मानसून का जलवा बरकरार
देवेन्द्र शर्मा, कृषि अर्थशास्त्री
भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून की एक खास भूमिका है। इस पर हमारी पूरी कृषि व्यवस्था टिकी हुई है।
यहां परंपरागत फसलचक्र की व्यवस्था ही कायम है। हमारे देश में 3 महीने बारिश होती है जिसके जरिए हमारी कृषि व्यवस्था का कल्याण होता है। इतने तकनीकी विकास के बाद भी मानसून पर हमारी कृषि व्यवस्था निर्भर न हो, इसके लिए लोग राय देने में लगे हुए हैं।
यह हमारे लिए दुर्भाग्य की बात है कि कॉलेजों में भी कृषि और अर्थशास्त्र विषय के छात्रों को यह समझाया जाता है कि मानसून पर हमारी निर्भरता गलत है और हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि हम अमेरिका के कृषि मॉडल को अपनाएं। जहां तक सिंचाई व्यवस्था की बात है इसकी भी एक सीमा है।
भारत की सिंचाई व्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी सिंचाई व्यवस्था है। एक बात तो तय है कि इससे ज्यादा बड़े पैमाने पर सिंचाई नहीं हो सक ती, इससे ज्यादा की हमारी क्षमता भी नहीं है। नदियों को जोड़ने की परियोजनाओं की बात की जाती है जबकि इसका कोई फायदा नहीं होने वाला। इसकी वजह यह है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियर पिघल रहे हैं और नदियों में पानी कम हो रहा है।
जब नदियों में पानी ही नहीं होगा तो कौन सी नदी जोड़कर लोगों का भला किया जाएगा। इससे केवल राजनीतिक नेताओं और उन लोगों को फायदा पहुंचेगा जो इन परियोजनाओं के जरिए पैसा बनाना चाहते हैं। आप देश की शारदा और नर्मदा परियोजनाओं का हश्र देख सकते हैं। इंगलैंड में भी एक बार ऐसी सोच की शुरुआत की गई थी लेकिन उन्हें भी यह बात समझ में आ गई कि ऐसी कोई परियोजना बनाना ही प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ने जैसा है।
हमारे देश में 33 से 35 प्रतिशत खेती का क्षेत्र सिंचित इलाका है जबकि बाकी क्षेत्र गैर सिंचित हैं। लेकिन इन्हीं गैर सिंचित इलाके से कुल खाद्यान्न उत्पादन की 40 फीसदी पैदावार होती है। अब जरूरत इस बात की है कि हम वैसी फसलों के उत्पादन पर ज्यादा जोर दें जिसमें पानी का कम उपयोग हो। आजकल हम हाइब्रिड बीजों का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं ताकि पैदावार ज्यादा हो मसलन गेहूं, धान, कॉटन, शुगर केन और सब्जियां आदि।
पिछले 40 साल से हम ऐसी ही फसलों का उत्पादन कर रहे हैं। इसके लिए रासायनिक खाद और सिंचाई के लिए ज्यादा पानी की जरुरत होती है। कृषि के लिए तकनीकी विकास और हाइब्रिड बीजों के इस्तेमाल पर ज्यादा जोर देने के बजाए ऐसी फसलों को उगाया जाए जाए जिसमें पानी की कम जरूरत हो। मिसाल के तौर पर बाजार में टमाटर के एक किलो हाइब्रिड बीज का दाम 80,000 रुपये है। इस तरह के बीजों के जरिए पानी का ज्यादा दोहन तो होता ही है।
हम टयूबवेल आदि के जरिए जमीन के अंदर से ज्यादा से ज्यादा पानी निकालते हैं और ऐसे में अगर सूखा पड़ जाए तो स्थिति और भी बदतर हो जाती है। अगर हम रेगिस्तान में हाइब्रिड बीजों का इस्तेमाल करते हैं तो क्या नतीजे हो सक ते हैं, यह साफ तौर पर समझा जा सकता है।
दुनिया में जिस तरह की आर्थिक नीतियां चलाई जा रही हैं उसका एक बड़ा असर मौसम पर पड़ता है। आज हम अपने देश को ही देखे तो आर्थिक नीतियां ऐसी बन रही है कि उसका असर प्रकृति पर तो पड़ेगा ही। ग्लोबल वार्मिंग का असर मौसम चक्र पर पड़ रहा है। पूरी दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग के लिए उद्योगों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।
