सही है कि महंगाई की समस्या महज कुछ देशों की समस्या न रह कर वैश्विक रूप धारण कर चुकी है।
और इसकी सबसे बड़ी वजह है कि जिस तरह से कमोडिटीज की मांग बढ़ रही हैं, उन्हें पूरा कर पाना क्षमता से बाहर होता जा रहा है। भले ही यह समस्या वैश्विक हो, पर इससे निपटने के लिए विभिन्न देश जो नीतियां बनाएंगे, वे उनके खुद के पैमानों के आधार पर होंगी।
तो ऐसे कौन से देश होंगे जो मांग को काबू में रखने के लिए आवश्यक कदम उठाएंगे? जो तीन बड़े वैश्विक खिलाड़ी हैं- अमेरिका, यूरोपीय यूनियन और चीन, उनमें से बस यूरोपीय यूनियन ही एकमात्र देश है जिसने मांग को काबू में रखने के लिए कठोर मौद्रिक नीतियां अपनाई हैं। अमेरिका और चीन ने अब तक इस दिशा में कुछ नहीं किया है।
अमेरिका ने अपनी वित्तीय व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए और मंदी को टालने के लिए विस्तारीकरण की मौद्रिक नीति और राजकोषीय नीतियां अपनाई हैं। इससे फायदा कितना हुआ है यह तो अलग बात है पर विश्व स्तर पर कीमतें बढ़ी ही हैं। वहीं दूसरी ओर चीन ने सख्त मौद्रिक नीतियां तो अपनाई हैं पर इसका पैमाना काफी कम रहा है और कहीं इसका उल्टा असर आर्थिक मंदी के तौर पर न पड़े, इस वजह से ज्यादा सख्ती नहीं बरती गई है।
पर अब भारत को कौन से कदम उठाने चाहिए? हालांकि यह बहुत आसान है और शायद यह गलत भी नहीं होगा कि भारत में जारी उठा पटक के लिए बाहरी कारक जिम्मेदार हैं, पर इसका मतलब यह नहीं है कि सारा दोष बस इनके मत्थे ही थोप कर चुपचाप बैठ लिया जाए। भारत में नीति निर्माताओं को सही समय पर सही कदम उठाना चाहिए।
सबसे पहले तो यह समझना होगा कि अगर इस हालात के लिए बाहरी कारक जिम्मेदार हैं भी तो अब देश के भीतर स्थितियों को ठीक करने के लिए खुद कदम उठाना होगा। चीजें सुधारने के लिए बाहर से कोई आने वाला नहीं है इतना तो तय है। न तो अमेरिका और न ही चीन कोई ऐसा कदम उठाने जा रहा है जिससे औसत भारतीय उपभोक्ताओं को तत्काल कोई राहत मिल सके।
दूसरे अब हम ऐसे दौर में पहुंच चुके हैं जहां प्रारंभिक आपूर्ति के झटकों ने देश के अंदर कीमतों को बढ़ाने का काम कर दिया है। या सामान्य शब्दों में कहें तो अब महंगाई घरेलू समस्या बन चुकी है और इसके लिए नीतियां घरेलू स्तर पर ही बनाई जानी चाहिए। पर सवाल यह है कि आखिर अब तक हमने क्या देखा है? माइक्रोइकोनॉमिक स्तर पर कारोबार और कीमतों पर लगाम लगाने के जो कदम उठाए गए हैं, उनसे मदद कम ही मिली है।
वहीं अगर मैक्रो स्तर पर उठाए गए कदमों की चर्चा करें तो एकमात्र कठोर कदम पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को बढ़ना रहा है। बाकी जो कदम उठाए गए हैं उनके लिए अगर अंक दिए जाएं तो सरकार को 10 में से 2 अंक ही हासिल होंगे। जरा इस बारे में विचार करें कि सरकार ने जो राजकोषीय, मौद्रिक और विनिमय दर से संबंधित नीतियां अपनाई हैं वे न सिर्फ अपर्याप्त रही हैं बल्कि, उनका उल्टा प्रभाव भी पड़ा है।
राजकोषीय स्थिति बिगड़ रही है और वह भी ऐसे समय में जब महंगाई की दर सुरसा के मुंह की तरह बड़ी होती जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा इस साल और बढ़ सकता है। ऋण माफी, वेतनमान में बढ़ोतरी, खाद सब्सिडी का ही परिणाम है कि इस साल राजकोषीय घाटा जीडीपी का 2.5 से 3 फीसदी तक बढ़ सकता है।
पेट्रालियम उत्पादों के लिए रिटेल कीमतों और सरकारी खर्च को तय करने से अब जब भी तेल की कीमतें बढ़ेंगी तो अपने आप राजकोषीय घाटा भी बढ़ जाएगा और साथ ही इससे महंगाई का दबाव और बढ़ेगा। ऐसे में यह कदम कितना सही है? पेट्रोलियम की कीमतों को लेकर जो नीति तैयार की गई है उस पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। हालांकि, उनमें तीन विंदु ऐसे हैं जिनकी चर्चा बार बार की जाती है।
अमेरिका और चीन की तरह ही भारत में भी तेल की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए कदम उठाए जाते हैं। ऐसी नीतियां अपना कर आखिरकार हम खुद का ही नुकसान कर रहे हैं। दूसरे, पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को तय करने से आम लोगों को नुकसान ही पहुंच रहा है क्योंकि देश में जो लोग ज्यादा मात्रा में पेट्रोल, डीजल की खपत कर रहे हैं, दरअसल वे आम भारतीय नागरिक से कहीं अधिक संपन्न हैं। पर आखिर नुकसान किसे हो रहा है?
