गया है तो कोई भी व्यक्ति जिसकी उस जमीन में दिलचस्पी है, अधिग्रहण के खिलाफ आपत्ति दर्ज करा सकता है। बहरहाल धारा 17(1) में कहा गया है कि अगर मामला ‘तात्कालिक जरूरत’ का हो, जिसका निर्धारण सरकार करती है- ऐसे मामलों में ‘लोक हित’ को देखते हुए जमीन पर 15 दिन के भीतर कब्जा दिया जा सकता है।
इससे भी बदतर यह है कि अगर एक बार अधिग्रहण को ‘तात्कालिक जरूरत’ के लिए घोषित कर दिया जाता है तो आपत्ति पर सुनवाई तथा फैसला देने की सभी प्रक्रियाएं अनावश्यक हो जाती हैं। गुलामी के दिनों में 1894 में बना कानून अभी भी बरकरार है।
शेखर होटल मामले में बुलंदशहर के नजदीक राष्ट्रीय राजमार्ग पर ट्रांसपोर्ट नगर बनाने के लिए जमीन की ‘तात्कालिक जरूरत’ थी। इसमें आपत्तियां प्राप्त करने की औपचारिकता भी पूरी नहीं की गई। रूप से दर्ज की गई सभी आपत्तियां अनावश्यक बन गईं। ज्यादातर जमीनों के मालिक मुआवजे से संतुष्ट थे, लेकिन कुछ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की राह पकड़ी।
सभी आपत्तियों को खारिज कर दिया गया, क्योंकि राजमार्ग पर यातायात बाधित होने की वजह से परियोजना को शुरू किए जाने की तात्कालिक जरूरत थी। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस अपील को खारिज करते हुए माना कि ‘इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि धारा 5-ए के तहत ऐतराज दाखिल करने का अधिकार महत्त्वपूर्ण है और सरकारों को इससे छुटकारा पाने की खुली आजादी नहीं है।
यह धारा राज्यों के मनमाने अधिकारों के खिलाफ एक कवच प्रदान करती है।’ न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी कहा कि स्थिति की अति आवश्यकता को देखते हुए लोकहित में प्रावधान को लागू करना जरुरी हो जाता है। कभी कभार ऐसा करना बिल्कुल भी जरुरी नहीं होता है और सरकार इस अधिकार का इस्तेमाल अत्यधिक उत्साह में कर सकती है। इससे लोगों के हितों पर गंभीर रुप से प्रभावित हो सकते हैं। यह हर मामले में अलग अलग निर्भर करता है।
यातायात के व्यस्त होने की समस्या वर्षों से चल रही थी और यह विवाद का विषय है कि क्या ऐसा आपातकालीन कदम उठाया जाना जरुरी था जब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की योजना 1985 में ही बन गई थी। आपत्तियों पर सुनवाई में कुछ ही महीने लगते और सरकार कुछ महीने इंतजार कर सकती थी लेकिन न्यायालय ने महसूस किया कि कार्यवाही को खत्म करने के लिए यातायात की व्यस्तता के कारण व्यवधान पर्याप्त कारण है।
भूमि अधिग्रहण के लिए तात्कालिक जरूरतों के मामलों में क ई उच्च न्यायालयों ने मानकों के मुताबिक फैसले दिए हैं। मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा है कि अधिकारियों को तात्कालिक जरूरतों की आड़ में अपनी सुस्ती को ढकने के लिए कोई अनुचित काम नहीं करना चाहिए। केरल उच्च न्यायालय ने कहा है कि तात्कालिक जरूरत की घोषणा करके सुनवाई की प्रक्रिया से नहीं बचा जा सकता।
न्यायालय के सामने उस मामले में यह तर्क दिया गया था कि अगर इस परियोजना में और देरी होती है तो शॉपिंग सेंटर बनाए जाने के लिए स्वीकृत धन वापस ले लिया जाएगा। पंजाब उच्च न्याायलय ने इस बात पर जोर दिया है कि तात्कालिक जरूरतों का निर्धारण न्यायालय में होना चाहिए। राजस्थान उच्च न्यायालय ने कहा कि इस प्रावधान का इस्तेमाल उद्योगपतियों को जमीन देने के लिए नहीं किया जा सकता।
इस प्रावधान के दुरुपयोग का एक महत्त्वपूर्ण मसला सर्वोच्च न्यायालय में पंजाब राज्य बनाम गुडियाल सिंह (1980) मामले में आया। एक प्रभावशाली पूर्व मंत्री कुछ लोगों से दुश्मनी निकालने के लिए मंडी के वास्ते उनकी जमीन दिलाना चाहता था। सरकार ने इस प्रावधान को लागू किया। इस कार्रवाई को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई और राजनीतिक नेता को दो बार मुंह की खानी पड़ी।
राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की, जिसके चलते उसकी बहुत आलोचना हुई। न्यायालय ने कहा, ‘यह मूल सिध्दांत है कि किसी व्यक्ति की संपत्ति हथियाना गंभीर मामला है और किसी गरीब की जमीन हथियाना तो उससे भी गंभीर मामला है।’
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल के महीनों में कई बार यह स्पष्ट किया है, जैसा कि इंदौर विकास प्राधिकरण बनाम प्योर इंडस्ट्रियल कोक में कहा कि- संपत्ति का अधिकार न केवल संवैधानिक अधिकार है बल्कि मानवाधिकार भी है। दूसरे परिप्रेक्ष्य में देखें तो अब सेज एक्ट 2005 आ चुका है, जो गांव के गरीबों से निपटने के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम से ज्यादा ताकतवर है।