साल के छह महीने गुजर चुके हैं, लेकिन बॉलीवुड के लिए एक्का दुक्का पूरे चांद की रात को छोड़कर इस पूरे दौरान अमावस्या ही बनी रही। इस आधे साल के दौरान मायानगरी की कुछेक फिल्में ही लोगों के दिलों को भा सकीं।
कुछ निर्माता तो इसका दोष आईपीएल ट्वंटी-20 टूर्नामेंट पर मढ़ रहे हैं, जिसने पूरे डेढ़ महीने तक लोगों को अपने मोहपाश में बांधे रखा। उनके मुताबिक यही वह वजह है, जिस कारण भीड़ सिनेमा हॉलों के बजाए स्टेडियमों में ही दिखी। हालांकि, असल दिक्कत कुछ और ही है। बॉलीवुड के लिए साल की पहली छमाही में इतने खराब प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार है, फिल्मों की घटिया क्वालिटी।
मिसाल के तौर पर बड़े बजट की फिल्म ‘टशन’ को ही ले लीजिए। इसमें बड़े सितारे, दिलकश लोकेशन और एक बहुत बड़े बैनर का नाम था। मतलब, वह सारा मसाला जो किसी फिल्म को हिट बनाने के लिए काफी होता है। कुछ नहीं था, तो वही थी एक अच्छी स्क्रिप्ट। इसी वजह से यह फिल्म पिट गई। हिंदुस्तानी दर्शकों को अच्छी तरह से पता है कि उन्हें क्या चाहिए? वे तबतक सिनेमा हॉलों में उतरने के लिए तैयार नहीं जब तक कि उन्हें अपने पैसे वसूल होने का भरोसा न हो जाए।
अपने मुल्क में फिल्मों का वितरण करना अब भी काफी जोखिम भरा काम है। इसकी बड़ी वजह यह है कि आज भी फिल्मों की पूरी कमाई का 60 से 65 फीसदी हिस्सा सिनेमा हॉलों से ही आता है। अब तो जोखिम बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि फिल्मों पर लगे पैसे जो बढ़ते जा रहे हैं। केवल फिल्म बनाने के लिए ही या फिर सितारों की फीस ही नहीं, बल्कि अब तो मार्केटिंग और फिल्मों के प्रमोशन पर खर्च होने वाली रकम में काफी तेज इजाफा हुआ है।
आज की तारीख में फिल्म की मार्केटिंग और प्रमोशन उसकी कामयाबी के लिए काफी जरूरी चीज हो गई है। इसी वजह से प्रमोशन और मार्केटिंग पर ही उस फिल्म का 15 से 20 फीसदी बजट खर्च हो जाता है। लेकिन इस मोटी रकम को खर्च करने के लिए निवेशक खुशी-खुशी तैयार हैं। जैसे-जैसे फिल्मी दुनिया का कॉरपोरेटाइजेशन हो रहा है, यहां पैसों की बरसात और भी तेज होती जा रही है। इसी वजह से तो इरोस इंटरनैशनल जैसी कंपनी भी आज की तारीख में ‘ओम शांति ओम’ के अधिकार खरीदने के वास्ते 75 करोड़ रुपये दे सकती है।
पिछले साल जून में इंडियन फिल्म कंपनी ने लंदन शेयर बाजार से 10.9 करोड़ डॉलर (करीब 466 करोड़ रुपये) उगाहे थे। गोल्डमैन सैक्स की मानें तो इस साल की पहली छमाही में देसी निर्माताओं और विदेशी प्रोडक्शन हाउसों या फिर निवेशकों के बीच फिल्म बनाने के लिए करीब दो अरब डॉलर (8540 करोड़ रुपये) के करार हो चुके हैं। इस पैसे से अगले डेढ़ साल में ये देसी निर्माता फिल्में बनाएंगे। मिसाल के लिए पीवीआर पिक्चर्स को ही ले लीजिए। उसने आईसीआईसीआई वेंचर्स और जेपी मॉर्गन ग्रुप की एक कंपनी के साथ 120 करोड़ रुपये का एक करार किया है।
फिल्मों का बजट बढ़ने के साथ वितरक या डिस्ट्रीब्यूटर भी उनके लिए ऊंची से ऊंची रकम देने के लिए तैयार रहने लगे हैं। अक्सर बड़ी जेब और मोटा बैंक बैलेंस रखने वाले वितरक फिल्मों के लिए जरूरत से ज्यादा रकम दे देते हैं। अब यूटीवी की ही नजीर ले लीजिए। यूटीवी ने रेस के अधिकार के लिए 60 करोड़ रुपये की मोटी रकम दी थी और फिल्म भी सुपरहिट रही थी। फिर भी विश्लेषकों की मानें तो इस फिल्म पर यूटीवी ने पैसे गंवाए ही क्योंकि उसने इसके लिए इतनी बड़ी रकम पहले ही चुका दी थी।
