भारत के मशहूर कार्डिएक सर्जनों में से एक देवी प्रसाद शेट्टी को आपने कई बार टेलीविजन चैनलों पर देखा होगा। वह एक सेलेब्रिटी तो बन ही चुके हैं, साथ ही गरीब लोग भी उनको मसीहा मानने लगे हैं।
वह अधिकतर समय सर्जिकल गाउन और कैप में ही नजर आते हैं, उनकी टीम बेंगलुरू के ‘नारायणा हृदयालय इंस्टीटयूट ऑफ कार्डिएक साइंसेज’ में रोजाना 24 से 28 सर्जरी करती है। डा. शेट्टी की लोकप्रियता ने उपमहाद्वीप की सीमाओं को लांघ दिया है, पश्चिम एशिया और अफ्रीका में भी उनके प्रशंसकों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है।
‘डा. हार्ट’ के नाम से मशहूर शेट्टी, बच्चों और नवजात शिशुओं के माता-पिता के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। नवजात शिशुओं की इस अस्पताल में बहुत बढ़िया देखभाल की जाती है। नवजात शिशुओं के लिए यहां बना पेडिएट्रिक सेक्शन शायद दुनिया भर में सबसे बड़ा है। कम पैसों में बेहतरीन चिकित्सा सेवाएं मुहैया कराने को लेकर हॉर्वर्ड बिजनेस स्कूल ने डा. शेट्टी पर एक केस स्टडी भी की है।
दरअसल 1,600 करोड़ रुपये के 1,000 बेड वाले इस अस्पताल को डा. शेट्टी का परिवार ही संचालित करता है। इस अस्पताल का फलसफा भी एकदम जुदा है, अगर आप के पास पैसे हैं तो दीजिए और यदि आपके पास पैसों की तंगी है तो आपका इलाज मुफ्त में किया जाएगा।
अगर उनके कोलकाता वाले नारायणा हृदयालय में होने वाली 28 से 32 सर्जरी को भी शामिल कर लें तो यह भारत में होने वाली कुल कॉर्डिएक सर्जरी का 10 से 12 फीसदी के लगभग बैठता है जिसको डा. शेट्टी अगले पांच साल में बढ़ाकर 70 (यह स्पष्ट नहीं है कि सर्जरी की संख्या या प्रतिशत)करना चाहते हैं।
आंकड़ों में डा. शेट्टी की भी बहुत दिलचस्पी है और वह अपने अस्पताल की क्षमता बढ़ाने के लिए भी गणित लगाते रहते हैं। तकरीबन 1.2 अरब लोगों के देश में जहां बुनियादी सुविधाओं की बहुत कमी है, प्रशिक्षित लोगों का भी अभाव है और कीमतों में भी लगातार इजाफा होता जा रहा है, ऐसे में बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना बहुत ही चुनौतीपूर्ण काम है।
डा. शेट्टी देश में चिकित्सा क्षेत्र में नुकसान को कम करने की रणनीति पर काम करने वाले उद्यमी के रूप में काम कर रहे हैं। पांच साल पहले उन्होंने अपने गृह राज्य में किसानों के लिए 10 रुपये मासिक के हिसाब से ‘यशस्विनी’ नाम की स्वास्थ्य बीमा योजना चलाई थी जिसके लिए उन्हें कुछ सरकारी मदद भी मिली थी। पश्चिम बंगाल के लगभग 4 लाख सरकारी अध्यापकों को 100 रुपये का मासिक चिकित्सा खर्च मिलता है।
डा. शेट्टी का इस पर कहना है, ‘सौ रुपये में आप क्या खरीद सकते हैं? इतने पैसों में तो अच्छे एंटीबॉयोटिक्स भी नहीं मिलते।’ लेकिन उन्होंने इन अध्यापकों और उनके परिवार को सालाना 1,60,000 रुपये का बीमा कवर देने का रास्ता निकाल लिया। इस योजना में सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनी नैशनल इंश्योरेंस कंपनी सहयोग कर रही है।
