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फर्जी है ‘रेवड़ियों’ पर होने वाली बहस

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 4:06 PM IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय एजेंडे को परिभा​​षित करने की एक क्षमता तो यह है कि उनकी लगभग चलताऊ टिप्प​णियां भी हफ्तों तक चलने वाली बहस का विषय बन सकती हैं और वे किसी विषय पर बनी राष्ट्रीय सर्वसम्मति को भी उलटने का माद्दा रखती हैं। तकरीबन एक माह पहले बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के अवसर पर मोदी ने अपनी पार्टी तथा अन्य दलों के बीच अंतर करते हुए कहा था कि उनकी पार्टी हवाई अड्डे और सड़कें बनाती है जबकि अन्य दल चीजें मुफ्त में देते हैं। तब से ‘रेवड़ी’ संस्कृति को लेकर बहस लगातार तेज होती जा रही है। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय भी इसमें शामिल हो गया और उसने जनहित याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि चुनाव के पहले सार्वजनिक धन से मुफ्त उपहार बांटना मतदाताओं को रिश्वत देने जैसा ही है।
एक स्तर पर मोदी की चिंताएं वाजिब हैं। किसी भी तरह की स​ब्सिडी देने वाली सरकार के पास अधोसंरचना पर व्यय के लिए कम पैसा बचता है। उनकी सरकार ने अधोसंरचना पर काफी व्यय किया है। यहां तक कि महामारी के दौरान भी उसने मांग बढ़ाने पर जोर देना जारी रखा। इसके लिए व्यय बढ़ाया गया और बुनियादी ढांचे पर काम करते हुए जोर दिया गया कि इसके माध्यम से वृद्धि को बरकरार रखा जाए। इस नीति की निर्माता केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद के मॉनसून सत्र के दौरान कहा कि राज्य सरकारों का कर्ज केवल कल्याण योजनाओं के कारण ही नहीं बढ़ रहा है ब​ल्कि यह इसलिए भी बढ़ा है कि उन्होंने सरकारी कंपनियों या विशेष उद्देश्य से बनी कंपनियों की रा​शि का इस्तेमाल भी बजट से इतर उधारी के लिए किया है।
मोदी ने एक बात की ओर बार-बार इशारा किया है और वह यह कि बिजली क्षेत्र को लेकर राज्यों को अ​धिक जवाबदेही का परिचय देना चाहिए। राज्य सरकारों पर बिजली कंपनियों की 2.5 लाख करोड़ रुपये की रा​शि ​बकाया है। यह समस्या बार-बार सर उठाती है और हर बार केंद्र सरकार को वितरण कंपनियों को उबारना होता है ताकि बिजली की आपूर्ति जारी रह सके, वितरण कंपनियों को रा​शि चुकाई जा सके और सरकारी बैंकों को भी बचाये रखा जा सके।
मोदी इस प्रश्न के दोनों पहलुओं से वाकिफ हैं क्योंकि बतौर मुख्यमंत्री उनका सबसे प्रमुख नीतिगत नवाचार था कृ​षि क्षेत्र के लिए अलग बिजली लाइन और दरें। इससे परिवारों और ग्रामीण उपक्रमों को 24 घंटे बिजली मिलने लगी और कृ​षि क्षेत्र को मिलने वाली स​ब्सिडी आधारित बिजली की आपूर्ति सीमित हुई। फिर भी यह दावा करना गलत होगा कि भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक अपील का ‘रेवड़ियों’ या चुनावी लाभ वाली स​ब्सिडी से संबंध नहीं है। अगर भाजपा का मुफ्त उपहारों से लेनादेना नहीं तो उन होर्डिंग्स का क्या जिनमें प्रधानमंत्री एक गैस सिलिंडर के निकट नजर आते हैं और पास ही एलपीजी स​ब्सिडी का एक लाभार्थी नजर आता है।

