सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) में वेतन बढ़ाने के लिए बनाई गई समिति जब अपनी रिपोर्ट पेश करती है और उसकी शुरुआत में ही यह उम्मीद जताती है कि इस काम के लिए गठित वह आखिरी समिति होगी, तो समझ लेना चाहिए कि अब सोचने का वक्त आ गया है।
इस समय सरकार तमाम मोलभाव यानी बातचीत के बाद हर 10 साल में पीएसयू के लिए वेतन तय करती है। ऐसे में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम जगन्नाथ राव की अध्यक्षता वाली समिति ने यह सिफारिश की है कि पीएसयू के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक का वेतन तय करने की जिम्मेदारी उस मंत्रालय को उठानी चाहिए, जिसके तहत ये पीएसयू आते हैं।
बाकी सभी का वेतन तय करने का काम पीएसयू बोर्ड का होना चाहिए। कई मायनों में यह क्रांतिकारी पहल है क्योंकि ज्यादातर लोगों को यही लग रहा था कि समिति फकत इतना ही कहेगी कि 10 के बजाय हर 5 साल में वेतन बढ़ाए जाने चाहिए। हालांकि सुर्खियों में यही खबर आई कि समिति ने वेतन में 57 फीसद से 379 फीसद तक के इजाफे की सिफारिश की है, लेकिन यह उन बदलावों में सबसे छोटा बदलाव है, जिनकी सिफारिश समिति ने की है।
सबसे पहली और जरूरी बात यह है कि पीएसयू को निजी क्षेत्रों की कंपनियों के साथ मुकाबला करना है और इसलिए जो भी सिफारिशें की गई हैं या की जानी हैं, उनकी बुनियाद इसी बात से तय होनी चाहिए। ऐसे में समिति ने एक वाजिब सवाल पूछा है कि पीएसयू के लिए वेतन तय करते समय नौकरशाहों को मिलने वाले वेतन को आधार क्यों बनाया जाना चाहिए।
उसने लीक से हटकर प्रदर्शन और कंपनी की मुनाफा देने की क्षमता के आधार पर वेतन देने की सिफारिश की है। इसलिए यदि कोई कंपनी ज्यादा मुनाफा दे रही है, तो उसके कर्मचारियों का वेतन भी ज्यादा होना चाहिए। अगर मुनाफा नहीं है, तो उसके कर्मचारियों को वेतन का एक निश्चित हिस्सा ही मिलना चाहिए। वैरिएबल पेआउट यानी प्रदर्शन के आधार पर होने वाले भुगतान की प्रणाली यहां भी लागू कर देने पर पीएसयू के कर्मचारी भी अपनी कंपनी का कायाकल्प करने में जुट सकते हैं।
हालांकि इतने पर भी पीएसयू के मुखिया का वेतन निजी क्षेत्र में मझोले स्तर के अधिकारी के आसपास भी नहीं पहुंच पाएगा, लेकिन मौजूदा हालत से तो काफी हद तक बेहतर ही होगा। अगर इसमें भारी भरकम कंपनी के आला ओहदे पर बैठने की प्रतिष्ठा और जोड़ दी जाए, तो निजी क्षेत्र के कई दिग्गज भी अगली बार पीएसयू की ही राह पकड़ लेंगे।
अब यह सोचना भी शायद ज्यादती ही होगी कि इस रिपोर्ट की सिफारिशों को आसानी से हरी झंडी मिल जाएगी। असल में तो पीएसयू को अपने वेतन खुद तय करने की आजादी देने के बारे में सोचना भी खयाली पुलाव पकाना ही होगा क्योंकि यह साफ है कि इसकी डोरी राजनेताओं और नौकरशाहों के हाथों में होती है।
नौकरशाह हर हाल में इस रिपोर्ट की मुखालफत करेंगे (यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय भेजी जा चुकी है और बाद में इसे मंजूरी के लिए मंत्रिमंडल के सामने पेश किया जाएगा) क्योंकि अगर रिपोर्ट को हरी झंडी मिल जाती है, तो उनका वेतन उस तबके से बहुत कम रह जाएगा, जिसकी सरपरस्ती वे करते हैं।