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नए गवर्नर के साथ नया होगा रिजर्व बैंक का रास्ता

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:05 PM IST

डॉ. वाई.वी. रेड्डी का हाल ही में रिजर्व बैंक के गवर्नर के तौर पर खत्म हुआ पांच साल का कार्यकाल काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा। इस दौरान मुल्क ने तरक्की की बुलंदियों को हासिल किया और वैश्विक स्तर पर हमारा दबदबा भी कायम हुआ।


दूसरी तरफ, इसी दौरान घरेलू अर्थव्यवस्था में बड़े स्तर पर बदलाव आए। इसलिए डॉ. सुब्बाराव ने बिल्कुल सही वक्त पर कुर्सी संभाली है। अब यह देखने के लिए बिल्कुल सही वक्त है कि अब तक पुरानी दवा मर्ज पर कितनी असर  कर रही है। साथ ही,  यह देखने का भी वक्त आ गया है कि नए निजाम के लिए नए कदम क्या होने चाहिए? 

इस वक्त तो सबसे ज्यादा जरूरत यह सुनिश्चित करने की है कि कारोबार की गाड़ी बदस्तूर चलती रहे। पिछले कुछ वक्त से इसकी रफ्तार में आई कमी का नतीजा अर्थव्यवस्था पर साफ तौर से दिख रहा है। कारोबार की गाड़ी की रफ्तार इस साल की शुरुआत से ही बढ़ती महंगाई की वजह से कम होती जा रही है।

2006 के अंत में जब रिजर्व बैंक ने तरलता पर लगाम कसने की कवायद शुरू की थी, तब के हालत काफी हद तक जुदा थे। तब लग रहा था कि अर्थव्यवस्था कुछ ज्यादा ही तेज रफ्तार से बढ़ रही है। इसलिए जरूरत थी ऐसे नियमों की, जिनकी मदद से महंगाई की दर पर अच्छी तरह से लगाम लगाई जा सके।

दरअसल, पूरी दुनिया के लिए 2007 ऐसा साल था, जब कारोबार विकास की गाड़ी काफी तेज रफ्तार से दौड़ रही थी। इस वजह से कई सेंट्रल बैंक अपनी दखल को कम से कम रखना चाह रहे थे। कई केंद्रीय बैंकों ने तो 2008 में ब्याज दरों को भी कम करने के बारे में सोचना शुरू कर दिया था। लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में आए तेज इजाफे ने सबकुछ गुड़-गोबर कर दिया।

कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग ने दूसरी चीजों को भी महंगाई के हवाले कर दिया। सिवाए अमेरिका के बाकी सभी सेंट्रल बैंकों को महंगाई के दानव की वजह से ब्याज दरों पर काफी कड़ाई के साथ लगाम कसनी पड़ी। अमेरिकी फेडरल रिजर्व को तो इस साल की शुरुआत में ही ब्याज दरों में गिरावट करनी पड़ी थी। वजह थी, वहां छाई आर्थिक मंदी के बादल।

वैसे, दूसरों मुल्कों ने जो ब्याज दरों में इजाफा किया है, उसका असर अब साफ तौर से विकास दर पर देखा जा सकता है। लेकिन महंगाई का राक्षस तो काबू में ही नहीं आ रहा है, बल्कि इसका आकार तो अब खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। कम होती विकास दर और ऊंची महंगाई दर को नीतियों की नाकामयाबी के तौर पर देखा जा रहा है। इस वजह से नए निजाम को इस रुख को बदलने का मौका मिलेगा।

अब यह रुख कैसे बदला जाए, इस फैसले को लेने में हालिया अनुभव काफी काम आ सकते हैं। छोटे, लेकिन संगठित फैसले मांग को बढ़ाते आए हैं और इसी वजह से पिछले साल विकास दर की हालत इतनी अच्छी रही है। यह पूरी व्यवस्था की कार्यकुशलता को दिखलाती है, जिसकी वजह से फैसले आर्थिक गतिविधियों पर असर डालते हैं।

यह व्यवस्था जितनी अच्छी होगी, चूक होने की गुंजाइश उतनी ही कम होगी। इससे गलत फैसलों का खतरा उतना ही कम हो जाता है। रिजर्व बैंक ने अपने लिए जो राह चुनी है, उसका उसने अच्छे तरीके से विश्लेषण किया है। साथ ही, वह एक खास रास्ते पर ही चल रहा है। इस रास्ते के समर्थकों का कहना है कि इससे रिजर्व बैंक को अपना ध्यान आज की हालत के साथ-साथ मध्यम अवधि पर भी रखने में सहूलियत होगी।

