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बढ़ती महंगाई और पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतों में बढ़ोतरी से मचा कोहराम

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 5:01 AM IST

…जनता से धोखा क्यों
राजीव प्रताप रूडी, प्रवक्ता, भारतीय जनता पार्टी


जब हम सरकार पर अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन का आरोप लगाते हैं तो इसका मुख्य आधार यह है कि सरकार ने बगैर किसी योजना के लोक लुभावन घोषणाएं कीं जिनका बजट में कोई जिक्र नहीं था।

सरकार ने अर्थव्यवस्था के साथ उसी तरह का रवैया अपनाया जैसा कि उसने स्टॉक मार्केट के साथ किया था। सरकार ने 9 प्रतिशत क ी विकास दर के बहाने कई कारस्तानी करने की कोशिश की। उतने संसाधन नहीं जुटाए जा सके जितना कि उम्मीद की गई थी। इसकी वजह यह है कि दुनियाभर में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती रही।

सबसे पहले वित्त मंत्री ने लोकलुभावन उपायों की घोषणा करते हुए यह उम्मीद जताई कि विकास की दर 9 प्रतिशत तक पहुंचेगी। इसके साथ ही उन्होंने यह भरोसा दिलाया कि राजकोषीय ढांचा इतना सक्षम है कि सरकार बजट में अपने किए गए वादे को पूरा कर सकती है। हालांकि इन वादों को पूरा करने के लिए विशेष फंड का इंतजाम कैसे किया जाएगा इसकी चर्चा संसद में नहीं की गई। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का अनुमान पहले ही लगाया जा रहा था और जब कीमतें बढ़ने लगी उस वक्त सरकार विकल्पों के  लिए जूझने लगी।  

सरकार की तेल और खाद के लिए चार लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी और गैरबजटीय लोकलुभावन वादे पूरी तरह से असफल रहे। एनडीए की सरकार के कार्यकाल में भाजपा ने सीधे तौर पर राजकोषीय सुधार के लिए गंभीर कदम उठाए। वर्ष 2002 में एनडीए सरकार ने साफ तौर पर कहा कि विकास के लिए सब्सिडी या सामाजिक क्षेत्र में जो भी योजनाएं बनाई जाएंगी उसे बजट में जरूर पेश किया जाएगा। इन योजनाओं पर जो खर्च किया जाएगा वह भारत की संचित निधि से ही किया जाएगा। इसमें ऑयल सेक्टर की सारी सब्सिडी भी शामिल है। साफ तौर पर वर्तमान सरकार ऐसा करने में असफल रही।

दूसरी ओर तेल की कंपनियां को इतनी छूट मिलनी चाहिए कि वे कीमतें तय करें। अगर तेल की कीमतों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी होती है तो बजट में उसके लिए सब्सिडी का प्रावधान होना चाहिए। सरकार को भी स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए उत्पाद करों में छूट देनी चाहिए। एनडीए सरकार ने 1 अप्रैल 2002 को इन नीतियों को लागू किया। मौजूदा वित्त मंत्री पहले की संयुक्त मोर्चा सरकार में भी इसी पद पर ही थे।

वह उन लोगों में से एक हैं जिन्होंने इस तरह के सुधारों के लिए रास्ता तैयार किया था। आर्थिक सुधारों के पैरोकार वित्त मंत्री ने पहले इस तरह के कदम उठाने की कोशिश की थी फिलहाल उन्होंने इस तरह के सुधारों के लिए कोई कदम उठाना छोड़ दिया है।  उन्होंने लोगों को भरोसा दिलाने के लिए , मैं हूं ना जैसे भावनात्मक शब्दों से रिझाने की कोशिश की लेकिन हम जानना चाहते हैं कि इस अव्यवस्था और गड़बड़ी के बीच वित्त मंत्री कहां हैं।

