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सिंगुर पर पर्दा अभी उठा नहीं

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:40 PM IST

सिंगुर के ड्रामे से अभी पर्दा पूरी तरह उठा नहीं है।


पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने अपनी ओर से कोशिश की कि वार्ता के जरिए विवाद का हल ढूंढा जा सके और पिछले कुछ समय से चल रहा गतिरोध खत्म किया जाए, पर इसे लेकर अब भी संशय की स्थिति बनी हुई है कि क्या उनकी यह कोशिश रंग लाई है।

रविवार की घोषणाओं से अब यह प्रश्न चिह्न लग गया है कि नैनो परियोजना के लिए कार के पुर्जे उपलब्ध कराने वाली कंपनियों का क्या होगा। यह साफ साफ पता नहीं चल सका है कि आखिर ममता बनर्जी किन मांगों को लेकर विरोध कर रही हैं।

इधर पश्चिम बंगाल सरकार ने घोषणा कर दी है कि नैनौ परियोजना के लिए जो जमीन दी गई थी वह उसका फिर से सर्वे करवाना चाहती है ताकि पता चल सके कि सच्चाई क्या है। टाटा मोटर्स ने भी साफ कह दिया है कि वह तब तक सिंगुर संयंत्र में काम दोबारा से शुरू नहीं करेगी जब तक उसे यह आश्वासन नहीं दिया जाता है कि शुरुआत में परियोजना के लिए जो मानदंड तय किए गए थे उन्हें बनाए रखा जाएगा। 

इस मसले को हल करने के लिए जो कानून सम्मत रास्ता निकलकर सामने आया है, वह यह है कि चूंकि जमीन मालिकों से राज्य सरकार पहले ही जमीन खरीद चुकी है और चूंकि इस जमीन पर अब सरकार का अधिकार है इसलिए इसे जमीन मालिकों को नहीं लौटाया जा सकता है। पर एक रास्ता यह है कि जिस जमीन का अधिग्रहण पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास निगम ने किया है उसे लौटाया जा सकता है।

इसके लिए पहले यह पता लगाना जरूरी होगा कि क्या ऐसी कोई जमीन है जिसे लौटाया जा सकता है। जिस 645 एकड़ जमीन पर टाटा मोटर्स ने सीधे सीधे कब्जा किया है, तृणमूल कांग्रेस उसे छोड़ने के लिए तैयार है। पर इससे भी समस्या का हल नहीं निकलता क्योंकि इतने हिस्से से केवल 2,200 किसानों की जमीनें लौटाई जा सकेंगी जबकि कुल 12,700 किसानों ने अपनी जमीन के बदले में मुआवजा लेने से इनकार कर दिया है और इनकी कुल जमीन 300 एकड़ के करीब है।

रविवार को हुए समझौते के मतलब यह निकलता था कि वेंडर्स पार्क की कुल 290 एकड़ जमीन में से आधे हिस्से को अभी वेंडरों के सुपुर्द नहीं किया गया है और इस वजह से इन्हें किसानों को लौटाया जा सकता है। पर बाद में टाटा मोटर्स के बयान से शायद राज्य सरकार पर दबाव बढ़ा और ऐसा लगता है मानो राज्य सरकार ने यह घोषणा की है कि वेंडर्स पार्क में सारी जमीन वेंडरों को सौंपी जा चुकी है।

सच्चाई क्या है यह अभी तक पता नहीं चल सका है। अगर कोई जमीन खाली भी है तो वह विरोध में शामिल किसानों को लौटाने के लिए काफी नहीं होगी। राज्य सरकार के लिए अब एक ही रास्ता बचता है कि वह ऐसे किसानों से कहीं और जमीन खरीदे जो अपनी जमीन देना चाहते हों और उसे विरोध कर रहे किसानों को वापस कर दे।

हालांकि नीतिगत घोषणाओं के अनुसार अगर किसी सार्वजनिक हित की परियोजना के लिए जमीन देने वालों में से 70 फीसदी लोगों को कोई आपत्ति नहीं है तो बाकी 30 फीसदी अपनी जमीन सौंपने को लेकर कोई विरोध नहीं कर सकते। टाटा मोटर्स की मौजूदा परियोजना को भी अदालत ने इसी श्रेणी में रखा है। पर ममता बनर्जी ने इस 70:30 के फार्मूले को ही बहस के लिए सामने रख दिया है।

First Published : September 9, 2008 | 11:52 PM IST