डा. शेट्टी कहते हैं, ‘सरकार को भी अतिरिक्त पैसा नहीं खर्च करना पड़ रहा है और लगभग 20 लाख लोगों को इससे फायदा पहुंच रहा है।’ दरअसल भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बहुत खराब है और डा. शेट्टी इसमें क्रांतिकारी बदलाव लाने की कोशिश करने वालों में से एक हैं।
आंकड़ों के मुताबिक भारत में 1,000 लोगों के लिए अस्पतालों में केवल 1.5 बेड हैं जबकि विश्व स्तर पर यह आंकड़ा 4 बेड प्रति एक हजार व्यक्ति का है। वहीं अगर डॉक्टरों की बात की जाए तो प्रति एक हजार लोगों पर 0.5 डॉक्टर हैं जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 1.6 डॉक्टर प्रति एक हजार व्यक्ति का है।
स्वास्थ्य सेवाओं पर हर साल होने वाले तकरीबन 1,50,000 करोड़ रुपये में से लगभग 70 फीसदी लोगों की जेब से ही आता है। जिन लोगों के पास पैसे नहीं होते वे उधार मांग कर ही इलाज कराने के लिए विवश हैं जिससे वे और बुरी तरह से गरीबी की जद में आ जाते हैं। इस समस्या का इलाज ढूंढ़ने के लिए डा. शेट्टी नये तरीके ईजाद कर रहे हैं।
कई राज्यों की राजधानियों में हेल्थ सिटी बनाने के अलावा चिकित्सा प्रशिक्षण देने के लिए संस्थान खोलना उनकी बड़ी महत्वाकांक्षी योजना है। हेल्थ सिटी में प्रमुख बीमारियों के इलाज के लिए विशेष व्यवस्था किए जाने की बात की जा रही है। डा. शेट्टी के इस प्रोजेक्ट में सरकार और निजी क्षेत्र दोनों की ही मदद ली जाएगी।
एक ओर जहां एआईजी और जेपी मॉर्गन 200 करोड़ रुपये खर्च करके नारायणा हृदयालय में 25 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करना चाहते हैं तो वहीं दूसरी ओर सरकार अहमदाबाद, जयपुर, बेंगलुरू, भुवनेश्वर और देहरादून में प्राइम प्रॉपर्टी कंपनी को ऑफर कर रही है। दरअसल अगले पांच साल में डा. शेट्टी की अपने अस्पतालों में 20,000 बेड लगाने की महत्वाकांक्षी योजना में कई निजी कंपनियां शरीक होना चाहती हैं।
बाजार के कुछ जानकारों का मानना है कि हॉस्पिटल सेक्टर में यह बहुत बड़ी छलांग साबित होगी। एक प्राइवेट इनवेस्टमेंट विश्लेषक का कहना है कि एआईजी और जेपी मॉर्गन जैसी कंपनियों का डा. शेट्टी के साथ जुड़ना काफी बड़ी बात है, जबकि इन कंपनियों को अच्छी तरह मालूम है कि इसमें अधिक मुनाफा नहीं होने जा रहा। हेल्थ सिटी में स्वास्थ्य बीमा योजनाओं पर भी खास ध्यान दिया जाएगा।
डॉ. शेट्टी का कहना है कि एक खास बात यह है कि प्राइवेट कंपनियां बहुत तेजी से आगे बढ़ती हैं। उनका कहना है कि फिलहाल जो भी खिलाड़ी हैं वे बहुत ही छोटे खिलाड़ी हैं और जब तक उनके पास कम से कम 20,000 बेड नहीं होंगे तब तक उनके मुनाफे पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। डॉ. शेट्टी का कहना है, ‘इस क्षेत्र के जो बड़े खिलाड़ी हैं उनका सालाना कारोबार भी 800 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं है।