सच तो यह है कि देश की जनता को यह नहीं समझाया गया है कि दुनिया भर में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर देश की वित्तीय स्थिति कैसी होगी। सरकार हर मुद्दे पर ढुलमुल रवैया अपनाती रही। हालांकि आर्थिक हालात ज्यादातर पहले से ही स्पष्ट होते हैं और उसी के मुताबिक नीतियां बनती हैं। केंद्र की यूपीए सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाया जा सके।

महंगाई बढ़ने लगी और पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा, तो सरकार को याद आई कि नवरत्नों को बचाना भी जरूरी है। इसके पहले तमाम खर्चों को बजट से छिपाए रखा गया। प्रधानमंत्री ने स्थिति पर नियंत्रण के  उपायों के संदर्भ में जो बयान दिया है वह भी इस मामले पर भाजपा के रुख से ही मिलता जुलता है।

प्रधानमंत्री ने अफसोस के साथ यह स्वीकार किया है कि सुधारों को लागू करने में वह असफल रहे हैं। प्रधानमंत्री ने इस बात को स्वीकार कर हमारे इस दावे को और भी मजबूत कर दिया है कि वह 10 जनपथ और वाम दलों की नीतियों के प्रभाव में हैं। यही वजह है कि वे सही फैसले लेने और सरकार चलाने में अक्षम साबित हुए।

गिरेबान में झांके भाजपा
मनीष तिवारी, प्रवक्ता, इंडियन नेशनल कांग्रेस

तेल की कीमतें बढ़ाने के सरकार के फैसले को भाजपा ने आर्थिक आतंकवाद का नाम दिया है। मीडिया ने एक सुर में इस तरह के बचकाने और गैरजिम्मेदाराना बयान की निंदा की है क्योंकि उस पार्टी से इस तरह की शब्दावली के इस्तेमाल की उम्मीद नहीं की जा सकती, जिसने इस देश में  6 साल तक गठबंधन की सरकार चलाई है। इस तरह की तीखी और कठोर शाब्दिक कुश्ती खेलने के बजाए अगर भाजपा अपनी एनडीए सरकार के कार्यकाल का ट्रैक रिकॉर्ड देखती तो ज्यादा बेहतर होता।

वर्ष 1998 के अप्रैल महीने में जब एनडीए गठबंधन की पहली बार सरकार बनी थी तो उस वक्त एक बैरल कच्चे तेल की कीमत औसतन 12.50 डॉलर प्रति बैरल थी। नवंबर 1999 में जब केंद्र में फिर से एनडीए की सरकार बनी तब कीमतें 22.75 डालर तक पहुंच गईं। मई 2004 में जब वे केंद्र की सत्ता से बाहर हुए उस वक्त कच्चे तेल की कीमत थी 36.25 डॉलर प्रति बैरल। अप्रैल 1998 से मई 2004 तक तेल की कीमतों में कुल इजाफा हुआ औसतन 23.75 डॉलर प्रति बैरल।

अब इससे उलट यूपीए सरकार के चार साल की बात करते हैं। तेल की कीमतें मई 2004 के औसतन 36.25 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 21 मई 2008 को 133.84 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। यानी औसतन 97.59 डॉलर प्रति बैरल का इजाफा हुआ। इस साल 6 जून को तेल की कीमतों ने तो आसमान छू लिया। एक ही दिन के कारोबार में तेल की कीमतें 10 डॉलर बढ़कर 139 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं।

गौरतलब है कि मई 2004 से जून 2008 के बीच तेल की कीमतों में 411 प्रतिशत का इजाफा हुआ। ध्यान देने की बात यह है कि भारत अपनी तेल की जरूरतों का 78 प्रतिशत आयात करता है।  अब यह देखिए कि अलग पार्टियों की दोनें गठजोड़ सरकारों ने इस तरह की बढ़ोतरी के लिए क्या कदम उठाए। एनडीए सरकार के कार्यकाल के दौरान सार्वजनिक वितरण प्रणाली से मिलने वाले केरोसिन तेल की कीमतें 2.25 रुपये से बढक़र 9.01 रुपये हो गईं।

