संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में सरकार की योजना एक बड़ा विधेयक पेश करने की है जिसका लक्ष्य देश में कारोबारी सुगमता में इजाफा करना होगा। यह विधेयक उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय राज्यों के साथ मशविरा करके तैयार कर रहा है और यह कई छोटे मोटे अपराधों की सजा को कैद से कम करके जुर्माने तक सीमित करने पर ध्यान केंद्रित करेगा। उदाहरण के लिए किसी कंपनी के अधिकारियों को कैंटीन या शौचालय में पुताई आदि न कराने जैसे छोटे अपराधों के लिए अभी जेल की सजा हो सकती है जिसे कम करके जुर्माने में तब्दील कर दिया जाएगा।
यह विधेयक सरकार की उस कोशिश का हिस्सा है जिसके तहत वह बीते कुछ वर्षों से 30,000 से अधिक अनुपालनों को समाप्त करने या व्यावहारिक बनाने की कोशिश कर रही है। कंपनी कानून को इस कवायद का काफी लाभ मिला है। पिछले वर्ष से ऐसी गतिविधियों मसलन कंपनियों द्वारा पंजीकृत कार्यालय पर बही खाते बरकरार नहीं रख पाना, कंपनी द्वारा कारोबारी सामाजिक उत्तरदायित्व पर तय राशि खर्च नहीं कर पाना, विदेशी कंपनियों से संबंधित प्रावधान तथा अंकेक्षकों द्वारा धोखाधड़ी की रिपोर्ट करने जैसी बातों का अनुपालन न करने आदि पर अब जेल की सजा के बजाय केवल जुर्माना होगा।
कारोबारी सामाजिक उत्तरदायित्व का अनुपालन न होने मसलन जरूरी धनराशि व्यय न करने पर अधिकतम तीन वर्ष की कैद की सजा का प्रावधान था जिसकी जगह भारी जुर्माना लगा दिया गया है। यह जुर्माना इतना अधिक है कि इससे अनुपालन सुनिश्चित हो सकेगा। कुल मिलाकर कंपनी कानून की 31 धाराओं में भी कंपनियों पर लगने वाले दंड को जुर्माने में बदल दिया गया है। कुछ प्रावधानों की प्रकृति को आपराधिक से बदलकर दीवानी कर दिया गया है। इसके लिए आंतरिक स्तर पर अधिनिर्णय ढांचा बनाया गया है और इसके लिए अधिकारियों की नियुक्ति की गई है।
इस कवायद का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह कारोबारी माहौल के लिए सकारात्मक माहौल बनाता है और अनुपालन का बोझ कम करके देश में कंपनियों की स्थापना की गति को तेज कर सकता है। इसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों द्वारा स्थापित की जाने वाली कंपनियां शामिल हैं। कंपनी मामलों के मंत्रालय के नजरिये से देखें तो इन कदमों के बाद छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देने के बजाय बड़ी कमियों पर गौर किया जा सकेगा। महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि यह भारी बोझ तले दबे राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट को भी राहत देता है क्योंकि उसे ढेर सारे छोटे-मोटे मामलों पर अपनी ऊर्जा नहीं लगानी होगी।
कारोबारों द्वारा छोटे मोटे उल्लंघन के मामलों में दंड का स्तर कम करने की बात करें तो ऐसे मामलों में इन्हें गैरआपराधिक बनाना काफी अनुशंसायोग्य है, भले ही विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता रैंकिंग (अब बंद कर दी गई) में तय मानकों में इनमें से बहुत कम बदलाव शामिल हों।
एक अहम कमी यह है कि इसके तहत कंपनियों और राज्य के बीच के टकरावों को कम नहीं किया गया है। ऐसा इसलिए कि अधिनिर्णय अधिकारी सरकारी कर्मचारी होते हैं। ऐसे में भ्रष्टाचार और राजनीतिक प्रभाव का जोखिम काफी अधिक बना रहता है। दूसरा, कंपनियां जुर्माने को, चाहे वह जितना भी अधिक हो, कारोबारी सुगमता की स्वीकार्य लागत मान सकती हैं।
तीसरा, यह सही है कि सैद्धांतिक तौर पर आपराधिकता कम करना सही हो सकता है लेकिन कारोबारी गतिविधियों से संबंधित सभी कानूनों पर इन्हें लागू करना शायद गलत भी साबित हो सकता है। ऐसे में पर्यावरण संबंधी कानूनों के कुछ प्रावधानों की आपराधिकता को समाप्त करने को लेकर बात की जा सकती है।
मसलन जल एवं वायु प्रदूषण कानून तथा सबसे महत्त्वपूर्ण लोक दायित्व बीमा अधिनियम जो औद्योगिक दुर्घटनाओं के पीड़ितों को राहत प्रदान करता है। देश में पर्यावरण के तेजी से बिगड़ते हालात को देखते हुए प्रदूषण और मानकों के उल्लंघन को लेकर एक ठोस नीति की जरूरत है। जहां तक लोक दायित्व बीमा अधिनियम की बात है, भोपाल गैस त्रासदी हमें निरंतर याद दिलाती है कि आखिर क्यों इस कानून को कभी शिथिल नहीं किया जाना चाहिए।