दूसरी तरफ ऑटोमोबाइल के कलपुर्जों का कारोबार भी इससे दुगना ही होता है। जब तक आप कोई ऐसी कंपनी नहीं बनाते जो सालाना 10,000 करोड़ रुपये का कारोबार कर सकती है तब तक डिस्पोजेबल और दवा की 30 फीसदी की लागत पर कोई फर्क नहीं ला सकते।’ नारायण हृदयालय केवल टांके पर ही एक महीने में 30 लाख रुपये खर्च करते हैं जिससे लागत मूल्य का अंदाजा मिलता है जिसके बारे में डॉ. शेट्टी बात कर रहे हैं।
लोगों के स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए बेंगलुरु में नारायण हृदयालय इंस्टीटयूट ऑफ कार्डिएक साइंसेज ने 1000 बेड का इंतजाम किया है। इसके अलावा विकलांगों के लिए बने अस्पताल स्पर्श में 250 बेड और नारायण नेत्रालय आई हॉस्पिटल में 300 बेड का इंतजाम है। जहां तक कैंसर अस्पताल की बात है तो 1,400 बेड वाले अस्पताल के निर्माण का काम तेजी से चल रहा है। इसमें बायोकॉन की प्रमुख किरण मजूमदार शॉ ने भी अपना कुछ सहयोग दिया है।
यह अस्पताल तीन महीने में ही खुल जाएगा। इसका होसुर रोड पर भी कॉम्प्लेक्स बन रहा है और यहां 3,000 कमरों वाला देश का सबसे बड़ा निजी मेडिकल हब बनेगा। दूसरे प्रोजेक्ट के तहत 500 कमरों वाला न्यूरो सेंटर बन रहा है, इसके अलावा 500 बेड वाला किडनी अस्पताल और महिला और बच्चों के लिए दूसरे अस्पताल बन रहे हैं।
डॉ शेट्टी का दावा है कि एक बार अगर हेल्थ सिटी तैयार हो जाती है तो स्वास्थ्य के देखभाल पर होने वाले खर्चो में भी 50 प्रतिशत की कमी आएगी। नारायण हृदयालय की कम फीस को देखकर दूसरे हॉस्पिटल भी काफी हैरत में पड़ जाते हैं। यहां हार्ट सर्जरी की फीस 65,000 रुपये है जबकि दूसरी जगह औसतन यह फीस 1,50,000 रुपये है। इसके अलावा ऐसी कोशिश की जा रही है कि सर्जरी की फीस को कम करके 35,000 रुपये तक कर दिया जाए।
उनका कहना है, ‘हमारी हेल्थ सिटी उन लोगों के लिए होगी जो किसी कॉरपोरेट हॉस्पिटल में अपना इलाज नहीं करा सकते लेकिन वे किसी सरकारी अस्पताल में भी नहीं जाना चाहते। उन्हें किसी ऐसे बेहतर अस्पताल की तलाश होती है जो उनकी पहुंच तक भी हो और वहां सरकारी अस्पतालों की तरह लुंज-पुंज सेवा भी न हो। हमें उनलोगों के लिए काम करना है जो सरकारी अस्पतालों के बाहर अपना इलाज कराने के लिए लंबी कतारों में लगे रहते हैं। ये लोग पूरी तरह से गरीब और बेबस लोग भी नहीं होते ये अपने इलाज के लिए ज्यादा नहीं लेकिन थोड़ा बहुत खर्च करने की स्थिति में भी जरूर होते हैं।’
यानी आम लोगों की पहुंच तक वाला ऐसा अस्पताल जहां की फीस का बोझ लोगों को ज्यादा न लगे। इस तरह के प्रोजेक्ट कुछ ऐसे ही हैं जैसे होटल कारोबार में आम लोगों की बजट तक में आने वाला होटल। आजकल जो भी कॉरपोरेट हॉस्पिटल बन रहे हैं वह अमीरों के लिए ही बन रहे हैं, उन हॉस्पिटलों में कम पैसे वालों की पहुंच तो हो ही नहीं सकती। डॉ. शेट्टी का फॉर्मूला बिल्कुल इसके उलट है।
