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गलती करे रिजर्व बैंक और भुगतें हम

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 4:01 PM IST

आज की तारीख में मौद्रिक नीति की नब्ज पर नजर रखने वाले आधिकारियों में मशहूर अमेरिकी अर्थशास्त्री और फेडरल बैंक के पूर्व प्रमुख पॉल वॉल्कर की भूमिका में आने की होड़ मची हुई है।


वॉल्कर का उनकी सटीक मौद्रिक नीतियों के लिए अमेरिकी इतिहास में काफी अहम स्थान है। वैसे तो हम यह नहीं जानते कि अगर आज  वॉल्कर फेड प्रमुख की कुर्सी पर होते तो क्या करते, लेकिन कई विश्लेषकों का यही कहना है कि आज के हालात बिल्कुल 1970 के दौर की तरह के हैं। इसीलिए हमें वैसे ही कदम उठाने की जरूरत है, जैसे वॉल्कर ने उस दौर में उठाए थे। मतलब, जरुरत है मौद्रिक नीतियों को कड़ा करने की।

खुद को वॉल्कर का सबसे बड़ा नकलची साबित करने की रेस में दो उम्मीदवार सबसे आगे हैं। ये हैं यूरोपियन सेंट्रल बैंक के श्रीमान ट्रीचेट और रिजर्व बैंक के गवर्नर वाई. वी. रेड्डी। मेरी मानें तो इन दोनों ने मौजूदा और 1970 के दशक के हालात को बिल्कुल ही गलत तरीके से देखा। इस बात को याद रखना भी जरूरी है कि वॉल्कर महंगाई से निपटने के लिए मौद्रिक नीतियों पर आंखें मूंद कर भरोसा करने वालों में से नहीं थे।

इसलिए रेड्डी या ट्रीचेट नहीं, वॉल्कर के नक्शे कदमों पर चलने वाले शख्स का अवॉर्ड बर्नान्के को मिलना चाहिए। यह तो हुई आने वाले कल की बात, लेकिन आइए जानते हैं कि क्यों रेड्डी की नीतियां समस्या से निपटने की राह में नाकाफी हैं। एक ऐसे दौर में जब उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के मुताबिक महंगाई सात फीसदी के आसपास है, रेड्डी ने रेपो रेट को बढ़ा कर नौ फीसदी कर दिया।

साथ ही,  उसने सीआरआर में भी चौथाई फीसदी का इजाफा कर दिया। अगर हम यह मानते हैं कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के मुताबिक महंगाई की दर 7.5 फीसदी है, तो इस हिसाब से ब्याज दर में कुल मिलाकर पूरे 1.5 फीसदी का इजाफा हो जाएगा। इस कदम की सभी विदेशी इनवेस्टमेंट बैंकों ने तारीफ की है। इस तारीफ का मतलब तो यही है कि रेड्डी के चाहने वालों की तादाद बढ़ी ही है।

लेकिन इसके पीछे असल वजह कुछ और ही है। पहली बात तो यह है कि इन इनवेस्टमेंट बैंकों के प्रतिनिधि सीआईआई या फिर फिक्की जैसे लॉबिंग संस्थाओं के सदस्य होते हैं। हर साल, बजट चाहे जैसे भी हो, ये संस्थाएं वित्तमंत्री की तारीफ करने से नहीं चूकतीं। बजट को ये संस्थाएं हमेशा 8 से लेकर 10 तक के ही बीच में रेटिंग देती हैं।

ऐसा इसलिए क्योंकि या तो आज भी भारतीय उद्योग लालफीताशाही के चंगुल में फंसे हुए हैं या फिर फंसा हुआ महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि सरकार को खुश रखकर ही वे उससे फायदे लेते रह सकते हैं। अब आप ही सोचिए ऐसे इनवेस्टमेंट बैंकों की इस तारीफ को चापलूसी से ज्यादा और क्या कहेंगे। इसलिए कभी किसी विदेशी या देसी इनवेस्टमेंट बैंकों की रिजर्व बैंक के कदमों पर दी गई प्रतिक्रिया को कान मत दीजिए।

तो कैसे जानें कि रिजर्व बैंक करना क्या चाह रहा है और जो वह करना चाह रहा है, क्या वह सही है? महीनों और सालों का आकलन करना काफी आसान होता है, लेकिन अगर मैं ऐसा करूं तो मुझे अर्थशास्त्री नहीं, इतिहासकार होना चाहिए था। आज की तारीख में इन बातों का आकलन करने के दो ही तरीके हैं।

पहला तो यह है कि रिजर्व बैंक के कामों को उसी की बातों के आधार पर मापिए। दूसरी बात यह है कि रिजर्व बैंक के काम और दूसरे केंद्रीय बैंकों के कामों के बीच तुलना की जानी चाहिए। अब रेड्डी के दो बयानों को इस बारे में देखने की जरूरत है। रेड्डी 2005 से ही कहते आए हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था ओवरहीट हो रही है।

