सभी प्रमुख मीडिया प्लेटफॉर्मों पर विज्ञापनों में दी जाने वाली सूचनाओं, खासकर बच्चों को लक्षित विज्ञापनों में ऐसा करने से संबंधित नए दिशानिर्देश लंबे समय से लंबित थे। नए नियमों के मुताबिक भ्रामक विज्ञापनों पर लगने वाले जुर्माने को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 2 (28) के तहत जुर्माने और परिभाषा से जोड़ दिया गया है। इसके तहत विनिर्माताओं, विज्ञापन प्रसारकों और एंडोर्सरों (प्रचार करने वालों) पर पहले अपराध के मामले में 10 लाख रुपये का जुर्माना और दूसरे अपराध पर 50 लाख रुपये का जुर्माना लगाने का प्रावधान है।
केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकार भ्रामक विज्ञापन से जुड़े एंडोर्सर पर पहली बार एक वर्ष और उसे दोहराने पर तीन वर्ष तक का प्रतिबंध लगा सकता है। नये दिशानिर्देश में दो और अहम बातें शामिल हैं जो प्रलोभन और मुफ्त देने वाले विज्ञापनों को परिभाषित करती हैं और बच्चों के लिए विज्ञापन की सीमा तय करती हैं। इसमें मशहूर लोगों द्वारा प्रचार कराकर उन्हें निशाना बनाया जाना भी शामिल है। दिशानिर्देशों में कहा गया है कि विज्ञापन जिस भाषा और जिस आकार के फॉन्ट में दावा करता है उसी भाषा और फॉन्ट में अस्वीकरण भी प्रकाशित किया जाना चाहिए।
ये दिशानिर्देश लंबे समय से लंबित थे और निस्संदेह इससे विनिर्माताओं और एंडोर्स करने वाले ज्यादा सावधान होंगे क्योंकि अभी तक विज्ञापन उद्योग ने स्वनियमन के लिए जो भी प्रयास किए वे सभी निरर्थक साबित हुए। ऑनलाइन गेमिंग वेबसाइटों पर विज्ञापनों का विस्तार और म्युचुअल फंडों के विज्ञापनों ने भ्रामक विज्ञापनों की समस्या को गंभीर बना दिया है। टेलीविजन पर अस्वीकरण के पढ़े जाने की गति कम करना भी उपयोगी साबित होगा। बच्चों के लिए विज्ञापन मानकों में सख्ती, कुछ मामलों में मशहूर शख्सियतों के विज्ञापन पर रोक लगाया जाना भी स्वागतयोग्य है क्योंकि बच्चे मध्यमवर्गीय परिवारों में खरीद को प्रभावित करने वाले अहम कारक हैं। निश्चित रूप से अगर अधिकारियों ने ज्यादा साहस दिखाते हुए गोरापन बढ़ाने वाली क्रीम के विज्ञापन, शराब, सिगरेट और तंबाकू के विज्ञापनों की तरह जंक फूड और पेय पदार्थों के विज्ञापन पर रोक लगा दी होती बेहतर होता।
बच्चों और किशोरों को लक्ष्य बनाकर किए जाने वाले जंक फूड, तेल में तले उत्पादों और चीनी की भरमार वाले पेय पदार्थों के विज्ञापनों ने मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों में मोटापा और मधुमेह बढ़ाने में अहम भूमिका निभायी है। शराब के परोक्ष विज्ञापनों पर भी रोक लगा दी गई है, उसी तरह जंक फूड के केवल दुकानों पर किए जाने वाले विज्ञापन पर्याप्त होने चाहिए।
अहम सवाल यह है कि सरकार इन दिशानिर्देशों को कैसे लागू करेगी। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकार जिसकी स्थापना 2020 में की गई थी वह झूठे और भ्रामक विज्ञापनों के नियमन और नियम तोड़ने वालों को दंडित करने के लिए उत्तरदायी है। पहले यह दायित्व भारतीय विज्ञापन मानक परिषद के पास था। प्राधिकार में एक जांच शाखा है जिसका नेतृत्व एक महानिदेशक के पास है और वह न केवल उपभोक्ताओं की व्यक्तिगत शिकायतों पर काम करती है बल्कि जिला प्रशासनों से आने वाली रिपोर्ट पर भी कदम उठाए जाते हैं। इससे भ्रामक विज्ञापनों को पकड़ने का दायरा बढ़ गया है। देश के 10,000 से अधिक मुद्रित माध्यमों और 850 से अधिक बहुभाषी टेलीविजन चैनलों पर विज्ञापनों की जांच परख करना मुश्किल काम है। परंतु आज मुख्य समस्या है ऑनलाइन विज्ञापनों का प्रसार जिनमें से सभी भारत में तैयार नहीं होते। इनकी प्रभावी पड़ताल के लिए बहुत बड़े ढांचे की आवश्यकता होगी। बेहतर होगा कि प्राधिकार अन्य मानक प्राधिकारों के साथ मिलकर काम करे और स्वास्थ्य तथा व्यक्तिगत उत्पादों की पैकेजिंग पर दावों का नियमन कर सके तथा तंबाकू उत्पादों की तरह स्वास्थ्य चेतावनियां लिखवा सके। बहरहाल नये नियमन को अच्छा प्रस्थान बिंदु माना जा सकता है।