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सपनों की सैलरी पर पड़ी हकीकत की तीखी मार

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:45 AM IST

इस साल अप्रैल में आईसीआईसीआई बैंक ने ऐलान किया था कि वह इस बार प्रमोशन और मोटे बोनस नहीं देगा। हर साल मिलने वाले इन ‘तोहफों’ को इस साल नहीं दिए जाने की इस घोषणा से लोगों को काफी हैरानी हुई।


हो भी क्यों नहीं? आखिर देश के सबसे बड़े प्राइवेट बैंक का यह ऐलान उस आम धारणा के ठीक उलट था कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ने के संकेतों के बावजूद हम हिंदुस्तानियों की तनख्वाह तेज रफ्तार से आगे बढ़ती रहेगी। लोगों का यह कहना था कि आईसीआईसीआई बैंक का यह कदम एक बहुत बड़ी बेवकूफी है क्योंकि पहले से ही बैंकिंग सेक्टर अच्छे लोगों की कमी से जूझ रहा है।

इस ऐलान के बाद नए लोग उससे दूर चले जाएंगे और उसके इस कदम का फायदा दूसरे बैंकों को मिलेगा। बैंक में कुशल कर्मचारियों की अच्छी-खासी कमी पैदा हो जाएगी। बैंक के इस कदम से दुनिया की उन बड़ी-बड़ी कंसल्टिंग फर्मों को करारा झटका लगा, जिन्होंने कहा था कि इस साल भी सबसे ज्यादा इजाफा भारतीय कामगारों के वेतन में ही होगा। उन्होंने तो बकायदा इस इजाफे के लिए 15 फीसदी औसत दर का ऐलान भी कर दिया था।

हालांकि, इन बातों से आईसीआईसीआई बैंक पर कोई असर नहीं हुआ। उसने इस साल कर्मचारियों की तनख्वाह में आठ फीसदी का सामान्य इजाफा भर किया, प्रमोशन नहीं दिए और मोटे बोनस भी नहीं बांटे। तीन महीने बाद आईसीआईसीआई ग्रुप के मानव संसाधन प्रमुख राम कुमार ने बताया कि उनकी कंपनी में इस्तीफा देने वाले लोगों की तादाद में इजाफा नहीं हुआ है, जरा सा भी नहीं। कई लोगों को यह भी लगता है कि आईसीआईसीआई बैंक में सैलरी में बस ठीक-ठाक से इजाफा असल में महंगाई की ऊंची दर की वजह से हुआ है।

लेकिन राम कुमार ने इस बात को सिरे से नकार दिया। उनके मुताबिक पिछले चार पांच सालों में लोगों की सैलरी और बोनस में अच्छा-खासा इजाफा हुआ है। इसलिए बैंक ने उन्हें अपनी तरफ से पूरा आराम दिया है। कंपनी के मुताबिक अर्थव्यवस्था में उठापटक बस कुछ ही दिनों के लिए आई है और चीजें फिर से पटरी पर आ जाएंगी। राम कुमार का कहना है कि, ‘आईसीआईसीआई बैंक अपना काम कंसल्टेंट के मुताबिक नहीं करता है। उनकी ज्यादातर रिपोर्ट ओपिनियन सर्वे पर निर्भर होती हैं और उन रिपोर्ट के पीछे कोई मजबूत आर्थिक तर्क नहीं होता है।

हम आर्थिक परिस्थितियों को देख समझ कर ही अपना कोई फैसला लेते हैं।’ इतने बड़े रिटेल पोर्टफोलियो वाला कोई भी बैंक एक नियम को गांठ बांध कर रखता है। यहां अगर मुनाफा कमाना है कि परिचालन खर्च कभी भी कुल कमाई के 45 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए।  साथ ही, यहां कर्मचारियों की सैलरी भी कुल परिचालन खर्च के एक तिहाई यानी कुल कमाई के 15 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए। जो लोग यह सोचते हैं कि सैलरी बढ़ाने से ही लोगों को कंपनी छोड़ने से रोका जा सकता है, वैसे लोगों के लिए राम कुमार के पास एक अच्छी खासी सलाह है।

