बेचारे राम नाइक और मणिशंकर अय्यर! तेल की कीमतों को लेकर घालमेल करने और तेल उत्पादों के लिए लागू प्रशासित मूल्य व्यवस्था (एपीएम) के अप्रैल 2002 में हुए खात्मे से शुरू हुए सुधारों को कुंद करने के आरोप उन पर लग रहे हैं।
पहले- हम बात करते हैं राम नाइक के बारे में। वाजपेयी सरकार ने फैसला किया था कि पेट्रोलियम उत्पादों के दाम तेल कंपनियां तय करेंगी, न कि केंद्रीय कैबिनेट। इसमें अंतरराष्ट्रीय बाजार के रुझानों के मुताबिक फैसले किए जाएंगे। तेल उत्पादों के लिए बने एपीएम में सुधार करने और उसे लागू करने के लिए एक समय सारिणी भी तैयार की गई थी।
उन दिनों राम नाइक पेट्रोलियम मंत्री थे। उन्होंने कुछ सावधानियों के साथ इसे लागू किए जाने का फैसला किया। उन्होंने तेल कंपनियों को एलपीजी को छोड़कर पेट्रोल और डीजल की कीमतों का मासिक आधार पर पुनरीक्षण करने की छूट दे दी। कंपनियों को यह फैसला पेट्रोलियम मंत्रालय से संपर्क करने के बाद ही करना था। केंद्रीय कैबिनेट ने पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें तय करने के अधिकार को छोड़ दिया। तेल कंपनियों को कुछ स्वतंत्रता मिल गई।
लेकिन राम नाइक के कार्यकाल में पेट्रोलियम मंत्रालय ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से अधिकार छीन लिया था कि वे तेल कंपनियों की कीमतें परिवर्तित करने के फैसले को हरी झंडी दे सकें। इसमें आश्चर्य नहीं कि वाजपेयी सरकार के 2004 के आम चुनावों में उतरने के पहले एक साल तक पेट्रोलियम उत्पादों के दामों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
अगर तेल कंपनियां इस दौरान दाम बढाने का कोई प्रस्ताव लाती भी थीं तो पेट्रोलियम मंत्रालय उसे स्वीकार नहीं करता था। इसका परिणाम यह हुआ कि कीमतों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। पेट्रोलियम क्षेत्र में सुधार को इससे गहरा धक्का लगा।
मनमोहन सरकार में पेट्रोलियम मंत्री बने मणिशंकर अय्यर भी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों के निर्धारण की उसी दिशा में चले, हालांकि उन्होंने पेट्रोलियम क्षेत्र में चल रहे सुधारों की दिशा बदलने में तेजी दिखाई। इस क्षेत्र को हुए नुकसान की भरपाई करने की बजाय उन्होंने केंद्रीय कैबिनेट को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दाम तय करने का अधिकार सौंप दिया। इस तरह से अय्यर के कार्यकाल में कीमतें बढ़ाने के बारे में कोई भी फैसला कैबिनेट की हरी झंडी के बाद ही आया।
एपीएम को खत्म करने का फैसला अप्रैल 2002 में लिया गया। उसके बाद भी तमाम फेरबदल हुए, लेकिन उसके बाद आने वाली किसी भी सरकार ने यह नहीं सोचा कि इस फैसले में परिवर्तन या संशोधन किया जाए। यह स्पष्ट है कि देश में किसी भी फैसले को जब तक कानूनी जामा नहीं पहनाया जाता तब तक उसे बगैर किसी समस्या के आसानी से खत्म किया जा सकता है।
इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि विदेशी निवेशक इस बात से हमेशा आशंकित रहते हैं भारत में विदेशी निवेश के मानकों के तहत जो छूट मिली है, उसे कभी भी वापस लिया जा सकता है, क्योंकि इनमें से अधिकतर को कानूनी रूप नहीं दिया गया है।
इन सभी सालों में पेट्रोलियम मंत्री राम नाइक और मणिशंकर अय्यर पर पेट्रोलियम क्षेत्र में सुधार को पटरी से उतारने के आरोप लगते रहे हैं। यह तर्क दिया जाता है कि दो भिन्न सरकारों में रहे दोनों मंत्रियों ने कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम रहने के दौरान तेल कंपनियों को कीमतें तय करने की छूट नहीं दी। अय्यर के उत्तराधिकारी मुरली देवड़ा भी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें तय करने में सरकार का हस्तक्षेप कम न किए जाने के लिए जिम्मेदार हैं।
पिछले कुछ सप्ताह से महंगाई दर 7 प्रतिशत से ऊपर रही है। अब यह चीजें खुलकर सामने आने लगी हैं कि पेट्रोलियम क्षेत्र में सुधार को रोकने के पीछे किन लोगों का हाथ है। यह सही है कि अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह सरकार को तेल कंपनियों को पेट्रोलियम पदार्थों का दाम तय करने का छूट न दिए जाने के फैसले से लाभ मिला।
नाइक, अय्यर और देवड़ा पर आरोप लग सकते हैं, लेकिन दोनों सरकारों को तेल की कीमतों पर नियंत्रण रखकर प्रारंभिक स्तर पर महंगाई दर रोकने में मदद मिली। अब महंगाई दर 7 प्रतिशत के स्तर को पार कर चुकी है, जो राजनीतिक रूप से अस्वीकार्य है। इसके साथ ही एक बदलाव और आया है। पेट्रोलियम क्षेत्र में सुधार की बात करने वाले सभी मंत्री पृष्ठभूमि में चले गए हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर चुकी हैं और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां कीमतों की मार से लहूलुहान हैं। इस हालत में भी कोई सुधारवादी मंत्री खुलकर सामने नहीं आ रहा है, जो यह कह सके कि तेल कंपनियों को दाम बढ़ाने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, जिससे कंपनियों का घाटा कम किया जा सके।
कोई भी यह नहीं कह रहा है कि तेल कंपनियों को कीमतें बढ़ाने की छूट मिलनी चाहिए। यही सवाल उठाया जा रहा है कि उपभोक्ता को कीमतों की मार से बचाने के लिए सरकार को सब्सिडी बढ़ाना चाहिए, कर कम करना चाहिए। तो केवल नाइक, अय्यर और देवड़ा पर ही दोषारोपण क्यों किया जा रहा है?