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सालों तक सुनाई देगी कुछ नामों की गूंज

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 1:41 PM IST

इस बार का विश्वास मत भारत के इतिहास के सबसे बड़े अवसरों में से एक था। जाहिर सी बात है, ऐसे हालात में कुछ बड़े नामों को तो उभरना ही था।


नाम भी ऐसे हैं जिनकी गूंज महीनों ही नहीं, बल्कि सालों तक सुनाई देती रहेगी। आपको तो याद ही होगा कि विश्वास मत के दौरान संसद के इतिहास में पहली बार नोटों की गड्डियां उछाली गईं। इस पर मीडिया के बड़े-बड़े नामों ने काफी रोना रोया।

यह बतौर पत्रकार उनके जीवन और भारतीय लोकतंत्र का सबसे बदनुमा दिन था, यह बताने के लिए उन्होंने कई कोरे कागजों को काला कर डाला। भाई साहब, कौन सी आदर्श दुनिया में रहते हैं ये लोग? अगर अपने मुल्क के आज और कल को भूल भी जाएं, तो भी ये लोग क्या जानते हैं कि दुनिया भर में क्या होता आया है? जरा एक नजर अमेरिका और इटली पर तो डालिए। और वोट खरीदना कब से एक नई बात हो गई?

भ्रष्टाचार को जो चाहें नाम दे दें, वह रहेगा भ्रष्टाचार ही। यह पहले भी था और आगे भी बना रहेगा। समानता, लोकतंत्र, पूरी जानकारी और कारोबारी दुनिया में सबको समान मौके मुहैया कराने पर भले ही हमारा भरोसा मजबूत होता रहे, लेकिन तब भी हम भ्रष्टाचार से पीछा नहीं छुड़ा सकते हैं। कम से कम, मैं तो इस बारे में बाजी नहीं खेल सकता। वैसे, विश्वास मत पर हुई बहस की बात करें तो उसमें सबसे मजबूत तौर पर उभरे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह। उन्होंने विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी को अपना ज्योतिषी बदलने की सलाह दे डाली।

साथ ही, उन्होंने पहली बार अपने तोपखाने का मुंह वामदलों की तरफ खोल डाला। इस तरीके से उन्होंने जता दिया कि उनके गुस्से की इन्तिहा हो चुकी है और अब किसी की धौंस नहीं सहने वाले। उनके भावनात्मक उद्वेग से पूरी संसद सराबोर हो गई। वैसे, इस उद्वेग की वजह भी बड़ी जायज थी। वामदल लंबे समय से उन्हें ब्लैकमेल करते आ रहे थे। ऊपर से, उन पर लगातार हो रहे व्यक्तिगत हमले, जिनकी जरूरत थी नहीं। इससे किसी को फायदा तो हुआ नहीं, लेकिन हां प्रधानमंत्री पद की गरिमा जरूर कम हुई।

दिल से दुखी दिख रहे पीएम ने अपनी नेतृत्व क्षमता पर पूरा भरोसा दिखलाया। लेकिन विश्वास प्रस्ताव जीतकर उन्होंने जता दिया कि बतौर नेता उनकी अनदेखी कर पाना नामुमकिन है। पिछले 61 सालों में भारत दो बार बदला है। पहली बार 1991 में और दूसरी बार 2008 में। दोनों मौकों पर मुल्क को राह दिखाने के लिए डॉ. सिंह वहां मौजूद थे। वो कहते हैं न, हमारा नेता, सबसे अच्छा। इस बहस के दौरान दूसरे बड़े नेता के तौर पर उभरे उमर अब्दुल्ला और मुस्लिम समुदाय। वह भारत के बराक ओबामा हैं।

आज से 12 साल पहले, 1996 में ओबामा ने डेमोक्रेटिक पार्टी की बैठक में बिल क्लिंटन को राष्ट्रपति बनाए जाने के पक्ष में जोरदार भाषण दिया था। इस साल अच्छी-खासी उम्मीद है कि अमेरिकी राष्ट्रपति पद के होने वाले चुनाव में जीत उन्हें ही गले लगाएगी। अब्दुल्ला का भाषण सुनकर यही लग रहा था कि वह सीधे दिल से बोल रहे थे। उनका भाषण जोरदार और भावनाओं से लबरेज था। डॉ. सिंह की तरह ही अब्दुल्ला को भी बोलने नहीं दिया जा रहा था।

