दुनिया की आर्थिक मंदी के साये ने फिर से देसी शेयर बाजारों को जकड़ लिया है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की बुरी गत, कच्चे तेल की कीमतों में लगी नई आग और अमेरिकी सब प्राइम संकट की वजह से दुनिया भर के शेयर बाजारों की मिट्टी पलीत हो रही है।
विदेशी संस्थागत निवेशक आज की तारीख में भारत जैसे बाजारों से तेजी से अपना बोरिया बिस्तर बांधने में लगे हुए हैं। तेजी से उभरती भारत की अर्थव्यवस्था में महंगाई भी तेजी से बढ़ रही है। पिछले शुक्रवार को यह 8.24 फीसदी के स्तर पर था। आने वाले हफ्तों में इसमें अभी और उछाल आने की संभावना है।
दरअसल, अर्थव्यवस्था की धीमी पड़ती रफ्तार की वजह से निवेशकों के दिलों में अनिश्चितता का आलम घर कर गया है। साथ ही, मुल्क की व्यापक आर्थिक नीतियों पर आज सवालिया निशान लग गया है। इन वजहों से निवेशकों को लगने लगा है कि भारतीय स्टॉक का मूल्यांकन जरूरत से ऊंचे स्तर पर कर दिया गया है। शेयर बाजार आज की तारीख में मार्च के स्तर पर आ चुके हैं।
साथ ही, ऐसे भविष्यवाणी करने वाले लोगों की भी कमी नहीं है, जिनके मुताबिक शेयर बाजार इससे भी नीचे स्तर पर आ सकता है। मतलब, मंदी का साया पूरी तरह से बाजार के ऊपर मंडरा रहा है। ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के मुताबिक भारतीय बाजार 15 गुना के फॉरवर्ड प्राइस टू अर्निंग रेश्यो के आधार पर कारोबार करते हैं, जबकि ब्राजील और रूस में यह स्तर 13 और 10 गुना का है।
इसका मतलब, भारत के शेयर बाजार लोगों को ऐसे सपने दिखाने की कोशिश कर रही, जिसके सच होने की उम्मीद लोगों को नहीं है। इसलिए यह देखकर भी हैरान होने की जरूरत नहीं है कि भारत का उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच स्थान काफी नीचे आ चुका है। इसी वजह से कभी खरीदारी में जुटे रहने वाले विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) पिछले कुछ हफ्तों से सिर्फ बेचने में जुटे हुए हैं।
उन्होंने 2006 और 2007 में कुल मिलाकर 24.5 अरब डॉलर की खरीदारी की थी। लेकिन अकेले जनवरी, 2008 में उन्होंने 3.1 अरब डॉलर मूल्य के शेयर बेचे। हालांकि, फरवरी और अप्रैल के बीच में उन्होंने 1.48 अरब डॉलर के शेयर खरीदे, लेकिन मई आते-आते हवाओं का रुख बदल चुका था। इस साल मई में उन्होंने 1.16 अरब डॉलर के शेयर बेचे थे।
जून के तो पहले चार ट्रेडिंग सेशन में ही उन्होंने 88 करोड़ डॉलर के शेयर बेच डाले थे। यही वह वजह है जिसकी वजह से सेंसेक्स मई के अंत तक आठ फीसदी तक गिर चुका था, वहीं डॉऊ जोन्स में केवल 1.9 फीसदी की गिरावट आई। इस बदतर होती मंदी की हालत से निपटने के लिए बाजार एक चाल चल रहा है। वह मंदी के इस माहौल में हर अच्छी खबर को नजर अंदाज कर रहा है।
माना कि देश की जीडीपी विकास दर अब भी काफी ऊंची है और प्रत्यक्ष करों से भी अच्छी खासी कमाई हो रही है। हकीकत तो यही है कि कंपनियों का प्रदर्शन खराब ही रहा है। इसलिए कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए, अगर सेंसेक्स 11 महीने के बाद फिर से 15000 प्वाइंट से नीचे आ जाए।