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आत्मनिर्भरता के बदलते मायने और सुरक्षा

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 3:02 AM IST

एक जमाना था, जब डीआरडीओ के मुख्यालय में ‘आत्मनिर्भरता’ के नाम पर पैसों के ढेर जमा हुआ करते थे। साथ ही, उसे मिला करते थे खूब सारे लोग और प्रयोगशालाएं।


लेकिन सेना, मीडिया और मंत्रालय से मिल रही जबरदस्त आलोचना की वजह से उसे अपना रवैया बदलना पड़ रहा है। उसके मुख्यालय में ‘स्वदेशी ताकत’ जैसे नारों की जगह ‘अंतरराष्ट्रीय सहयोग’ और ‘एकीकृत प्रबंधन’ ने ले ली है।

हवा के इस बदले रुख के लिए जिम्मेदार है भारत के बदलते हालात। तकनीक देने में बड़े-बड़े मुल्कों की ना-नुकुर सुनने के बाद उसने हथियार बनाने वाली कंपनियों के ही साथ मिलकर अलग तकनीक बनानी शुरू कर दी। इससे रक्षा विशेषज्ञों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है – क्या यह ‘आत्मनिर्भरता’ के नए मतलब निकालने का सही वक्त है?

डिजाइन के मामले में आत्मनिर्भरता तो है, जिसके बारे में डीआरडीओ खुलेआम ढिंढोरा पीटता आ रहा है। साथ ही, उत्पादन के मामले में भी इसमें आत्मनिर्भरता का पुट है। क्यों? दरअसल, हथियार भले ही किसी दूसरे मुल्क में डिजाइन हुए हों, लेकिन उनका उत्पादन हमारे देश में ही हो रहा है। यह बात अलग है कि इसके लिए हमें लाइसेंस लेना पड़ता है।

डीआरडीओ को समझ में आ गया है कि उसे अब चुन-चुनकर टेक्नोलॉजि का विकास करना पड़ेगा। रणनीतिक तौर पर अहम तकनीकें जैसे परमाणु , मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर उसी के पास रहेंगे, चाहें उनका विकास करने में डीआरडीओ को कितना भी वक्त क्यों न लग जाए। लेकिन अब जब हिंदुस्तान के पास रक्षा पर मोटा खर्च करने की क्षमता आ गई है, हम उन तकनीकों के बीच अंतर कर सकते हैं, जिन्हें हमें विकसित करना ही चाहिए  और जिन्हें हम खरीद सकते हैं। 

इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा विकास के समय का है। किसी हथियार की अहमियत तभी तक होती है, जब वह बाजार में आने से पहले सेना के पास पहुंच जाए। रणनीतिक तौर पर अहम तकनीकों को छोड़कर बाकी की सभी तकनीकें आखिर में बाजार तक पहुंच ही जाती हैं। मिसाल के तौर पर एईएसए एयरक्राफ्ट रडार को ही ले लीजिए। कुछ दिन पहले तक अमेरिका इसे बेचने के सख्त खिलाफ था, लेकिन आज यह खुलेआम बाजार में मौजूद है।

अगर कोई हथियार को खरीदना उससे विकसित करने से ज्यादा सस्ता हो, तो डीआरडीओ को भी उस हथियार के विकास से बचना चाहिए। रक्षा अर्थशास्त्र का एक बुनियादी नियम यह है कि किसी हथियार या रक्षा उत्पाद को बनाना, उसे खरीदने से ज्यादा महंगा पड़ता है। इसलिए हथियार को विकसित करना तभी ठीक रहता है, जब वह अंतरराष्ट्रीय बाजार में आने से पहले आपकी सेना के पास आ जाए।

अगर उस हथियार के आपकी सेना के पास आने से पहले ही कोई दूसरा देश उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार दे, तो उसे विकसित करने का पूरा इरादा ही बेमानी साबित हो जाएगा। अब तक डीआरडीओ यही कहता आ रहा है कि किसी हथियार को विकसित करने के लिए की गई कोई भी कोशिश बेकार नहीं जाती। डीआरडीओ के मुताबिक ‘त्रिशूल मिसाइल’ जैसे असफल प्रयासों से भी अगली पीढ़ी के हथियार बनाने में काफी मदद मिलती है।

इसलिए उसके मुताबिक सरकार से मिली एक-एक पाई का वह पूरा इस्तेमाल करता है। लेकिन इस तर्क से यह लगता है कि आगे चलकर एक ऐसा वक्त आएगा, जब उस हथियार की अगली पीढ़ी उस समय बाजार में मौजूद सभी विकल्पों को पीछे छोड़ते हुए सेना में शामिल हो जाएगी। दूसरी तरफ, बेकार हुए पैसों के मामले में भी डीआरडीओ का यह तर्क खरा नहीं उतरता।