इसलिए अगर महंगाई की दर बैंक की उम्मीद से बढ़ जाती है, तो उसे साधने के लिए खास नीतियों की जरूरत होगी। अगर उसके बाणों से महंगाई का दानव सध नहीं पाया तो इससे निवेशकों और उपभोक्ताओं के बीच बहुत ही खराब संकेत जाएंगे। हो तो यह भी सकता है कि इसकी वजह से लोग बाग लंबे समय के लिए फैसलों में बदलाव कर दें, जिसका अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है।

अगर वे खास नीतियां काम कर गईं तो लोगों को यह भरोसा हो जाएगा कि उतर-चढ़ाव बेहद थोड़े वक्त आ सकता है। इसलिए यहां दूरदर्शिता काफी अहमियत रखती है। मैं पिछले पांच सालों से रिजर्व बैंक की मौद्रिक हरकतों पर नजर रखे हुए हूं। इन सालों के दौरान मुझे रिजर्व बैंक अधिकारियों के नीतिगत फैसलों के बारे में भविष्यवाणी करने मामले में काफी बेहतरी नजर आई है।

आज रिजर्व बैंक अधिकारी बाजार को भौचक्का करने में मामले में काफी नाम कमा चुके हैं। खुद डॉ. रेड्डी भी इस मामले में काफी मशहूर रह चुके हैं। मेरे ख्याल से इन पांच सालों में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीतियां, एक-दो मामलों को छोड़कर, काफी हद तक सही रास्ते पर चलना सीख चुकी हैं। यहीं सही रास्ते की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

एक बार रास्ता चुन लिया गया तो हमारे लाख चीखने-चिल्लाने के बावजूद भी बीच राह में रास्ता बदलना बहुत बड़ी मुसीबत को बुलावा देने के बराबर होगा। अगर डॉ, राव के बयान के नजरिये से देखें तो वह इस वक्त सबसे ज्यादा अहमियत महंगाई की आग को बुझाने में खर्च करेंगे। इसका मतलब यह हुआ कि वह मौजूदा रास्ता ही चलते रहेंगे और ब्याज दरों में कोई भी गिरावट तभी आएगी, जब महंगाई की दर में खतरे के निशान से नीचे आ जाएगा। 

चलिए अब दूसरी कसौटी की तरफ चलते हैं, जहां राव की काबलियत को कसा जाएगा। यह कसौटी है विनिमय दरों की। डॉ. रेड्डी के कार्यकाल के पहले साढ़े तीन साल में मुल्क की तरफ विदेशी निवेशकों खिंचे चले आ रहे थे। लेकिन रिजर्व बैंक के रुख की वजह से ही रुपये की सेहत खासा इजाफा नहीं आ पा रहा था।

हमारे आस-पड़ोस के मुल्कों ने भी विदेशी मुद्रा का अच्छा-खासा भंडार बनाना शुरू कर दिया. ताकि बाजार में तरलता पर काबू रखा जा सके। इससे हमारे रुख को बल मिला, लेकिन क्या यही मुसीबतों से निपटने का एक अच्छा तरीका था  यह वाकई अच्छा खासा सवाल है। खास तौर पर तब जब हमारे विकास का इंजन हमारा खुद का बाजार ही है। 

हालांकि, यह बात अब काफी पुरानी हो चली है और हमें पिछले और इस साल की घटनाओं पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। पहली बात तो यह है कि हमने छेड़छाड़ करना बंद कर दिया तो रुपये की सेहत में अचानक ही काफी मजबूती हो गई। इससे एक तबका तो काफी खुश हो गया, जबकि दूसरे के दुख का आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते।

दूसरी तरफ, जब लगा कि हालात सुधर रहे हैं, तभी वैश्विक उथल-पुथल की वजह से विदेशी निवेशकों ने अपने पैसे खिंचने शुरू कर दिया। इस वजह से वह अचानक ही काफी कमजोर पड़ गया। आज तो वह उस स्तर से भी नीचे है, जिस पर वह मार्च में था।

दिक्कत असल में रिजर्व बैंक की घोषित स्थिति और बाजार की सोच में है। बैंक के मुताबिक वह केवल उथल-पुथल को कम करता है, विनिमय दरों पर उसका कोई जोर नहीं है। लेकिन बाजार को ऐसा नहीं लगता है। विदेशी मु्द्रा का मोटा भंडार और विनिमय दरों को केवल एक खास बैंड में ही सिमट कर रह जाना ही पूरी कहानी बयां कर देता है।

अगर पिछले डेढ़ साल में जो बदलाव आया है, तो इसमें किसी को कोई दिक्कत नहीं है। अब तो बिल्कुल ही नहीं, जब करेंसी का वायदा कारोबार शुरू हो चुका है। लेकिन किसी नीति को कामयाब होने के लिए जरूरी है कि उसे साफ-साफ तरीके से बनाया जाए। जो, मुझे लगता है, नहीं किया गया है। यह नए गवर्नर की सबसे बड़ी अहमियत होने चाहिए और उसे जल्द से जल्द करना चाहिए।

First Published : September 7, 2008 | 10:48 PM IST