यानी चार साल के कार्यकाल के दौरान केरोसिन की कीमतों में 6.49 रुपए की भारी बढ़ोतरी हुई। वहीं अगर आप यूपीए सरकार के चार साल के कार्यकाल की बात करें तो पाएंगे कि वैट की वजहों से केवल 8 पैसे की बढ़ोतरी हुई। आपको यह मालूम होना चाहिए कि  सार्वजनिक वितरण प्रणाली से मिलने वाला केरोसिन गरीबों के  काम आता है न की अमीरों के।

एनडीए की सरकार के फरवरी 1999 से मई 2004 के 5 सालों के कार्यकाल में एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में 109.60 रुपये की बढ़ोतरी हुई। यूपीए सरकार ने अपने चार साल के कार्यकाल के दौरान जून 2006 में एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में 33.15 रुपये की बढ़ोतरी की। उसके बाद 50 रुपये अबी हाल में बढ़ाए, इस तरह कुल इजाफा हुआ 83.15 रुपये।

कीमतों में यह बढ़ोतरी भी एनडीए सरकार के कार्यकाल के दौरान एलपीजी पर बढ़ाए गए दाम से 26.45 रुपये कम ही थी। अगर कांग्रेस शासित प्रदेशों मसलन आंध्र प्रदेश, दिल्ली ने एलपीजी की बढ़ी हुई कीमतों का भार उठाकर जनता को पूरी राहत दी है।  आंध्र प्रदेश के उपभोक्ताओं को एलपीजी के लिए पहले जितने ही पैसे देने होंगे, जबकि दिल्ली के उपभोक्ताओं को 10 रुपये अतिरिक्त देने होंगे। लेकिन दूसरी तरफ भाजपा शासित राज्यों ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए ऐसे कोई कदम नहीं उठाए हैं।

इसी तरह एनडीए सरकार के कार्यकाल के दौरान डीजल की कीमतें 12.87 रुपये बढ़ी वहीं यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान 12.02 रुपये की बढ़ोतरी हुई। इस वृध्दि में हाल में डीजल के बढ़ाए गए दाम भी शामिल है। एक बार फिर कांग्रेस शासित प्रदेशों की सरकार ने वास्तव में लोगों को राहत देने के लिए बिक्री करों और वैट में कटौती की। पेट्रोल की कीमतों में भी एनडीए सरकार ने 11.77 रुपये की बढ़ोतरी की जबकि यूपीए की सरकार ने 14.51 रुपये की बढ़ोतरी की।

एनडीए सरकार के कार्यकाल के दौरान पेट्रोल की कीमतों में 21 बार इजाफा हुआ जबकि डीजल के दाम में 24 बार। दूसरी ओर यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान केवल दो बार ही कीमतें बढ़ाई गई। अब भी अगर ऑयल मार्केटिंग कंपनियां दिवालिया होने के कगार पर न आई होतीं और सबको कुल मिलाकर 2,45,305 करोड़ रुपये का घाटा नहीं हो रहा होता तो यूपीए सरकार इस पूरे बोझ को उठा लेती ।

हालांकि आयात कर और उत्पाद करों में कटौती  की गई है और तेल बांड जारी किए गए हैं, फिर भी केंद्र सरकार और ऑयल मार्केटिंग कंपनियां अब भी 91 प्रतिशत बोझ उठा रही हैं। हमारे सामने दो ही स्थितियां थीं, या तो नवरत्न कंपनियां दिवालिया हो जाएं या फिर राजनीतिक योग्यता पर सवालिया निशान लगाए जाएं।

देश हित में अपनी परंपरागत कदमों का जारी रखते हुए यूपीए सरकार ने नवरत्न कंपनियों की भलाई के बारे में ही सोचा। अच्छा होगा कि हमारे सहयोगी वाम दल अपनी राज्य सरकारों के प्रायोजित बंद के बजाय इस चुनौती से निपटने के लिए अपनी सरकारों से बेहतर कदम उठवाएं।

First Published : June 11, 2008 | 11:44 PM IST