पिछले कुछ सालों से मानसून चक्र में भी बदलाव आ रहा है। मानसून की निर्धारित तिथि में भी अब 10 दिन का फर्क आने लगा है। संभव है कि इससे खेती का पैटर्न भी बदले यानी किसान दस दिन पहले ही अपनी खेती शुरू कर दें। पहले मानसून आने से यह भी संभव है कि बाद में बारिश कम हो जाए। इस बार ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ा जिसका असर पूरी दुनिया के खाद्यान्न भंडार पर पड़ा है।
भारत में सूखा पड़ने का अनुभव बेहद बुरा है। अगर हम बात क रें अमेरिका की तो वहां भी सूखा कम पड़ने की रणनीति पर भी काम किया है। अमेरिका कृषि में हाई टेक तकनीकों के जरिए काम किया जाता है। वहां लेजर, इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और बड़ी मशीनों के जरिए काम किया जाता है और साथ ही सैटेलाइट डाटा, इलेक्ट्रॉनिक्स और जेनेटिक इंजीनियरिंग का उपयोग भी किया जाता है। जबकि भारतीय खेती परंपरागत तरीके से की जाती है।
शायद यही वजह है कि खेती की बुनियादी मुश्किलों से बचने के लिए कई बार कृषि वैज्ञानिक यह सलाह देते हैं कि अमेरिकन मॉडल का अनुसरण किया जाए। आपको यह मालूम होना चाहिए कि अमेरिका भी सूखा पड़ने के संकट से जूझ रहा है। अमेरिका के 50 राज्यों में से 26 राज्यों में सूखा पड़ा। उसमें से 13 राज्यों में तो बहुत भयंकर अकाल पड़ा जिसमें न्यू मेक्सिको, एरिजोना, कोलोराडो और उटा भी शामिल हैं।
वहां के किसानों ने भी बारिश के वास्ते चर्च में जाकर प्रभु से प्रार्थना की जैसा कि भारत के लिए कहा जाता है। भारत में भी अगर चावल या गेहूं के कम उत्पादन की बात करें तो अमेरिका में भी पिछले 30 सालों के मुकाबले गेहूं का उत्पादन स्तर बेहद नीचा रहा है। हमें यह भी जानकारी दी जाती है कि अमेरिका की कृषि वर्षा पर निर्भर नहीं है जबकि ऐसा नहीं है। भारतीय कृषि की असफलता के लिए मानसून को जिम्मेदार ठहराया जाता है।
भारत के कुछ राज्यों में जब सूखा पड़ा तो किसानों की राहत के लिए 30,000 करोड़ रुपये की मांग की गई जबकि अमेरिकी सूखा से राहत पाने के लिए 5 अरब डॉलर की मांग की गई। अमेरिका में खेती के लिए काफी मात्रा में पानी की जरूरत होती है जबकि भारत में निर्वाह खेती भी संभव है जिसमें कम पानी की जरूरत होती है। हालांकि बारिश की कमी चाहे भारत में हो या अमेरिका में हो इसकी वजह से ही सूखा पड़ता है।
लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में मानसून के दौरान लगभग 100 घंटे की बारिश होती है जबकि अमेरिका में बारिश बहुत रुक-रुक कर होती है। राजस्थान में लगातार चार साल से सूखे की मार पड़ रही है, वहीं अमेरिका के कुछ भागों में लगातार 5 सालों से सूखा पड़ रहा है। अमेरिका में वर्ष 1930 में जितना भयंकर अकाल पड़ा और 70 साल के बाद भी वैसी ही स्थिति आई तो अमेरिकी मॉडल की कृषि व्यवस्था पर सवाल तो उठेंगे ही।
ऐसे में इस तरह की व्यवस्था को अपनाने का क्या तुक है। भारत जैसे देश के लिए यह जरूरी है कि यहां सस्ती लागत वाली कृषि नीति को लागू किया जाए। भारत के कृषि वैज्ञानिकों को अपने देश की भौगोलिक स्थितियों के मुताबिक ही कृषि व्यवस्था को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए। आंख मूंद कर दूसरे देशों की नकल पर औद्योगिक कृषि व्यवस्था को अपनाने से संकट और बढ़ेगा कम नहीं होगा। शायद यह संकट सूखे से भी बड़ा हो।
प्रस्तुति: शिखा शालिनी।
घटी है प्रकृति पर निर्भरता
प्रो. अरुण जोशी, कृषि वैज्ञानिक, काशी हिंदू विश्वविद्यालय
