कैबिनेट की ओर से छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को हरी झंडी मिलते ही सरकारी कर्मचारियों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी।
वहीं राज्य सरकारें भी अपने कर्मचारियों को वेतन वृद्धि का तोहफा देने की कवायद में जुट गई हैं। इस बीच यह सवाल भी उठने लगा कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन वृद्धि से निजी क्षेत्र और सरकारी क्षेत्र के वेतन की खाई कितनी पटेगी? यह लाजिमी भी है, क्योंकि सरकारी कर्मचारी अरसे से यह शिकायत करते रहे थे कि निजी क्षेत्र की तुलना में उनका वेतन बेहद कम है और इस असमानता को दूर किया जाना चाहिए।
लिहाजा जब केंद्र ने विभिन्न पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन वृद्धि में औसतन 21 फीसदी बढ़ोतरी की घोषणा की कर्मचारी इस गुणा-भाग में भी लग गए कि बढ़ोतरी के बाद उनके हिस्से आने वाली रकम निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के मुकाबले में कितनी है?
निजी क्षेत्र से बराबरी की तो बात ही छोड़िए. विशेषज्ञों का कहना है कि नए आयोग ने खुद सरकारी कर्मियों के बीच ही गहरी खाई खोद दी है। उनके मुताबिक, उच्च पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों और निचले तबके के कर्मचारियों की वेतन की तुलना करें, तो दोनों के बीच अब खाई और चौड़ी हो गई है।
संशोधित वेतन से सचिव स्तर के कर्मचारियों को जहां 90,000 रुपये मासिक वेतन मिलेगा, वहीं सबसे निचले तबके के कर्मचारियों को 10,000 रुपये मासिक। जानकारों का कहना है कि इससे सरकारी कर्मचारियों के बीच ही वेतन को लेकर काफी असमानता आ जाएगी, जिसके विरोध के स्वर अभी से सुनाई देने लगे हैं।
यही नहीं, यूपी समेत कई अन्य राज्यों में एक ही पद के लिए विभिन्न विभागों में अलग-अलग वेतनमान है, वहीं कई विभाग के कर्मचारियों को अब तक चौथे वेतन आयोग के मुताबिक ही वेतन मिल रहा है।
जहां तक निजी क्षेत्र से वेतन की तुलना की बात है, तो जानकारों का कहना है कि निजी क्षेत्रों में सीईओ और प्रशासनिक स्तर के अधिकारियों का वेतन सरकारी कर्मचारियों के मुकाबले पहले भी ज्यादा था और नए वेतनमान के बाद भी इसमें बहुत ज्यादा अंतर रहेगा।
निजी क्षेत्र में नए अधिकारियों को जहां 1-2 लाख रुपये तक मासिक तनख्वाह मिल जाती है, वहीं सरकारी कर्मचारी लंबे अनुभव के बाद भी इस आंकड़े तक नहीं पहुंच सकते। जहां तक मध्यम दर्जे की बात है, तो सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बीच संशोधित वेतनमान से जरूर समानता आएगी। वहीं निजी क्षेत्र के निचले तबके के कर्मचारियों से सरकारी कर्मचारियों की तुलना की जाए, तो सरकारी कर्मचारी ही बीस बैठेंगे।
दरअसल, निजी क्षेत्र में निचले तबके के कर्मचारियों को औसतन 6 से 10 हजार रुपये तक तनख्वाह मिलती है, वहीं चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों को कम से कम 10,000 रुपये मिलेंगे।
निजी क्षेत्र से सरकारी की जब तुलना की बात आती है तो वेतन के अलावा भी कई और बातों की अहमियत पर गौर करना चाहिए। मसलन, निजी क्षेत्र की बात करें, तो यहां कर्मचारियों को भले ही मोटी तनख्वाह मिलती हो, लेकिन काम का दबाव उन पर सरकारी कर्मचारियों के मुकाबले बहुत ज्यादा होता है।
यही नहीं, निजी क्षेत्रों में प्रदर्शन के आधार पर पदोन्नति और इन्क्रीमेंट की व्यवस्था है, जबकि सरकारी कर्मचारियों के मामले में ऐसी बात नहीं है। उन्हें औसतन समान इन्क्रीमेंट दिया जाता है। छठे वेतन आयोग के तहत सरकारी कर्मचारियों को 2.5 से 3 फीसदी सालाना इन्क्रीमेंट का प्रावधान है, जबकि निजी क्षेत्र में आंकड़ा वर्तमान मंदी के दौर में भी 10 से 20 फीसदी के बीच है।
इसी तरह सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरी में सामाजिक सुरक्षा भी जुड़ी होती है। नौकरी की गारंटी रहती है, छुट्टियां निजी क्षेत्रों के मुकाबले कहीं ज्यादा मिलती हैं, जबकि ज्यादातर निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को असुरक्षा की भावना घेरे रहती है।
हालांकि अब कई कंपनियां कर्मचारियों को पीएफ, मेडिकल आदि की सुविधा दे रही हैं, लेकिन सरकारी कर्मचारियों के मुकाबले अब भी यह कम ही है।
बहरहाल, विशेषज्ञों की राय यही है कि कार्यप्रणाली में सुधार और स्वस्थ प्रतिस्पद्र्धा से वेतन की इस खाई को पाटना बेहतर कदम होगा और इसके लिए सरकार को पहल करना होगी।
फिलहाल विशेषज्ञ इससे सहमत हैं कि लोकप्रियता के लिए उठाया गया यह निर्णय सरकारी-निजी क्षेत्र की खाई को पूरी तरह से नहीं पाट पाएगा। अलबत्ता सरकारी खजाने मंत और सेंध लगना तय है।
सरकारी कर्मी खुश हो न हों लेकिन छठे वेतन आयोग से उद्योग जगत जरूर खुश है, क्योंकि लोगों के पास जब अधिक पैसा आएगा, तो उनकी क्रय-शक्ति बढ़ेगी, जिससे कंपनियों का मुनाफा बढ़ेगा।
यही नहीं, इससे निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन में भी निश्चित रूप से इजाफा होगा, जिससे सरकारी कर्मचारी वेतन के मामले में फिर से खुद को पीछे पाएंगे।
व्यापार गोष्ठी में इस मुद्दे पर बिजनेस स्टैंडर्ड को ढेरों प्रतिक्रिया आर्इं। जिनमें ज्यादातर लोगों ने छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को सराहा, लेकिन यह भी कहा कि इससे निजी-सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन की खाई पूरी तरह से नहीं पाटी जा सकती है।