विपक्ष और वामदलों ने उनके भाषण के दौरान काफी दिक्कतें पैदा कीं। उनका कहना था कि एक मुस्लिम होने के नाते उन्हें सरकार और परमाणु करार के खिलाफ वोट देना ही होगा। उमर ने उन लोगों को यह याद दिलाई कि वह एक मुस्लिम होने के साथ एक हिंदुस्तानी भी हैं और उन्हें इन दोनों में कोई अंतर नहीं दिखाई देता। उन्होंने साफ कहा कि, जब एक भारतीय इस डील का समर्थन कर सकता है तो एक मुस्लिम, एक हिंदू, एक सिख, एक ईसाई या एक पारसी भी तो इसका साथ दे सकता है। आज से 12 सालों के बाद उमर अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे देख मुझे कोई हैरत नहीं होगी। 

वैसे, इस बहस की वजह से सोमनाथ चटर्जी, राहुल गांधी, ब्रजेश मिश्रा और लालू प्रसाद का नाम भी सालों तक चर्चा में रहेगा। लोकसभा के अध्यक्ष के रूप में सोमनाथ दा की हिम्मत, उनकी नेतृत्व क्षमता और लोकतंत्र पर उनका पक्का भरोसा वाकई काबिले तारीफ है। राहुल गांधी ने कांग्रेस के भीतर मौजूद परमाणु करार के विरोधियों को यह बात अच्छी तरह से समझा दी कि यह डील देश के लिए काफी जरूरी है। ब्रजेश मिश्रा की तारीफ मैं इसलिए कर रहा हूं कि उन्होंने अपनी आत्मा की आवाज की खातिर अपनी पार्टी के व्हिप को भी नजरअंदाज कर दिया।

उन्होंने जो किया, असल में वह भाजपा को करना चाहिए था। जहां तक लालू जी बात है, तो उन्होंने लोगों के दिलों को इसलिए जीत लिया क्योंकि वह लालू यादव हैं। उन्होंने करार का विरोध करने वालों के विरोध को बड़ी आसानी से कुचल डाला। जब बात हारने वालों की होती है, तो ज्यादातर लोगों के दिमाग में एक रोनी तस्वीर उभर आती है। लेकिन विश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस के बाद कई लोगों के पांवों के नीचे जमीन और भी खोखली हो गई है।

खासतौर पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) प्रमुख प्रकाश करात की हालत तो और भी पतली हो गई है। दुनिया भर में कम्युनिस्ट व्यवस्था को नकारा जा चुका है। लेकिन आज भी हमारे मुल्क में नैतिक और नीति के इन ‘नियामकों’ की आंखें नहीं खुली हैं। किसी को हारने वाले शख्स का साथ पसंद नहीं होता, खास तौर पर राजनेताओं को तो कतई नहीं। ऐसे में विश्वास प्रस्ताव में एक बड़े अंतर से हारना तो और भी बुरी बात है। आज माकपा का भविष्य ही खतरे में पड़ चुका है। हालांकि, मनमोहन सरकार से समर्थन वापस लेने के लिए हमें करात साहब का शुक्रिया अदा करना चाहिए। 

इस विश्वास मत के दौरान अपनी मिट्टी अपने ही हाथों पलीद करने वालों में दूसरा बड़ा नाम है विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी का। मेरे यह कहने की एक नहीं, कई वजहें हैं। सबसे बड़ी बात की उन्हीं पार्टी के शासनकाल में वाजपेयी और ब्रजेश मिश्रा ने भारत और अमेरिका के बीच दोस्ती के फूल खिलाये थे। राजग शासनकाल में ही परमाणु करार के बीज पड़े थे। इसकी फसल काटने के बजाय, आडवाणी ने उसे आग के हवाले करने का फैसला कर दिया।

परमाणु करार का श्रेय लेने के बजाय उन्होंने राजनीतिक मौकापरस्ती का जबरदस्त नमूना पेश किया। ऊपर से इसके लिए उन्होंने कोई वजह भी नहीं बताई। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर व्यक्तिगत तरीके से हमला बोला, लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ।

अगर करात की तरह उन्हें भी उनकी पार्टी चुनाव से पहले अपने नेता के तौर पर पेश नहीं करने का फैसला करती है, तो कम से कम मुझे कोई हैरानी नहीं होगी। धूल चाटने वाले इन नामों में एक नाम ‘बहनजी’ यानी मायावती का भी है। पता नहीं कैसे उन्होंने यह सपना देख लिया कि वह मौजूदा सरकार को गिरा देंगी और खुद पीएम की कुर्सी पर काबिज हो जाएंगी। उनकी हार इस बात के पहले सबूतों में है कि उनका जादू अब ढल रहा है।

First Published : July 25, 2008 | 10:28 PM IST