पिछले एक दो साल में भारत के आर्थिक विकास को लेकर कई अध्ययन रिपोर्ट, शोध और पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और उन सबका एक ही निष्कर्ष निकल कर आया है कि देश की विकास दर एक अकाटय सच्चाई है और इसके सतत रहने की उम्मीद है।
वर्ष 2003 के बाद से देश की अर्थव्यवस्था में आई तेजी से इसमें संरचनात्मक परिवर्तन का पता चलता है। इसके पीछे कई सुधार प्रक्रियाओं का हाथ रहा है। जहां तक विकास में गति की बात है तो भारत को चीन के बाद दूसरा स्थान भले ही मिला हो, पर विकास के पहिये जिस रफ्तार के साथ दौड़े हैं उसके लिए भारत को कम से कम दूसरे पायदान के लिए कुछ खास मशक्कत तो नहीं करनी पड़ी है।
यही नहीं, कई लोग तो भारत और चीन को विकास के एक ही तराजू पर तौल कर देखने लगे थे। हालांकि, यह सभी जानते हैं कि हर अध्याय का अंत होता है, भले ही वह कितना ही अच्छा क्यों न हो, पर इस बार विकास के पहिये को काफी आगे तक घूमना है, यह तय है। ठीक ऐसे समय में जब देश की अर्थव्यवस्था को लेकर जानकार आश्वस्त होने लगे थे और देश के सुखद भविष्य के सपने संजोए जाने लगे थे, तभी पिछले कुछ हफ्तों से कुछ खौफनाक मंजर सामने आने लगे।
इस डरावने सपने में महंगाई, कच्चे तेल की कीमतें, नियंत्रण से बाहर होते वित्तीय हालात, रुपये का गिरता मूल्य डराने के लिए काफी थे। इनका चेहरा बार बार घूम कर सामने आने लगा है। माना कि इन हालात के पीछे बाहरी कारकों का हाथ महत्त्वपूर्ण रहा है, फिर भी प्रश्न यह है कि क्या एक समय देश जो कि उभरते बाजारों का पसंदीदा हुआ करता था, कुछेक महीनों में ही उन्हें दुबारा सोचने पर मजबूर कर देगा।
क्या पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश की अर्थव्यवस्था की जो अडिग बुनियाद रखी गई थी वह एक ही झटके में कमजोर पड़ने लगेगी? इस सवाल का जवाब काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति अर्थव्यवस्था के विकास को किस तरीके से देखता है। एक स्तर पर विकास-महंगाई-राजकोषीय भुगतान को एक नए कारोबारी चक्र के रूप में उभरता हुआ देखने में कोई परेशानी नहीं है।
हालांकि, यह जरूर है कि इस पर आपूर्ति व्यवस्था, कच्चे तेल, खाद्य और दूसरे जिंसों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। पर यह समझना जरूरी है कि विकसित देशों की तुलना में उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों से युक्त इस कारोबारी चक्र के प्रतिकूल प्रभावों को झेलना ज्यादा आसान है। यह जरूर है कि आपूर्ति कारकों की वजह से यह प्रक्रिया थोड़ी कठिन जरूर हो जाती है, पर इतनी मुश्किल भी नहीं होती कि इनका मुकाबला ही नहीं किया जा सके।
इस परीक्षा की घड़ी में भारत समेत दूसरी अर्थव्यवस्थाएं भी इस भंवर जाल से निकलने की कोशिश में जुटी हुई हैं। आपूर्ति के झटके से बाहर निकलने के लिए या फिर इसका मुकाबला करने के लिए यह जरूरी है कि घरेलू उपभोक्ताओं को बढ़ी हुई कीमतों से खुद मुकाबला करने का मौका मिले। इन हालात का मुकाबला करने के लिए जितनी जल्दी कमर कस ली जाए और उतनी जल्दी ही सतत विकास वाली अर्थव्यवस्था की ओर फिर से लौटना मुमकिन हो जाएगा।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हालात से मुकाबला करना इतना आसान नहीं होगा जितना कहना होता है और इसमें परेशानियां भी उतनी ही आएंगी। पर अगर हम इन तकलीफों को ध्यान में रखकर ही नीतियों को उठाने में कोताही बरतने लगें तो भी समाधान निकलने की गुंजाइश नहीं बनती। अब जरा हम कच्चे तेल की कीमतों को लेकर भारत सरकार के प्रयासों पर एक नजर डालते हैं।