एक असफल मिसाइल प्रोजेक्ट पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च होते हैं। उन रुपये से हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण किया जा सकता था, सरहद पर बाड़ लगाई जा सकती थी या फिर सैनिकों के लिए घर बनाए जा सकते थे। एक असफल हुए प्रोग्राम पर खर्च हुई रकम का ऑडिट करना तो बेहद आसान है, लेकिन उस नुकसान का आकलन करना काफी मुश्किल है, जो उन पैसों के किसी सही काम के लिए इस्तेमाल नहीं होने से हुआ।

आत्मनिर्भरता को हासिल करने के लिए डिजाइन तैयार करने की क्षमता के साथ-साथ उत्पादन करने की क्षमता को भी हासिल करना काफी जरूरी होता है। इसलिए आत्मनिर्भरता का आकलन करने के लिए रक्षा उत्पादन के उस हिस्से का पता लगाना भी काफी जरूरी हो जाता है, जो देश में होता है। इस हिस्से को तकनीक हस्तांतरण और लाइसेंस्ड प्रोडक्शन जैसे कई नीतिगत बदलावों के जरिये बढ़ाया जा सकता है।

भारत की बढ़ती कमाई को देखकर इन बदलावों को सही माना जा सकता है। क्यों? जब अपने देश में विकसित तकनीक विश्व बाजार में मौजूद तकनीक से गुणवत्ता के मामले में कोसों पीछे हों, तो उस तकनीक का कोई फायदा नहीं है। ऐसी हालत में उसके विकास को रोक कर उसे विश्व बाजार से खरीदना ही आर्थिक रूप से सही फैसला होगा। इस मामले में साथ मिलकर तकनीकी विकास और लाइसेंस्ड प्रोडक्शन करना ही सही रास्ता है।

एक तरफ जहां हम लड़ाकू विमानों को खरीदने की सोच रहे हैं, कई देशों ने इन विमानों को खरीदने के अपने इरादे को छोड़ एफ-35 ज्वाइंट स्ट्राइक फाइटर कार्यक्रम में हिस्सा लेना ज्यादा बेहतर समझा। पांचवीं पीढ़ी के इस गजब के लड़ाकू विमान को अमेरिकी कंपनियां विकसित कर रही हैं। साथ में, इसमें कई दूसरे देश भी अपने पैसे लगा रहे हैं।

यह जेट आगे चलकर दुनिया का आधुनिकतम फाइटर जेट बन जाएगा। इसलिए तो ये मुल्क अमेरिकी रिसर्च प्रोग्राम में पैसा लगा रहे हैं, ताकि आगे चलकर उन्हें भी यह एयरक्राफ्ट मिल सके। हालांकि, इसकी तुलना अपना खुद का अपना लड़ाकू विमान बनाने के साथ नहीं की जा सकती, लेकिन बीच का यह रास्ता इसे बाजार से ऊंची कीमत चुकाकर खरीदने से कहीं अच्छा है। इस तरह के प्रोग्राम से भारत को कल के हथियारों के विकास की प्रक्रिया में झांकने की इजाजत मिल जाएगी।

साथ ही, अपने खुद के विकास कार्यक्रम पर भी इसका असर नहीं पड़ेगा। भारतीय फौज के नीति-निर्धारक इस तरह की नीति पर विचार कर सकते हैं। इन सभी बातों का उल्लेख रक्षा मंत्रालय के आगामी रूलबुक, रक्षा खरीद नीति, 2008 में किया गया है। इसमें तकनीकों को तीन आधार पर बांटा गया है। इसमें ‘मेक’ शब्द का इस्तेमाल डीआरडीओ द्वारा विकसित तकनीक के लिए किया गया है।

साथ ही, ‘बाय ऐंड मेक’ शब्द का इस्तेमाल उन तकनीकों के लिए किया गया है, जिसे खरीदा तो गया है विदेशों से, लेकिन उनके आधार पर निर्माण मुल्क में ही होगा। इसके अलावा, ‘बाय’ शब्द का इस्तेमाल ऐसे हथियारों और उत्पादों के लिए किया गया है, जिन्हें सीधे विदेशों से खरीदा जाएगा। वैसे, जो भी फैसला रक्षा मंत्रालय ले, उसकी खाल तो अच्छे तरीके से उधेड़ी ही जाएगी। 

First Published : June 2, 2008 | 11:29 PM IST