अब अधिक खपत तो एक खास संपन्न वर्ग कर रहा है पर इसकी भरपाई या तो ऊंचे कर के तौर पर या फिर तेल के पेट्रोलियम पदार्थों के कारण उपजी महंगाई के तौर पर आम लोगों को ही करनी पड़ती है। पर तीनों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है जलवायु परिवर्तन। भारत दूसरे तमाम विकासशील देशों की तरह ही जलवायु परिवर्तन के लिए दोषी अमीर और विकसित देशों को कोसता है।
और इसमें कोई गलती भी नहीं है। पर जब तक हम खुद अपने देश में ईंधन की खपत को कम करने की नीति को बढ़ावा नहीं देंगे तब तक हम चाहे जितनी भी आवाज बुलंद कर लें हमारी बात को उतनी गंभीरता के साथ नहीं लिया जाएगा। पिछले कुछ महीनों में जो मौद्रिक और विनिमय दर की नीतियां अपनाई गई हैं वे सभी अपर्याप्त रही हैं।
फरवरी में कुछ बुद्धिजीवियों ने आरबीआई की यह कहते हुए आलोचना की कि ऐसे समय में जब अमेरिका ब्याज दरों में कटौती कर रहा है तो भी आरबीआई ब्याज दरों में कटौती की घोषणा नहीं कर रहा। तब आरबीआई ने यह कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया था कि महंगाई के दबाव को देखते हुए ही वह अभी ऐसे किसी कदम के लिए जल्दबाजी नहीं दिखा रहा है। बाद में यह साबित भी हो गया कि जो आलोचना कर रहे थे वे वास्तव में गलत थे और आरबीआई सही।
अब तक जो आरबीआई अपने कदमों को महंगाई का तर्क देकर जायज करार दिया करता था, उसी ने अप्रैल के मध्य में विनिमय दरों में कटौती की घोषणा कर सबको हैरत में डाल दिया। जबकि, उस समय भी महंगाई का दबाव हम पर उतना ही अधिक था। साथ ही पिछले कुछ दिनों में आरबीआई ने सीआरआर और रेपो रेट को बढ़ाया है। पर ये कदम छोटे तो है ही साथ ही ये देर से भी उठाए गए हैं।
दूसरा यह भी आश्चर्यजनक है कि अत्यधिक तरलता होने के बावजूद और महंगाई दर के 11 फीसदी के आंकड़े को छू लेने के बाद भी आरबीआई ने रिवर्स रेपो रेट को 6 फीसदी पर बनाए रखा है और इसमें कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। ऐसे में अगर मंहगाई को ध्यान में रखते हुए बात करें तो पता चलता है कि सरकार ने जो मौद्रिक और राजकोषीय नीतियां अपनाई हैं उनसे फायदा होने के बजाय नुकसान ही हुआ है।
सबसे अचरज वाली बात है कि ये जो कदम उठाए गए हैं उन्हें राजनीतिक हथकंडे के तौर पर भी सही नहीं ठहराया जा सकता। वजह है कि अगर इन कदमों से महंगाई बेलगाम हुई है तो उल्टे ये राजनीतिक पार्टियों के लिए घातक ही साबित होंगी।
यह भी सच है कि मौद्रिक नीतियों को सख्त बनाया जाता है तो इससे आर्थिक विकास की गाड़ी कुछ थम सकती है। पर ऐसे में जब महंगाई 11 फीसदी पर पहुंच चुकी है और विकास दर भी 9 फीसदी के सम्मानजनक स्तर पर है तो एक बारगी विकास दर को जोखिम में डालते हुए महंगाई पर लगाम की कवायद तो की ही जा सकती है।