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कार्यबल की शै​क्षिक योग्यता हो रही कमतर

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 4:31 PM IST

भारत का श्रम बल उम्रदराज और कम शिक्षित होता जा रहा है। यह श्रम बल की वह संरचना नहीं है, जो जनसांख्यिकी लाभ की स्थिति से मिलने की उम्मीद थी। उस स्थिति से भारत को युवा आबादी की बड़ी तादाद से जीवन काल में एक बार का लाभ मिलने की उम्मीद थी। यह भारत की आयु-लिंग आबादी पिरामिड में युवा आबादी का उभार था। इस युवा आबादी का ज्यादा शिक्षित होना ज्यादा बेहतर था। रोजगार मिलने पर इस बड़ी युवा आबादी के अधिक वृद्धि और बचत मुहैया कराने की उम्मीद थी। लेकिन यदि इस श्रम बल और नियोजित आबादी की संरचना में उम्रदराज और कम शिक्षित आबादी बढ़ रही है तो जनांकीय लाभ अर्जित करने के आसार कम हो जाते हैं। 
सीएमआईई के उपभोक्ता पिरामिड परिवार सर्वेक्षण (सीपीएचएस) के अनुमानों से पता चलता है कि वर्ष 2016-17 में श्रम बल में 17 फीसदी हिस्सा 15 से 24 साल की आयु का था। वर्ष 2021-22 तक यह अनुपात घटकर 13 फीसदी पर आ गया। यह गिरावट भारत की आबादी की संरचना में युवाओं की तादाद घटने से नहीं आई है। इसके विपरीत कुल आबादी में 15 से 24 तक के आयु समूह का हिस्सा 2016-17 में 26 फीसदी से बढ़कर 2021-22 में 28 फीसदी हो गया है। लेकिन इस आयु वर्ग की श्रम भागीदारी दर में गिरावट आई है। ऐसा इसलिए हुआ है कि युवा विभिन्न कारणों से श्रम बाजार से देरी से जुड़ रहे हैं। 

जाहिर है कि कुल आबादी में महज युवाओं की हिस्सेदारी बढ़ने से जनसांख्यिकी लाभ सुनिश्चित नहीं होता है। उनका रोजगार हासिल करने के लिए श्रम बल में जुड़ने का इच्छुक होना भी जरूरी है। युवाओं की इतनी बड़ी आबादी श्रम बाजार से क्यों नहीं जुड़ी? आंकड़ों से पता चलता है कि काम करने योग्य आयु समूह में होने के बावजूद छात्र बने रहने वाले लोगों का अनुपात बढ़ रहा है। काम करने योग्य उम्र के लोगों की आबादी में छात्रों के अनुपात में बढ़ोतरी काफी अधिक है। गौरतलब है कि हम केवल काम करने योग्य लोगों की आबादी यानी 15 साल या उससे अधिक उम्र की आबादी पर विचार करते हैं, न कि बच्चों पर, जिनके श्रम बाजार में नहीं होने के आसार हैं। 
वर्ष 2016-17 में काम करने योग्य आयु की आबादी में करीब 15 फीसदी ने घोषणा की थी कि वे छात्र हैं। यह अनुपात उससे अगले तीन वर्षों में हर साल एक फीसदी की दर से बढ़कर 2019-20 में 18 फीसदी पर पहुंच गया। उसके बाद 2019-20 में महामारी के साल में यह तीन फीसदी बढ़कर 21 फीसदी पर पहुंच गया और फिर 2021-22 में 2 फीसदी बढ़कर 23 फीसदी पर पहुंच गया। यह काम करने योग्य उम्र की आबादी में छात्रों की तादाद में बड़ा इजाफा है। 

वर्ष 2016-17 से 2021-22 के बीच काम करने योग्य उम्र के लोगों की आबादी 12.1 करोड़ बढ़ी है। इसी अवधि में छात्रों की संख्या 10.4 करोड़ बढ़ी है। इस अवधि में श्रम बल एक करोड़ घटा है। इसका मतलब है कि श्रम बाजार आबादी में वृद्धि की स्वाभाविक प्रक्रिया के जरिये उपलब्ध होने वाले अतिरिक्त श्रम को नहीं खपा सका। इसके बजाय इसने कुछ श्रम को गंवा दिया, जो पहले बाजार का हिस्सा था। 
 