सरकार ने भले ही तेल की कीमतों को लेकर एक छोटा सा कदम ही उठाया हो, पर परिस्थितियों को बेहतर बनाने के लिए कदम उठाए गए हैं, इसकी सराहना तो करनी ही पड़ेगी। भारत की तरह ही कई दूसरे देशों ने भी इस सिलसिले में आवश्यक कदम उठाए हैं और अंतत: इससे विश्व स्तर पर ईंधन का इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं में यह समझ विकसित होगी कि उन्हें खपत कम करनी चाहिए। जब खपत कम होगी तो निश्चित तौर पर कीमतें घटेंगी।
माना कि इसमें थोड़ा समय तो लगेगा, पर इस दिशा में कदम उठाना भी एक बड़ी बात है। हालांकि, भारत की कहानी कभी भी कारोबारी चक्र या प्रभावी आर्थिक प्रबंधन से जुड़ी नहीं रही है। हां, विकास को बढ़ावा देने वाले मजबूत घरेलू कारकों, दक्ष और पेशेवर कामगारों, महत्वाकांक्षी उद्यमियों, सुविधायुक्त वातावरण और विकासशील नीतियों का जिक्र देश के संबंध में जरूर किया जाता रहा है। अब तक तो हम इस बारे में ही आश्वस्त रहे हैं कि विकास का पहिया वैश्विक भूचालों से अवरुद्ध नहीं हो सकेगा।
देश में जो अनुकूल वातावरण है वह अपने आप में काफी महत्त्वपूर्ण पक्ष है। यह भारत के राजकोषीय अनुशासन का ही परिणाम है कि तेल और खाद्य पर दी जा रही सब्सिडी के बावजूद देश का राजकोषीय घाटा सीमित रहा है। पर जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति में कमी देखी जाती है तो इससे कीमतें बढ़ती हैं, पर इन कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए हर समय भारी मात्रा में सब्सिडी देना किसी भी देश के लिए संभव नहीं होता।
और आप अगर सब्सिडी के बल पर घरेलू बाजार में बढ़ रही कीमतों को नियंत्रण में रखने का प्रयास करें भी तो यह कुछ ही समय के लिए संभव हो पाएगा। हम आपूर्ति में जिस कमी की चर्चा कर चुके हैं, उससे भी बड़ी एक समस्या अर्थव्यवस्था की ओर सिर उठाए खड़ी है और इस समस्या को जन्म देने के लिए कोई और नहीं बल्कि, हम खुद जिम्मेदार हैं। हाल के दिनों में विभिन्न क्षेत्रों के विकास में सबसे बड़ी बाधा कामगारों की कमी के चलते देखने को मिली है।
जैसे-जैसे विकास दर बढ़ी है वैसे-वैसे भौतिक बुनियादी ढांचों में खामियां और स्पष्ट तौर पर उभर कर सामने आई हैं। इसके लिए सुधार के लिए नीति निर्धारण और उसके क्रियान्वयन दोनों को ही बराबर का जिम्मेदार समझा जा सकता है। देश के आर्थिक विकास की कहानी को मौजूदा समय में खाद्य कीमतों में आई बढ़ोतरी से भी खतरा है। सालों से ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश को कम किया जाता रहा है, ऐसे में जब लागत में कमी की जाएगी तो स्वाभाविक है कि इसका असर तो उत्पादन पर पड़ेगा ही।
कम उत्पादन के बीच कीमतों को बढ़ने से नहीं रोका जा सकता है। चाहे किसी व्यक्ति की आय अच्छी खासी क्यों न हो, पर जिस रफ्तार से कीमतें बढ़ी हैं, इसका प्रभाव सब पर पड़ना निश्चित है। शायद कहीं न कहीं खेतों (किसानों) को सीधे सीधे उपभोक्ताओं से जोड़ने में कुछ चूक हुई है। खाद और ईंधन की कीमतों को तय करने में भी कुछ गड़बड़ियां हुई हैं और इससे हालात सुधरने की बजाय बिगड़ते चले गए हैं।
मौजूदा वित्तीय हालात सतत त्वरित विकास के लिए खतरा बन कर उभरे हैं और ऐसा माना जा रहा है कि इनका प्रभाव भी लंबे समय तक देखने को मिल सकता है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि ये हालात सरकार की ओर से उठाए गए कदमों का नतीजा हैं: कई मौकों पर या तो सरकार उचित कदम नहीं उठा पाई है या तो अति उत्साह में गलत कदम उठाए गए हैं।