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शाही कारों का सुपरहिट मुकाबला

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 2:00 PM IST

इस बात को कोई बहुत लंबा अरसा नहीं हुआ है जब पीटर क्रांशनेबल जर्मनी के म्यूनिख शहर में लक्जरी कार बनाने वाली कंपनी बीएमडब्ल्यू के साथ बतौर महा प्रबंधक काम कर रहे थे।


एशिया-प्रशांत, अफ्रीका, मध्य और पूर्वी यूरोप के बाजारों में मची हलचल ने उनके काम का दायरा और बढ़ा दिया, उनकी जिम्मेदारी यह भी हो गई कि  वह ऐसे बाजारों का जायजा लें जहां बीएमडब्ल्यू अपनी अनुषांगिक कंपनी स्थापित कर सके। वह पोलैंड और हंगरी में पहले ही ऐसा कर चुके हैं, और उनका अगला पड़ाव था भारत। इस कवायद ने मानो उनकी जिंदगी ही बदल दी।

पहले पहल तो यह किसी दूसरे प्रोजेक्ट की तरह ही नजर आ रहा था। जून 2004 में इस प्रोजेक्ट का विश्लेषण किया गया और उसी साल सितंबर के दो हफ्ते  उद्योगपतियों, सलाहकारों, संभावित खरीदारों के साथ बातचीत और लंबी सड़क यात्रा में बीते। इस पूरी दौड़भाग के बाद उन्होंने भारत के बारे में बहुत ही आशावान रिपोर्ट सौंपी। पीटर को भारतीय बहुत खुले दिमाग वाले लगे। उन्होंने कई और सकारात्मक चीजों को भी महसूस किया।

उनके अधिकारियों ने बताया कि वैश्विक स्तर पर भारत कंपनी के लिए रणनीतिक रूप से बहुत अहम है। पीटर को कहा गया कि वह अपनी रणनीति को और दुरुस्त बना सकते हैं, जिससे कंपनी का दृष्टिकोण भी सही साबित हो। इस तरह अविवाहित पीटर ने अगस्त 2006 में कंपनी के भारतीय प्रमुख के रूप में कमान संभाल ली और अगले साल जनवरी से उन्होंने काम भी शुरू कर दिया। इसके 19 महीने बाद उन्होंने मर्सिडीज बेंज की भारतीय इकाई की नाक में दम कर दिया।

बता दें कि 13 साल पहले जब मर्सिडीज बेंज ने भारतीय बाजार में दस्तक दी थी तब से लेकर अब तक लक्जरी कार के बाजार में मर्सिडीज का दबदबा रहा है और इसका खास लोगो शाही अंदाज का परिचायक सा बन गया। बीएमडब्ल्यू इंडिया का लक्ष्य 2007 तक 1,000 कारें बेचने का था। लेकिन कंपनी ने 1,387 कारें बेचने में सफलता हासिल की। इस साल कंपनी ने 2,000 कारें बेचने का लक्ष्य रखा था जिसे बढ़ाकर 2,800 कर दिया गया है और इसे भी कंपनी जल्द ही पूरा कर लेगी। और यह आंकड़ा मर्सिडीज बेंज द्वारा 2007 में बेची गई 2,491 कारों से अधिक है।

मर्सिडीज ने अभी तक बिक्री के लक्ष्य के बारे में नहीं बताया है। हालांकि कंपनी के कॉर्पोरेट अफेयर्स के निदेशक सुहाश कडलसकर ने बताया कि इस साल जनवरी से जून के दौरान कंपनी की बिक्री में 50 फीसदी का इजाफा हुआ है। इस रफ्तार से तो मर्सिडीज इस साल भी बिक्री के मामले में बीएमडब्ल्यू से आगे रहेगी, लेकिन उससे आगे का रास्ता कतई आसान नहीं होगा।

राजसी अंदाज: शाही सवारी

ऐसे में जब दो दिग्गज जर्मन कार निर्माता कंपनियां भारत में लक्जरी कार बाजार में अधिक से अधिक हिस्सेदारी की दौड़ में एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रही हैं, तो उसका असर यह हो रहा है कि भारत में लक्जरी कारों की बिक्री में भी तेजी से इजाफा हो रहा है। इस तरह के संकेत यही इशारा करते हैं कि अपने मकसद में ये कंपनियां कामयाब भी हो रही हैं।