ऐसे में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि लोग इसलिए छात्र नहीं बने रहे क्योंकि वे उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते थे या उन्होंने शिक्षा हासिल करने में लंबा समय लिया बल्कि उन सभी के लिए पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं थे। इस वजह से छात्र प्रच्छन्न बेरोजगारी का बढ़ता उपाय साबित हो रहे हैं। यह अत्यधिक दुखद है। 

श्रम बाजार नए श्रम को नहीं खपा पा रहा है, इसलिए कार्यबल (जो नियोजित हैं) की उम्र बढ़ती जा रही है। वर्ष 2016-17 में भारत में कुल रोजगार का एक चौथाई हिस्सा 30 साल से कम उम्र के लोगों का था। यह घटकर 2019-20 में 21 फीसदी और 2021-22 में 18 फीसदी पर आ गया।
कार्यबल में 20 के दशक वाले लोगों का अनुपात 2016-17 में 25 फीसदी था, जो 2021-22 में घटकर 21 फीसदी पर आ गया। इसके नतीजतन श्रम बल में ज्यादातर लोग अपने 40 और 50 के दशक वाले बचे हैं। वर्ष 2016-17 में श्रम बल में 42 फीसदी लोग अपने 40 और 50 के दशक में थे। यह आंकड़ा 2019-20 तक बढ़कर 51 फीसदी पर पहुंच गया। जब महामारी ने भारत में दस्तक दी थी, तब कार्यबल में आधे से ज्यादा अधेड़ उम्र के लोग थे। वर्ष 2021-22 तक उनका अनुपात बढ़कर 57 फीसदी हो गया। जो देश जनांकीय लाभों की फसल काटने को तैयार था, उसमें उम्रदराज होती
कामकाजी आबादी शायद वह प्रदर्शन नहीं कर पाएगी। इससे भारत को वह तेज वृद्धि दर हासिल करने में भी मदद नहीं मिल सकती, जिसका वह सपना देख रहा है। इससे ही संबंधित एक समस्या यह है कि कार्यबल की शैक्षिक योग्यता कमतर होती जा रही है। स्नातकों और स्नातकोत्तर की हिस्सेदारी 2016-17 में 12.5 फीसदी थी,  2017-18 में बढ़कर 13.4 फीसदी हो गई। उसके बाद यह गिरकर 2018-19 में 13.2 फीसदी और 2019-20 में 11.8 फीसदी पर आ गई। यह आंशिक सुधरकर 12.2 फीसदी पर पहुंची है। नियोजित लोगों में स्नातकों की तादाद में अचानक गिरावट और उसमें पूरा सुधार भी नहीं होना भारत की प्रतिस्पर्धी क्षमता के लिए ठीक नहीं है। 

भारत के कार्यबल में ज्यादातर वे लोग शामिल हैं, जिनकी अधिकतम शैक्षणिक योग्यता माध्यमिक है (जो अपनी 10वीं या 12वीं की परीक्षाएं उत्तीर्ण कर चुके हैं)। कार्यबल में उनकी हिस्सेदारी 2016-17 में 28 फीसदी थी और 2021-22 में उनकी हिस्सेदारी बढ़कर 38 फीसदी पर पहुंच गई। उन लोगों की तादाद में भी इतनी ही बढ़ोतरी हुई है, जिनकी अधिकतम शैक्षणिक योग्यता छठी से नौवीं थी। उनकी हिस्सेदारी 2016-17 में 18 फीसदी से बढ़कर 2021-22 में 29 फीसदी पर पहुंच गई। 
यह अजीब है कि छात्रों की तादाद बढ़ रही है, लेकिन कार्यबल में बेहतर योग्यता वाले लोगों की तादाद नहीं बढ़ रही। 
(लेखक सीएमआईई प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक और सीईओ हैं)

First Published : August 19, 2022 | 10:38 AM IST