उनका कहना है, ‘मेरे ख्याल से अस्पताल में केवल 35 फीसदी सीट अमीरों के लिए रिजर्व होनी चाहिए। उनका कहना है कि प्रमोटर्स इस बात को बिल्कुल भी नहीं समझते और न ही समझना चाहते हैं कि जरूरी क्या है। आपके पास इलाज के लिए जरूरी सुविधाएं तो होनी ही चाहिए। इसके अलावा ऑपरेशन रुम व आईसीयू भी बेहतर और सभी सुविधाओं से लैस होने चाहिए। आप अपने मरीजों को कहां रखते हैं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता बल्कि कमरें से तो और भी लागत बढ़ती है।’
डॉ. शेट्टी अपनी बात में शायद गलत भी हो सकते हैं। कुछ और लोगों का मानना है कि उनकी चादर जितनी लंबी नहीं है उससे ज्यादा काम करने की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें केवल सर्र्जरी करने में ही मजा आता है लेकिन राज्य सरकार और प्राइवेट ऑपरेटर भी अस्पताल चलाने के लिए उनके साथ डील कर रहे हैं जिसमें टाटा स्टील भी शामिल है।
नारायण हृदयालय ने जमशेदपुर में उनके दो अस्पतालों को चलाने के लिए समझौता किया है इसके अलावा हेल्थ सिटी में भी टाटा स्टील के साथ साझेदारी कर रही है। जमशेदपुर डॉ. शेट्टी के लिए एक प्रयोग की जगह बनने की उम्मीद है जहां वह पूरे क्षेत्र के लोगों के स्वास्थ्य के लिए काम कर सकते हैं। डॉ. शेट्टी ऐसे काम के लिए ज्यादा निवेश कर रहे हैं जहां परंपरागत रूप से ज्यादा कमाई की अब गुंजाईश नहीं है।
एक प्राइवेट इक्विटी मैनेजर का कहना है, ‘बेहतर तरक्की के लिए यह बेहद जरूरी है कि आपके पास पूंजी और संपत्ति भी मौजूद हो और आपके पास मैनेजेमेंट कॉन्ट्रैक्ट भी हों। अगर डॉ. शेट्टी संपत्ति पर ही ज्यादा ध्यान देते तो यह उनके लिए जोखिम उठाने जैसा होता।’ हालांकि डॉ. शेट्टी ने खुद को बेहद काबिल साबित किया है। हाल में जितनी भी डील हुई हैं वह मैनेजमेंट कॉन्ट्रैक्ट के लिए ही हुई है।
जहां तक हेल्थ सिटी प्रोजेक्ट की बात है उन्होंने कुछ ऐसे इंतजाम भी किए हैं जिसके तहत बिल्डर उनलोगों की जरूरतों के मुताबिक अस्पताल बनाते हैं और कई दफा उसे किराए पर भी देते हैं। उनका कहना है कि उनका काम हॉस्पिटल में बेहतर इंतजाम करके उसे चलाना है। बिल्डर इसके लिए निर्धारित रकम लेते हैं और कुछ तो मुनाफे का एक निश्चित हिस्सा लेते हैं।
डॉ. शेट्टी के पास लोगों के लिए संवेदना है तो दूसरी तरह कारोबारी लोगों की तरह एक तेज दिमाग भी है। यही बात उन्हें अपने अस्पताल के जरिए भी साबित करनी होगी क्योंकि उनके अस्पताल में लोगों के प्राइवेट शेयर होते हैं इसकी वजह से उन्हें कुछ कड़े कदम उठाने होंगे। कुछ ऐसी रिपोर्ट आ रही हैं जिसके मुताबिक बेंगलुरु हॉस्पिटल अपनी फीस बढ़ा रहा है ताकि वह अपने मुनाफे के लक्ष्य को पा सके। क्या संवेदना के ऊपर कारोबारी दिमाग ही हावी होगा यह एक अहम सवाल है।