मारुति सुजुकी के चेयरमैन आर. सी. भार्गव उन खास लोगों में से हैं जिन्होंने संजय गांधी के ‘आम आदमी की कार’ के सपने को साकार करने में अहम भूमिका निभाई।
भार्गव उन लोगों में से हैं जिनके प्रयासों से मारुति 800 के सपने ने मूर्त रूप लिया। कंपनी की बोर्ड रूम बैठकों में कई बार बात हुई कि मारुति 800 का मॉडल बहुत पुराना पड़ चुका है, इसलिए अब इसको बंद कर देना चाहिए लेकिन भार्गव ने हमेशा इसका बचाव ही किया।
14 दिसंबर 2008 को मारुति 800 को 25 साल हो जाएंगे। इस पूरी यात्रा के कई पड़ावों पर हमारे संवाददाता डैनी गुडमैन ने आर. सी. भार्गव से बातचीत की। पेश हैं उसके प्रमुख अंश:
आपने मारुति के साझेदार के लिए सुजुकी का ही चयन क्यों किया?
अस्सी के दशक की शुरुआत में सरकार ने छोटी कार योजना के साझेदार के तौर पर फॉक्सवैगन का चुनाव कर ही लिया था और इसके लिए फॉक्सवैगन की गोल्फ को चुन लिया गया था। लेकिन हमें लगा कि भारतीय बाजार के लिहाज से गोल्फ खासी महंगी थी।
उसके बाद रेनो की 18000 सीसी की कार पर भी बात हुई लेकिन बन नहीं पाई। दरअसल यह सारी भागदौड़ बिना बाजार की नब्ज जानकर की जा रही थी। साझेदारों की तलाश में हम पहले तो यूरोप और बाद में जापान गए।
जापान में हमने निसान, मित्सुबिशी, दाइहात्सु और सबसे आखिर में सुजुकी से बात की। उनमें से कोई भी कंपनी भारत में 40 फीसदी हिस्सेदारी के मुद्दे पर सहमत नहीं थी। केवल सुजूकी 26 फीसदी पर तैयार थी और बाद में हिस्सेदारी को बढ़ाकर 40 फीसदी तक करने पर सहमत थी। छोटी कार के लिए सुजूकी की 550 सीसी की फ्रोंट का चयन किया गया जो बाद में मारुति 800 बनी।
आपने मारुति के शुरुआती मॉडल कैसे तैयार किए?
कार बनाने से पहले तो हमने फर्श साफ करने का तजुर्बा किया। हम अक्टूबर 1983 में कार असेंबल करने की स्थिति में थे। लेकिन सुजूकी के इंजीनियरों ने हरी झंडी नहीं दी। डाइरेक्टर (प्रोडक्शन) ए शिनोहारा ने ने कहा कि फर्श बहुत गंदा है और उसको साफ करना चाहिए। उन्होंने बाल्टी उठाई और सफाई में जुट गए। उनको देखते हुए हमने भी ऐसा ही किया। एक हफ्ते तक हम उसी काम में लगे रहे।
आप लोगों ने कार के लिए पुर्जे कहां से जुटाए?
शुरुआत में बनने वाली मारुति 800 में लगा 97 फीसदी सामान आयातित था। केवल तीन फीसदी माल ऐसा था जो देश से ही लिया गया था। इसमें भी टायर और बैटरी जैसी चीजें ही थीं। देसी होने के बावजूद यह हमारे लिए काफी खर्चीला था लेकिन हमनें इसको जारी रखा। हमारी योजना अगले पांच साल में इस 3 फीसदी आंकड़े को बढ़ाकर 93 फीसदी तक करने की थी।
यह भी कम मुश्किल काम नहीं था। इसके लिए हमें वेंडर्स की जरूरत थी। उन दिनों कारोबारियों को नई तकनीक और ऑटो उद्योग के लिए पुर्जे बनाने के लिए सहमत करना बहुत चुनौतीपूर्ण था। हमने उनका हौसला बढ़ाने के लिए जगह के साथ-साथ बिजली भी मुहैया कराई।
हमने सोना कोया जैसी कंपनी के अलावा कुछ और के साथ संयुक्त उपक्रम भी लगाए। सुजुकी के इंजीनियरों ने भी इसमें मदद की। सबसे खास बात यह रही कि हमने उन्हें मुनाफे के लिए आश्वस्त किया। सुजुकी ने भी इससे पहले ऐसा नहीं किया था।
एक दशक तक बेहतरीन सफलता के बाद कंपनी ने मारुति 800 को बंद करने का फैसला कर लिया था लेकिन कहते है कि आपने उसका विरोध किया था?
जब 1992 में जेन ने बाजार में दस्तक दी थी तब सुजूकी के कुछ लोगों का मानना था कि मारुति 800 को बंद कर देना चाहिए। मैंने कहा कि दोनों कारों का अपना अलग वजूद है। आप किसी एक कार को दूसरे से नहीं बदल सकते। मिस्टर सुजुकी (कंपनी के संस्थापक) मेरी बात से सहमत दिखे और मारुति 800 का उत्पादन लगातार चलता रहा।
कार के लिए साझेदार का चयन करने के मौके पर या फिर कंपनी को चलाने के दौरान आप पर कभी राजनीतिक दबाव भी पड़ा या नहीं?
ऐसा कोई भी दखल नहीं था। तब तक श्रीमती इंदिरा गांधी जिंदा थीं तब तक ऐसा करने की किसी की हिम्मत भी नहीं थी। संजय गांधी की पहली पुण्यतिथि (14 दिसंबर 1983 ) पर ही इंदिरा जी ने मारुति की पहली खेप जारी की थी। बाद में सरकारी मदद मिलने में अरुण नेहरू ने हमारी काफी मदद की।
जब आपने 1981 में मारुति उद्योग लिमिटेड में शामिल होने का फैसला किया था तब आपके मन में कुछ दुविधा थी?
मैं 1979 से 1981 के बीच बीएचईएल में निदेशक (वाणिज्यिक परिचालन) था और डा. कृष्णमूर्ति अध्यक्ष थे। मारुति एक महत्वाकांक्षी राजनीतिक योजना थी और उस वक्त इसका कोई खास भविष्य नहीं नजर आ रहा था। इसलिए लोगों ने इसमें शामिल होने के मेरे फैसले पर मुझे काफी डराया।
मुझे तीन साल के लिए डेपुटेशन पर मारुति में भेजा गया। लेकिन मैंने वहीं पर काम करने को तरजीह दी। मैंने भारतीय प्रशासनिक सेवा को छोड़ दिया। हम दोनों का सपना मारुति को बुलंदियों पर पहुंचाने का था। पीछे मुड़कर देखता हूं तो अपने फैसले पर मुझे कतई अफसोस नहीं होता।