सरकार ने आखिरकार पिछले महीने पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ा दीं। इसकी एक वजह यह भी थी कि सरकार को लग रहा था कि अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो देश में इन उत्पादों की कमी हो सकती है।
कीमतें बढ़ाने के कुछ दिन पहले ही इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के अध्यक्ष का बयान आया था कि उनके पास कच्चे तेल के आयात के लिए और पैसा नहीं बचा है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि उनके पास केवल दो दिनों का ही स्टॉक बचा है।
जिस दिन कीमतें बढ़ाई गईं, उस रात प्रधानमंत्री ने देश को टेलीविजन पर संबोधित किया और उन्होंने यही बात दोहराई कि कीमतें बढ़ाने का निर्णय लेना उनके लिए भी आसान नहीं था, पर उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था। पर परेशानी यह है कि कीमतें बढ़ाने से भी समस्या का पूरा समाधान नहीं हो पाया है। तेल मार्केटिंग कंपनियों को जो घाटा हो रहा था, उसके कुछ हिस्से की ही भरपाई हो पाई है।
और, तेल की कीमतों में लगी आग बुझने का नाम ही नहीं ले रही है, ऐसे में एक बार फिर देश के सामने वही खतरा उठने लगा है यानी पेट्रोल, डीजल की किल्लत होने की आशंका। अब भी तेल कंपनियों के लिए अपनी कार्ययोजना को जारी रखना मुश्किल लग रहा है। पहले से ही पंजाब और तमिलनाडु से तेल की आपूर्ति में कमी होने की खबर आ चुकी है। तेल मार्केटिंग कंपनियों ने अपने स्तर से इस समस्या से निपटने का समाधान ढूंढने की कोशिश कर दी है।
उन्हें लगता है कि सामान्य पेट्रोल और डीजल की बिक्री की बजाय अगर वे ब्रांडेड पेट्रोल और डीजल बेचें तो उन्हें फायदा होगा। ब्रांडेड पेट्रोल और डीजल की खरीद के लिए दबाव डालने की वजह से ही पिछले हफ्ते ट्रक वाले हड़ताल पर चले गए थे। अगर रिजर्व बैंक तेल कंपनियों के लिए सहायता के लिए कदम नहीं बढ़ाता तो हालत और बिगड़ सकती थी। हालांकि यह आमतौर पर नहीं देखा जाता पर रिजर्व बैंक ने तेल मार्केटिंग कंपनियों से ऑयल बॉन्ड्स खरीदने का निर्णय लिया। इससे कंपनियों को बड़ी राहत मिली क्योंकि उनके पास तरलता की जबरदस्त कमी थी और कच्चे तेल के आयात के लिए उन्हें पैसे की जरूरत थी।
उर्वरक क्षेत्र में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं पर उन पर इतनी रियायतें नहीं बरती जाती हैं। उन्हें भी सब्सिडी तो दी जाती है पर वे बॉन्ड्स के पचड़े में उलझे रहते हैं। पिछले साल के मुकाबले इस साल विश्व बाजार में खाद की कीमतें दोगुनी हो गई हैं और इस वजह से भारत सरकार पर इस वित्त वर्ष में सब्सिडी का बोझ बढ़कर 95,000 करोड़ रुपये पहुंचने की संभावना है। बजट में इस सब्सिडी के लिए 31,000 करोड़ रुपये का ही प्रावधान था। नकदी की कमी के बीच उर्वरक कंपनियों को 7.5 फीसदी की रियायत पर जो बॉन्ड्स जारी किए गए हैं, वे इस उद्योग को गर्त में डालने के लिए काफी हैं।
सच्चाई यह है कि उर्वरक और तेल के मुद्दे पर सरकार का जो रुख है वह काफी समय तक चलने वाला नहीं है। हालांकि तेल की कीमतों में और बढ़ोतरी की संभावना को फिलहाल टाल दिया गया है क्योंकि पहले से महंगाई मुंह फाड़े खड़ी है। अगले वर्ष चुनाव को देखते हुए सरकार कोई ऐसा कदम उठाना नहीं चाहती जिससे उसे नुकसान पहुंचे। सरकार अब एक ही कदम उठा सकती है कि वह इन कंपनियों को नकदी के रूप में सब्सिडी प्रदान करे, जिससे इनका काम चलता रहे।