वर्ष 2006 में जहां 3,050 लक्जरी कारें बिकी थीं वहीं 2007 में यह संख्या बढ़कर 4,200 हो गया। और इस साल अंदाजा लगाया जा रहा है कि यह आंकड़ा 7,000 को छू सकता है। ऑटोमोबाइल विश्लेषकों की राय में अगर ऐसा होता है तो यह किसी जादू से कम नहीं होगा। मैकिंजी एंड कंपनी में साझीदार रजत धवन कहते हैं, ‘यह तो अभी शुरूआत है। इस सेगमेंट में लगातार वृद्धि की संभावनाएं हैं। हमारा मानना है कि उच्च आय वाले ऊपरी दो तबकों की आमदनी अगले 10 साल में 10 से 15 गुना तक बढ़ जाएगी। ऐसे में जब उनकी आमदनी इतनी तेजी से बढ़ेगी तो जाहिर है उनका खर्च भी बढ़ना एकदम तय है। ‘

आईडीएफसी-एसएसकेआई के रिसर्च निदेशक रामनाथ एस का कहना है कि जब लोगों के पास बड़ी मात्रा में पैसा आता है तो अपनी शानो शौकत दिखाने के लिए वे लक्जरी कारें खरीदते हैं। इसी वजह से इन कारों की बिक्री इतनी तेजी से हो रही है। लक्जरी कार खरीदने वालों की एक नई पौध उग आई है। बीएमडब्ल्यू समूह के एशिया प्रशांत (इसमें चीन शामिल नहीं है) और दक्षिण अफ्रीका के सीनियर वाइस प्रेसीडेंट डेविड पैंटन कहते हैं, ‘अगर अर्थव्यवस्था कुलांचे नहीं भर रही होती तो हम इस बाजार में प्रवेश नहीं करते। भारत में बड़ी संख्या में सफल कारोबारी और पेशेवर मौजूद हैं। हमारा कारोबार ऐसे ही लोगों से जुड़ा है।’

मर्सिडीज के खरीदारों की संख्या भी बढ़ने पर है। कडलसकर कहते हैं कि मर्सिडीज खरीदने वालों की औसत आयु कम होती जा रही है। चार साल पहले जहां यह 50 वर्ष थी वहीं अब यह घटकर 35 वर्ष हो गई है। वह बताते हैं आजकल युवा तेजी से पैसे कमा रहे हैं और जल्द से जल्द अपने सपनों की कार खरीदना चाहते हैं। इसमें भी ट्रैवल और होटल जैसे अन्य दूसरे कारोबार, जो विदेशियों की आवभगत से जुड़े हैं, ही अधिक लक्जरी कारें खरीद रहे हैं।

मुंबई में नए खुले फॉर सीजन्स होटल ने हाल में 20 बीएमडब्ल्यू कारें खरीदी हैं। धवन कहते हैं कि पिछले कुछ सालों तक इन कारों पर डयूटी बहुत अधिक होने से ये बहुत महंगी हुआ करती थीं लेकिन पिछले एक-डेढ़ साल में इसकी कीमतें काफी कम हुई हैं जिससे इन कारों की बिक्री में तेजी आई है।

स्थानीय असर

इसको केवल बीएमडब्ल्यू कारों की बिक्री के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। पीटर बताते हैं कि यह कारोबार इस तरह का नहीं है कि मैं कोई बेकरी खोलकर ब्रेड बेच रहा हूं। वैसे, हर किसी को ब्रेड की जरूरत होती है लेकिन लक्जरी कार हर किसी की जरूरत नहीं होती।

एक बेहद प्रतिष्ठित फर्म के एक ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट कहते हैं कि बीएमडब्ल्यू की भारत में सफलता अध्ययन का विषय बन गई है। शुरू से ही कंपनी का लक्ष्य तय था। इसने चेन्नई के निकट अपने प्लांट में 3 और 5 सीरिज की कार असेंबल करना शुरू किया। बीएमडब्ल्यू की इस साल 2,800 कारें बेचने की योजना है जिनमें से केवल 600 कारें ही पूरी तरह से आयातित होंगी।

दिल्ली और गुड़गांव में इसका शोरूम है जो कार के दीवानों के लिए बेहतर जगह है। धवन का कहना है, ‘आखिरकार देश में भी लक्जरी कार बिकने लगी है और लोग इस कार को बहुत पसंद भी करते हैं। भारत में लक्जरी कार की बिक्री में डीलरशिप और लोगों की प्रशंसा का ज्यादा असर होता है। बीएमडब्ल्यू ने अपने लगभग सभी मॉडलों को भारतीय बाजार में उतारा है। इनमें बेहतर प्रर्दशन करने वाली एम सीरीज और एक्स सीरीज की स्पोर्टस यूटिलिटी व्हीकल(एसयूवी) भी यहां के शोरूम में नजर आएंगी।