निवेशकों की मानें तो अब यहां जोखिम काफी कम हो चुका है क्योंकि अब कमाई के दूसरे रास्ते भी खुल गए हैं। यह बात काफी हद तक सही भी है। अर्नेस्ट ऐंड यंग के मुताबिक हिंदी फिल्मों का परदेस में मौजूद बाजार करीब 20 करोड़ डॉलर (854 करोड़ रुपये) का है और यह सालाना 20 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है। अब ‘गुरू’ को ही ले लीजिए। इसने कुल मिलाकर 2.2 करोड़ डॉलर (करीब 94 करोड़ रुपये) की कमाई की थी, जिसमें से 40 लाख डॉलर (17.08 करोड़ रुपये) इसने विदेशी बाजारों से की।
वैसे, तो यह फिल्मों की कुल कमाई के आठ फीसदी के ही आस-पास रहता है, लेकिन जो फिल्में देसी बाजार में नहीं वे विदेशी में अच्छी-खासी चांदी काट लेती हैं। अब तो होम वीडियो बाजार में काफी रफ्तार पकड़ रहा है क्योंकि फिल्मों की वीसीडी या डीवीडी की कीमतों में भारी गिरावट आई है। अब तो फिल्मों के थियेटर में आने के महीने भर के भीतर ही उनकी डीवीडी या वीसीडी बाजार में आ जाती है। डीवीडी की बढ़ती खरीद की एक वजह मल्टीप्लेक्स टिकटों की गैर वाजिब कीमत भी है।
पीवीआर के टिकटों की कीमत में इजाफा की वजह से इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में उसके दर्शकों की तादाद में कमी आई है। मजे की बात यह है कि इस दौरान डीवीडी के मुरीदों की तादाद बढ़ी है। फिर भी फिल्मों की कुल कमाई में डीवीडी और वीसीडी से होने वाली कमाई का हिस्सा केवल चार फीसदी का ही है। टीवी एक ऐसा जरिया है, जिसका फिल्मों की कमाई में 15 फीसदी का अच्छा-खासा हिस्सा है। लेकिन यह भी बॉक्स ऑफिस पर फिल्म की कामयाबी पर ही निर्भर करता है कि वह टीवी के जरिये कितनी कमाई कर पाएगी।
अब तो वितरक ने उन फिल्मों के टीवी अधिकार भी लेने शुरू कर दिए हैं, जिनकी कामयाबी पर उन्हें शक होता है। इस बुरा आइडिया तो नहीं कहा जा सकता है। अब तक फिल्में अपनी कमाई का 10 फीसदी हिस्सा म्यूजिक राइट्स के जरिये उगाह लेते थे। लेकिन अब एफएम रेडियो की लोकप्रियता की वजह से संगीत का हिस्सा भी कम होने लगा है। इसका मतलब है कि कमाई की इन पगडंडियो को पक्के रास्ते में तब्दील होने में थोड़ा वक्त लग जाएगा। इसलिए फिल्मों पर पैसे लगाने वालों ने भी कमाई के लिए अब एक अनोखा रास्ता ढूंढ निकाला है। वे अब एक या दो नहीं, कई सारी फिल्म बनाते हैं।
कुछ बड़ी और कुछ छोटी, ताकि अगर 10 से छह फिल्में डूब भी जाएं तो बाकी की चार फिल्में 10 फिल्मों के बराबर पैसा कमा लें। ऊपर से देखें तो स्टूडियो मॉडल नाम का यह तरीका काफी अच्छा रास्ता लगता है। लेकिन हकीकत में यशराज फिल्म्स जैसे प्रोडक्शन हाउस भी हैं, जिन्होंने एक के बाद एक फ्लॉप फिल्में की हैं। हालांकि, स्टूडियो मॉडल को भी कामयाब होने के लिए अनुशासन की जरूरत होती है। मायानगरी में नए तरह के टे्रंड चल निकले हैं, जो परेशान कर देने वाले हैं। कंपनियां अब बिकने वाले सितारों को काफी मोटी रकम देकर साइन करने लगे हैं।
पिछले कुछ सालों में ‘तारे जमीं पर’, ‘चीनी कम’ और ‘खोसला का घोंसला’ जैसी छोटी बजट की फिल्में संकटमोचक के रूप में आईं हैं। अपनी अच्छी स्टोरी लाइन की वजह से वे लोगों को भी काफी पसंद आए थे और वितरकों को मोटी कमाई भी दे गए। केपीएमजी की मानें तो 2006 में फिल्मों की कमाई गिरकर 8000 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गई थी। हालांकि, 2007 में बॉलीवुड में सुपरहिट फिल्मों का सूखा खत्म हुआ। बहुत बुरा लगेगा, अगर वह सूखा वापस आ जाएगा। आखिरकार सच्ची मुंबइया फिल्म तो वही है, जिसमें अंत में सब कुछ अच्छा हो जाता है।