दूसरी चीज वह यह कह रहे हैं कि इस ओवरहीटिंग से निपटने का एक ही तरीका है, बाजार में मौजूद तरलता पर लगाम। वैसे, बाजार में पूंजी का प्रवाह आरबीआई के 17 फीसदी के स्तर के आसपास ही था। 2005 में जब रिजर्व बैंक ने पहली बार ओवरहीटिंग का राग अलापा, तब भारत में निवेश का स्तर जीडीपी के 32 फीसदी के बराबर था जबकि बचत का स्तर 31 फीसदी के स्तर पर था।

इस बात से मेरे ख्याल रिजर्व बैंक के साथ-साथ काफी लोगबाग भी अनजान होंगे। अर्थव्यवस्था के लिए इन दोनों का काफी अहम स्थान होता है, जो 2000 से आठ फीसदी तक बढ़ चुके थे। अगर हमारी अर्थव्यवस्था सचमुच गरमाने लगी थी, तो महंगाई की दर में तेज इजाफा और निवेश व बचत की दर में इजाफा होना चाहिए था। इन दोनों मामलों में रिजर्व बैंक आकलन गलत निकला।

उस समय निवेश और बचत की दर में तेज इजाफा हो रहा था, जबकि महंगाई की दर कम नहीं तो स्थिर तो था ही। आरबीआई आज भी अर्थव्यवस्था को ओवरहीटिंग की निगाह से ही देख रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह केवल एक ही चीज को नियंत्रित कर सकता है, जो है मुद्रा प्रवाह। 

यह वाकई काफी अजीब बात है कि जिस चीज को आप इतनी अजीज मान रहे हैं, उसे कम से कम अजीज साबित करने लायक देसी आंकड़े रिजर्व बैंक के पास नहीं है।  वैसे, इस बारे में कुछ अधकचरे ज्ञान से लबरेज रिसर्च पेपर हैं, लेकिन उन पर भरोसा करना इस बात पर भरोसा करने के बराबर है कि टेलीविजन की वजह से लोगों का दिमाग खराब हो जाता है।

शायद आरबीआई भी वही कर रहा है, जो दुनिया भर के दूसरे विकासशील मुल्क कर रहे हैं। लेकिन इससे तो उसके कदम सही तो नहीं साबित हो जाते हैं। वैसे, इससे यह बात जरूर साबित हो जाती है कि रिजर्व बैंक उसी तरफ चलना पसंद करता है, जिस तरफ सभी केंद्रीय बैंक चल रहे हैं। वजह काफी साफ है, कोई अगर भीड़ में चल रहे हों तो आप अपनी नाकामयाबी का ठीकरा दूसरों के सिर मढ़ सकते हैं।

चीन ने ब्याज दरों में इजाफा करना बंद कर दिया है और वहां असल ब्याज दर -3.5 फीसदी है। कोरिया में इसे बढ़ाया तो गया है, लेकिन वहां भी असल ब्याज दर केवल -0.75 फीसदी ही है। दूसरी तरफ, भारतीय कंपनियों को अपने प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले दो से पांच फीसदी ज्यादा ब्याज दर चुकाना पड़ रहा है। अभी हाल ही में न्यूजीलैंड और चेक गणराज्य ने ब्याज दर में एक चौथाई फीसदी की कमी की है।

दोनों का कहना है कि महंगाई एक वैश्विक दिक्कत है। इसलिए इसे और तेल की कीमतों को मौद्रिक नीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। इसलिए ब्याज दरों में कमी से उनके नागरिकों का काफी राहत मिलेगी। अंतरमुखी विकास कोई दूर की कौड़ी नहीं है, लेकिन शायद रिजर्व बैंक ने इसे उसी निगाह से देखती है। कम से कम उसके और सरकार की बातों और कदमों से तो यही लगता है।

बड़े-बड़े धन्ना सेठ तो आज अंतरराष्ट्रीय बाजार से काफी कम ब्याज दर पर कर्ज हासिल कर रहे हैं। इसलिए ऊंचे ब्याज दर की नीति से सबसे ज्यादा नुकसान मिडल क्लास और गरीबों को उठाना पड़ रहा है। ऊपर से हमारे मुल्क में ब्याज की चढ़ती दर से दुनिया पर कोई असर नहीं पड़ रहा। दुनिया में आज भी जिंसों और कच्चे तेल की कीमतें काफी ऊंची हैं।

यही कीमतें भारत की महंगाई की दर को आने वाले कल में तय करेंगी, जिस पर काबू करना मुझे नहीं लगता कि आरबीआई के बूते की बात होगी। बदकिस्मती से रिजर्व बैंक की पॉलिसी से अपने मुल्क की विकास दर पर बुरा असर पड़ा है।

First Published : August 8, 2008 | 10:48 PM IST