उनका कहना है कि,’आपने जितने पैसे बढ़ाने का इरादा किया है, उसमें से एक हिस्सा अपने कर्मचारियों को टे्रनिंग देने में खर्च कीजिए। भले ही वह रकम फीसदी में कम लगे, लेकिन उसे खर्च जरूर कीजिए। मान लीजिए कि आपकी कंपनी का मैनपॉवर बजट है 2000 हजार करोड़ रुपये का, जिसमें से 80 करोड़ रुपये आप टे्रनिंग पर खर्च करते हैं। अगर आपने सैलरी में 10 फीसदी इजाफे का इरादा किया है, तो इसका मतलब है कि आपका बजट बढ़कर 200 करोड़ रुपये बढ़ जाएगा।

अगर आप तनख्वाह में इजाफा कम करके नौ फीसदी कर दें, तो इससे लोगों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। अब आप बचे हुए पैसे को ट्रेनिंग में लगा दें तो आपका टे्रनिंग बजट बढ़कर 100 करोड़ रुपये हो जाएगा, मतलब 25 फीसदी की मोटी-ताजी बढ़ोतरी। ट्रेनिंग की रकम में हुआ इजाफा वह कमाल कर सकता है, जो सैलरी में हुई वृध्दि कभी नहीं कर सकती। दुनिया में ऐसी कोई नौकरी नहीं है, जहां कोई भी समझदार इंसान 60 दिन के भीतर काम को नहीं सीख सकता।’ 

इसका मतलब यह हुआ कि भारत में भी अब कुछ समय के लिए सैलरी में मोटी-ताजी बढ़ोतरी दूर का सपना बनकर रहेगी। पिछले चार-पांच सालों में मुल्क की अर्थव्यवस्था की अच्छी-खासी हालत का यह मतलब था कि ज्यादा सैलरी पर कंपनियां लोगों को लेने को तैयार थीं। कई मामलों में तो उन्होंने जरूरत से ज्यादा लोगों या फिर जरूरत से ज्यादा सैलरी देकर लोगों को लिया था। कौन भला आर्थिक प्रगति से मिले मौके को गंवाना चाहेगा, इसीलिए तो वे ऐसा कर रही थीं। दूसरी कंपनियों की तरह आईसीआईसीआई बैंक ने भी वही किया। लेकिन आज माहौल बदल चुका है।

आज आर्थिक विकास को खाद्यान्न और कच्चे तेल की बढ़ती कीमत की नजर लग गई है। ऊपर से कोई यह भी नहीं बता सकता कि यह आर्थिक उठा-पटक कब तक खत्म होगी। ऐसे माहौल में एक ही बात तय है और वह यह है कि इस हालत में मांग और लोगों की संवेदनाओं को करारा झटका लगेगा। अगर किसी कंपनी को बाजार की उम्मीद पर खरा उतरने वाला एक लागत ढांचा बनाना है तो उसे पूंजी और लागत को तो ध्यान में रखना ही पड़ेगा।

राम कुमार का कहना है कि, ‘एक एचआर मैनेजर,  फाइनैंस मैनेजर से ज्यादा अलग नहीं होता। वह भावनाओं में नहीं बह सकता और न ही कर्मचारियों के भले के लिए कोई गलत धारणा पाल सकता है। वेतन एक स्थिर लागत है, लेकिन वेतन में इजाफा वैकल्पिक लागत है। अच्छे वक्त में भले ही इस पर ध्यान न दिया जाता हो, लेकिन बुरे वक्त में इसे काबू रखना चाहिए। आखिर आप डाइबिटीज से पीड़ित अपने बच्चे को सिर्फ इसीलिए चॉकलेट नहीं खिला देते हैं क्योंकि वह रो रहा होता है।’ हालांकि, बड़े-बड़े मैनपॉवर कंसल्टेंट उनके इस तर्क से संतुष्ट नहीं हैं।

एक बड़े कंसल्टेंट ने कहा कि, ‘अपने मीडिया को ही ले लीजिए। आज की तारीख में हर बड़ा मीडिया हाउस नए लॉन्च की तैयारी कर रहा है। कल तक सेंट्रो में घूमने वाले पत्रकार आज पेजोरो में घूम रहे हैं।’ उनका कहना है कि उन्हें इस फैसले पर आने के लिए किसी ओपिनियन सर्वे की जरूरत नहीं पड़ी। उनका कहना है कि, ‘यह तो अर्थशास्त्र का सामान्य तर्क है। इस साल कुछ सेक्टरों में सैलरी नहीं बढ़ेगी, लेकिन दूसरी जगह नए खिलाड़ी आ रहे हैं और वहां अच्छे लोगों की भी कमी है। ऐसे में तो उनकी सैलरी में इजाफा बदस्तूर जारी रहेगा।’

First Published : July 2, 2008 | 10:13 PM IST