बीएमडब्ल्यू की 1 सीरीज और मिनी को अब तक भारतीय बाजार में नहीं उतारा गया है। 1 सीरीज बीएमडब्ल्यू स्टैंडर्ड की पहली छोटी कार है और मिनी मॉडल भी ज्यादा नहीं बिकी है। यह कार लाइफस्टाइल सेगमेंट के तहत ही बिकती है। भारत में इस तरह की कार का कोई बड़ा बाजार अभी नहीं हो सकता है। पूरी दुनिया में बीएमडब्ल्यू कार अपने स्टैंडर्ड और बेहतरीन डिजाइनिंग के  लिए मशहूर है। भारतीय बाजार में लाने के लिए इसमें थोड़ा बदलाव किया गया है। मसलन इसके सेफ्टी और धुएं निकलने की व्यवस्था भी यहां के स्थानीय मानदंडों पर खरी उतरे।

पीटर का कहना है, ‘शोरूम और सेल्स स्टाफ के मामले में हमने भारत में दुनिया की बेहतरीन क्लास को पेश किया है। चेन्नई प्लांट में जितनी मशीन लगी है वह सब नई तकनीक से बनी हुई है। भारत में इस तरह का कोई प्लांट नहीं है जहां इस तरह की मशीनों का इस्तेमाल किया गया हो। बीएमडब्ल्यू का यह पहला प्लांट है जिसमें नई तकनीक वाली मशीनों का इस्तेमाल हो रहा है।’ यहां ट्रेनिंग पर बहुत जोर दिया जाता है। भारत में जो भी बीएमडब्ल्यू के लिए काम करते हैं, वे ब्रांड ट्रेनिंग के लिए पश्चिम एशिया या फिर जर्मनी भेजे जाते हैं।

कई ट्रेनिंग देने वालों को भी भारत लाया जा रहा है। बीएमडब्ल्यू के  भारतीय दफ्तर से सीधा म्यूनिख संपर्क साधा जाता है। पैंटन का कहना है, ‘किसी एक संगठन से कोई आदमी और दूसरे संगठन से कोई दूसरा आदमी फोन या वीडियो कॉन्फेरंस के जरिए हर घंटे एक दूसरे के संपर्क में रहते हैं।’ जब मर्सिडीज भारत में आई तो वह अलग तरह का दौर था। कडलसकर का कहना है, ‘जब हम लोगों ने भारत में कदम रखा तो पाया कि यहां के बाजार में लक्जरी कारों का कोई बाजार नहीं था। हमारी वजह से ही यह बाजार विकसित हुआ।’

पहले से रिपोर्ट मिली थी कि मर्सिडीज की बिक्री बहुत कम होती थी। वर्ष 1996 में जहां 1800 कारों की बिक्री हुई वहीं 1999 में बिक्री घटकर 734 हो गई। मर्सिडीज की जो गाड़ियां भारत में आई उनमें ई220 और ई250 डीजल मॉडल भी शामिल थीं जो डब्ल्यू 124 सीरीज का ही एक हिस्सा है। ई क्लास की डब्ल्यू 210 सीरीज की कार जर्मनी में उतरने के  लिए पूरी तरह तैयार है। जहां तक भारतीय उपभोक्ताओं की बात है उन्हें यह पता था कि लक्जरी कारों के खरीदार ज्यादा घूमने वाले और ज्यादा जानकार भी जरूर होते हैं।

हालांकि यह बहुत पहले की बात है। कडलसकर का कहना है, ‘जब भी कोई कार जर्मनी में लॉन्च होती है तो वह छह महीने के अंदर ही भारत में भी आ जाती है।’ वह इस विचार को बिल्कुल खारिज करते हैं कि बीएमडब्ल्यू मर्सिडीज की तरह उतनी लोकप्रिय नहीं हो पाई है। उनके मुताबिक बीएमडब्ल्यू भी अच्छा प्रर्दशन कर रही है और इसके साथ ही वह कार बाजार में आने वाले नए खिलाड़ियों के लिए भी रास्ता बना रही है। पीटर का कहना है, ‘हममें बहुत दम है और हमारी खासियत यह है कि बिक्री के बाद भी सर्विस सपोर्ट के मामले में काफी दमदार हैं।

हम फिलहाल 28 शहरों में हैं। हम ट्रेनिंग को पूरी तवज्जो देते हैं और हमारे पूरे नेटवर्क को आईएसओ की मान्यता मिली हुई है। फिलहाल 10 शहरों में 12 डीलर हैं जबकि हमारा यह लक्ष्य 2009 में पूरा होना था लेकिन हमने इसे पहले ही पूरा कर लिया। अगले साल के अंत तक हमारे 15 डीलर होंगे।’ बीएमडब्ल्यू कार बाजार में अपनी पकड़ बनाने के लिए पूरी सर्तकता और उम्मीदों के साथ काम कर रही है। पैंटन का कहना है, ‘भारत में केवल मर्सिडीज से आगे जाना ही एकमात्र लक्ष्य नही, दूसरे लक्ष्य भी हैं। मुझे लगता है कि हम मर्सिडीज से आगे होंगे चाहे 2009 में या फिर 2010 में। यह मुझे नहीं पता है।’

First Published : July 28, 2008 | 11:44 PM IST