आज से करीब 10 साल पहले 11 मई को तत्कालीन एनडीए सरकार ने भारत के औपचारिक रूप से न्यूक्लियर क्लब में शामिल होने का ऐलान किया था।
इस दिन भारत ने कई भूमिगत परीक्षण किए। इसके कुछ दिन बाद 2 और परीक्षण किए गए थे। इस पर पूरी दुनिया के देशों ने शुरू में काफी सख्त प्रतिक्रिया जताई थी। इस बाबत उठे तूफान को शांत करने के लिए हमारे देश को काफी कूटनीतिक पहल करनी पड़ी।
हालांकि परमाणु परीक्षण के पैरोकारों की यह बात सही साबित हुई कि देर-सबेर पूरी दुनिया को भारत के न्यूक्लियर स्टेटस को स्वीकार करना पड़ेगा। लेकिन उनके इस दावे पर कि न्यूक्लियर क्लब में शामिल होने से पूरी दुनिया में भारत का रुतबा बढ़ जाएगा, सवाल उठाए जा सकते हैं।
गौरतलब है कि पाकिस्तान और उत्तर कोरिया ने भी परमाणु परीक्षण किए थे और इस वजह से दोनों के अंतरराष्ट्रीय रुतबे पर कोई असर नहीं पड़ा। यह दलील दी जा सकती है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती भूमिका की वजह यहां हो रहे आर्थिक विकास और टिकाऊ लोकतंत्र का होना है।
हालांकि भारत अब तक परमाणु अप्रसार संधि और न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसज) की बाधाओं को पार करने में नाकाम रहा है। फिलहाल भारत के पास इन बाधाओं से निपटने का बेहतरीन मौका है, क्योंकि बुश ने द्विपक्षीय संदर्भ में परमाणु मुद्दे से मुक्ति पाने का फैसला किया है। परमाणु मुद्दे पर अमेरिका, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी, एनएसजी से समझौता हमारे टेस्ट की तार्किक परिणति होता, लेकिन वामपंथी पार्टियां अब तक इसमें अडंग़ा लगाती रही हैं।
इससे भी हैरानी की बात यह है कि लंबे अर्से से भारत के परमाणु ताकत बनने की वकालत करने वाली पार्टी बीजेपी भी उन कदमों का विरोध कर रही है, जिसके जरिये बगैर परमाणु अप्रसार संधि का सदस्य हुए भारत को परमाणु संपन्न देश का दर्जा मिल सकता है।
इसके मद्देनजर कहा जा सकता है कि जिस टेस्ट का लाभ दशकों पहले लाभ भारत को मिल सकता था , प्रतिस्पर्धा की राजनीति की वजह से देश को इस लाभ से अब भी वंचित किया जा रहा है। बेशक इस पूरी प्रक्रिया में भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और साख को भारी नुकसान पहुंचा है।
बहरहाल अब अपने पड़ोसी मुल्क की बात करते हैं। दरअसल भारत और पाकिस्तान दोनों के पास परमाणु हथियार होने का मतलब यह है कि दोनों मुल्कों के बीच एक और युध्द की संभावना काफी कम है। परंपरागत सैन्य बलों और हथियारों के मामले में भारत का पलड़ा पाकिस्तान से काफी भारी है और इसके मद्देनजर पाकिस्तान अपने परमाणु कार्यक्रम का इस्तेमाल भारत के इस प्रभाव को कम करने में करता है।
अहम सवाल यह है कि क्या इस परिस्थिति के मद्देनजर दोनों देशों को सकारात्मक बातचीत और असैन्यीकरण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिल सकेगी। दोनों देशों के बीच युध्द से भी बड़ी चिंता यह है कि पाकिस्तान का परमाणु हथियार जेहादियों के हाथ में पहुंच सकता है, जिसके प्रलंयकारी परिणाम होंगे।