इससे पता चलता है कि वि​भिन्न टीकाकार जो इस बहस को चालू और पूंजीगत व्यय के बीच करों के बंटवारे की ओर ले जो हैं उनको इस बारे में कुछ पता ही नहीं है कि वे कह क्या रहे हैं। कुछ लोगों ने इसे सीधे-सीधे आम आदमी पार्टी पर हमला माना। नि​श्चित तौर पर आम आदमी पार्टी के लिए ​पंजाब जैसे कर्जग्रस्त राज्य पर शासन करना दिल्ली की तुलना में बहुत मुश्किल होगा क्योंकि दिल्ली अक्सर बजट अ​धिशेष की ​स्थिति में रहता है। प्रधानमंत्री द्वारा राजमार्ग और हवाई अड्डे बनाने की बात यकीनन आम आदमी पार्टी के लिए एक तंज होगी क्योंकि शीला दी​क्षित ने जहां पूरी दिल्ली में सड़कें, फ्लाईओवर और अस्पताल बनाए थे वहीं अरविंद केजरीवाल ऐसा करते हुए नहीं नजर आते।
परंतु आम आदमी पार्टी कई स्थानीय दलों में से एक है तथा प्रधानमंत्री मोदी जन कल्याण के क्षेत्रीय प्रावधान वाले मॉडल को संबो​धित कर रहे थे। यानी मोदी के वक्तव्य और उसके बाद रेवड़ियों को लेकर हो रही बहस को कार्यक्रम चयन और उन्हें वित्तीय सहायता देने को लेकर संघीय संघर्ष की दृ​ष्टि से देखा जाना चाहिए।

कई क्षेत्रीय दलों ने सर्वोच्च न्यायालय को हलफनामा देकर राज्यों के अपनी कल्याण योजनाएं चलाने के अधिकार का बचाव किया है। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस ने कहा कि ​शिक्षा, स्वास्थ्य, कृ​षि और गरीबी उन्मूलन पर होने वाले व्यय के चलते दीर्घाव​धि में अच्छी खासी मानव पूंजी तैयार हो सकती है तथा सामाजिक-आ​​र्थिक महत्त्व की परिसंप​त्तियां भी तैयार हो सकती हैं। 
परंतु भाजपा द्वारा क​थित रेवड़ियों पर यह अचानक हमला न केवल इसलिए अजीब है कि पार्टी खुद भी कल्याणकारी भूमिका पसंद करती है ब​ल्कि ऐसा इसलिए भी है क्योंकि हालिया चुनाव में यह स्पष्ट हुआ कि मतदाता सफल सामाजिक योजनाओं का श्रेय केंद्र सरकार तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देने की प्रवृ​त्ति रखते हैं, भले ही वह राज्य सरकार द्वारा तैयार की गई हो।
इस बात के प्रचुर प्रमाण मौजूद हैं। राजनीति विज्ञानियों के शोध अध्ययन में भी यह तथ्य सामने आ चुका है। प्रश्न यह है कि हो क्या रहा है? इसका उत्तर यह है कि भाजपा का लक्ष्य केवल किसी क्षेत्रीय दल की ताकत को कम करना या कुल मिलाकर क्षेत्रीय दलों को कमजोर करना नहीं है। भाजपा अब संघीय स्तर पर अपनी श​क्ति को एकजुट कर चुकी है और वह न केवल क्षेत्रीय दलों को कमजोर करना चाहती है ब​ल्कि वह राज्य सरकारों के महत्त्व को ही कम करना चाहती है। कर के मामलों में राज्यों की आजादी कम करना, राजस्व में उनका हिस्सा कम करना और व्यय पर उनके नियंत्रण को सीमित करना इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इंदिरा गांधी के दौर की कांग्रेस की तरह मौजूदा भाजपा राज्यों को ​अ​स्थिर करने वाला और बांटने वाला मानती है। मोदी की चलताऊ टिप्प​णियां भी बहुत सलीके से निशाना लगाकर की गई होती हैं।

राज्य स्तरीय कल्याण व्यवस्था पर हमले करना दो वजहों से दिक्कत वाला है। इनमें से एक वजह नीतिगत है तो दूसरी राजनीतिक। नीतिगत स्तर पर देखें तो ऐसा इसलिए है कि राज्य सरकारें नीतिगत नवाचार और सेवा आपूर्ति की दृ​ष्टि से प्रमुख हैं। उनके लिए यह आवश्यक है कि वे प्रयोग करने में सक्षम रहें तथा उनकी जवाबदेही हो। मध्याह्न भोजन से लेकर छात्राओं के लिए साइकल तक सबसे बेहतरीन विचारों को अक्सर अपनाया गया है।
गरीब से गरीब भारतीयों के लिए भी यह अहम है कि ये प्रक्रिया चलती रहे। राजनीतिक कारण भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। देश के क्षेत्रीय दलों के लिए कल्याण योजनाओं की डिजाइन एक अहम अंतर पैदा करती है। ऐसा बना रहे और यही देश के हित में भी है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो क्षेत्रीय दल बहुत बड़े पैमाने पर उपराष्ट्रीय पहचान के सहारे स्वयं को अलग दिखाएंगे। 

First Published : August 31, 2022 | 10:56 PM IST