स्वतंत्रता के बाद से कृषि के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आया है, जिससे न केवल कृषि उत्पादन बढ़ा है बल्कि पानी पर निर्भरता भी कम हुई है। हालांकि विकास के विभिन्न सोपानों के बाद भी भारतीय कृ षि का दो तिहाई हिस्सा असिंचित है, लेकिन प्राकृतिक जल पर निर्भरता के बावजूद कम पानी और नई तकनीकों के विकास से फसलों का उत्पादन बढ़ा है।
कृषि विज्ञान के मानकों को देखें तो गेहूं की फसल के लिए 5 बार सिंचाई जरूरी होती है। लेकिन अगर पंजाब और हरियाणा को छोड़ दिया जाए तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे इलाकों में दो बार ही सिंचाई हो पाती है। इस स्थिति में उन्नत किस्म के बीज बहुत ही प्रभावी साबित होते हैं। सिंचाई पर निर्भरता कम करने के लिए गेहूं की ऐसी किस्में तैयार की गई हैं, जो कम समय में पककर तैयार हो जाती हैं।
जो फसलें कम समय में तैयार होती हैं, उनमें न केवल कम सिंचाई की जरूरत होती है, बल्कि खाद, मानव संसाधन आदि जैसे खर्चे भी कम होते हैं। कुल मिलाकर पहले की तुलना में उत्पादन लागत में कमी आई है और उत्पादकता बढ़ी है। अब उन इलाकों में फलों का उत्पादन होने लगा है, जहां पानी की कमी है। हालत यह है कि महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और उससे सटे तमाम इलाकों में अंगूर, आंवला, संतरा, अनार, आम आदि फसलों का उत्पादन तेजी से बढ़ा है।
इन इलाकों में पानी का संकट बहुत ज्यादा है, लेकिन तकनीकी विकास और बीजों की उन्नत किस्मों की वजह से न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी यहां के उत्पाद भेजे जाते हैं। धान की फसल में पानी की जरूरत सबसे ज्यादा होती है। उसमें भी पीआरएच-10 जैसे सुगंधित धान की किस्म, प्रो एग्रो-6444, मयूर जैसी किस्में आई हैं जो कम समय में तैयार हो जाती हैं, जिससे सिंचाई की जरूरत कम हो जाती है।
ज्वार, बाजरा, मक्का की भी अनेक किस्में हैं जो कम पानी में बेहतर पैदावार देती हैं। इसके साथ ही हाइब्रिड बीज से भी कृ षि क्षेत्र में नई क्रांति आई है। टमाटर, गोभी, आलू आदि की तमाम किस्में विकसित हुई हैं, जिनका उत्पादन ज्यादा है। उत्पादन ज्यादा होने का भी असर प्रभावी माना जा सकता है, क्योंकि उतने ही पानी में उत्पादन ज्यादा हो जाता है। तिलहन और मूंग तथा अनेक दलहनों की ऐसी किस्में विकसित हो चुकी हैं, जिनका उत्पादन कम समय में होता है।
मूंग की सम्राट प्रजाति और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में ही विकसित मालवीय ऐसे बीज हैं, जिनसे मात्र 60 दिन में फसल तैयार हो जाती है। इसका सीधा सा मतलब है कि ये फसलें पहले 80-90 दिन में तैयार होती थीं लेकिन आज उनमें कम से कम 2-3 बार पानी कम देना पड़ता है। चने की सामी किस्म है, जिसमें कम पानी की जरूरत पड़ती है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के हजारों किसानों ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में विकसित मालवीय-234 नाम की गेहूं की किस्म को अपना लिया है, जिसमें मात्र 1-2 बार सिंचाई से बेहतर उत्पादन होता है। इसके अलावा मध्य प्रदेश और राजस्थान में लोक-1 नाम की गेहूं की किस्म का उत्पादन किसान कर रहे हैं। वे इलाके सामान्यत: बहुत सूखे रहते हैं, लेकिन नए बीज से उनका उत्पादन भी बढ़ा है और कम पानी में भी पैदावार हो जाती है।
कृषि विज्ञान ने नई तकनीकों की खोज से मानसून पर निर्भरता कम करने की कोशिश की है। संसाधन संरक्षण तकनीक, जीरो ट्रिलेज, बिना जुताई के बुआई के माध्यम से कम पानी की स्थिति में भी अच्छी खेती की जा रही है। तकनीकों के विकास से पानी की प्रभावोत्पादकता में बढ़ोतरी हुई है। मेढ़ की खेती का विकास हुआ है। इस विधि का प्रयोग पहले सब्जियां उगाने में किया जाता था, लेकिन अब मक्का, ज्वार, बाजरा जैसी फसलों का उत्पादन भी मेढ़ पर किया जा रहा है।
नए शोधों के बाद गेहूं की भी ऐसी किस्में तैयार कर ली गई हैं, जिसे मेढ़ पर उगाया जा सकता है। इससे पानी की तीन चौथाई खपत कम हो गई है। तकनीकी विकास में ही ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर सिस्टम का नाम भी उल्लेखनीय है। इसी का असर है कि उद्यान क्षेत्र में क्रांति आ गई है। इसका प्रयोग महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और उनसे सटे इलाकों में किया जाता है, जिससे कम खेती में अच्छी बागवानी की जा रही है। पंजाब के किसान स्प्रिंकलर सिस्टम का प्रयोग बहुतायत करने लगे हैं।
कृषि क्षेत्र में अनुसंधान के साथ ही उसे किसानों तक पहुंचाए जाने की जरूरत है। वर्तमान आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में उन्नत बीजों के विस्थापन की दर विकसित कृषि क्षेत्रों में 10 प्रतिशत और पिछड़े इलाकों में 5 प्रतिशत ही है। हालांकि जागरूकता बढ़ाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने तमाम योजनाएं चलाई हैं। किसानों को बीज पर सब्सिडी दी जाती है। इसके साथ ही बीज उत्पादन संसाधन केंद्र लगाने के लिए राष्ट्रीय बीज निगम, विभिन्न उपकरणों पर सब्सिडी देता है।
सरकार ने बीज उत्पादन योजना में किसानों की भागीदारी के लिए भी कोशिशें शुरू की हैं। अब बीज अनुसंधान- प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रह गया है। कृषि वैज्ञानिक किसानों के खेतों तक जाते हैं तथा उन्हें कृषि और बीज उत्पादन में सहयोग प्रदान करते हैं। इसके साथ ही निजी कंपनियों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे वे विभिन्न इलाकों में बीज बेच रही हैं और बाद में वे फसलों का निरीक्षण उसके तैयार होने तक करती हैं।
अगर पूर्वी उत्तर प्रदेश का उदाहरण लिया जाए तो इन कोशिशों का व्यापक असर हुआ है, मिर्जापुर में मिर्च का उत्पादन हो रहा है, जो देश के कोने- कोने में जाता है। एक छोटे से इलाके- चुनार की लौकी कोलकाता में खाई जाती है। इसके अलावा सोनभद्र के तमाम इलाकों को पिछले दो साल में टमाटर क्षेत्र के रूप में जाना जाने लगा है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि यह वे इलाके हैं जिन्हें कृषि के लिए बेकार क्षेत्र समझा जाता रहा है।
इन सब सुविधाओं के बावजूद यह हकीकत है कि भारत की दो तिहाई कृषि भूमि असिंचित है। यहां की प्राकृतिक संरचना इस तरह की है कि मानसून पर निर्भरता खत्म नहीं होगी। साथ ही सिंचाई की सुविधा के विस्तार के लिए बड़ी पूंजी की भी जरूरत है। हां, इतना जरूर है कि जल संरक्षण के प्रति जागरूकता की जरूरत है। पानी के संरक्षण पर एक-एक खेत और एक-एक गांव में भ्रष्टाचार मुक्त मुहिम चलाए जाने की जरूरत है।
कर्नाटक में पानी की कमी है, लेकिन वहां के किसानों ने अब यह समझ लिया है कि प्राकृतिक जल को बचाने के अलावा कोई तरीका नहीं है, जिससे इसकी जरूरत को पूरा किया जा सके। वहां के किसान खेतों में गङ्ढा खोदते हैं, जिससे वर्षा के जल को रोका जा सके, लेकिन ऐसी स्थिति गंगा के इलाकों में नहीं दिखाई देती।
जागरूकता का अभाव है और इसका परिणाम यह हो रहा है कि रीचार्ज न होने की वजह से जमीन फट रही है। ऐसी स्थिति में जल संरक्षण और कम जल में अधिक परिणाम के संसाधनों को अपनाने की जरूरत है, क्योंकि अगर देश में उपलब्ध संपूर्ण भूजल का उपयोग किया जाए तो भी केवल 60 प्रतिशत जरूरतें ही पूरी की जा सकती हैं।
(जैसा कि बातचीत में सत्येन्द्र से कहा)