गुरुवार को जो सरकारी आंकड़े जारी हुए थे, उसके मुताबिक 5 जुलाई को खत्म हुए हफ्ते में महंगाई की दर 11.91 फीसदी थी।
वहीं, उससे पिछले हफ्ते महंगाई की दर 11.89 फीसदी पर थी। दूसरी तरफ, वित्त विश्लेषकों के अनुमान के मुताबिक महंगाई की दर 12.05 फीसदी थी। इसी वजह से तो वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने यह दावा किया कि महंगाई अब स्थिर हो रही है।
हालांकि, यह दावा हकीकत से कुछ ज्यादा ही दूर है। अब भी कई ऐसे मुद्दे हैं, जो महंगाई की दर को आने वाले महीनों में काफी आगे बढा सकते हैं। इसीलिए, अगर सितंबर तक महंगाई की दर 13 फीसदी के स्तर को भी पार कर आगे निकल जाएगी, तो मुझे कोई हैरानी नहीं होगी। इसकी पहली वजह तो ‘बेस इफेक्ट’, जिसकी चर्चा आज कल जोरों पर चल रही है।
जुलाई के बाद उसमें काफी फेर-बदल आएगा, जो महंगाई की दर को काफी ऊंचे स्तर पर ले जाएगी। दरअसल, अपने मुल्क में महंगाई की दर अब भी साल दर साल के हिस्से से मापी जाती है। इसमें वर्तमान हफ्ते की कीमतों को पिछले साल के उसी हफ्ते की कीमतों के स्तर से भाग देकर महंगाई की दर मापी जाती है। मतलब पिछले साल की कीमतें अगर ज्यादा रही होगी, तो इस साल महंगाई दर कम होगी। लेकिन हकीकत में पिछले साल अगस्त और सितंबर में महंगाई काफी कम रही थी, इसलिए इस साल उनके ज्यादा रहने की उम्मीद काफी ज्यादा है।
यह तो हुई आंकड़ों की जुबान। लेकिन कई ऐसे असल वजहें भी हैं, जो महंगाई की आग को और भी तेजी से भड़का सकती है। अब मौसम विभाग के आंकड़ों को ही ले लीजिए, जिसके मुताबिक मानसून ने इस साल गुजरात, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश को प्यासा ही रखा। इससे कपास, तिलहन और दालों की फसल पर काफी असर पड़ने की आशंका है। इन इलाकों के कारोबारियों का तो साफ कहना है कि नाकाफी बारिश का असर दिखाई देने लगा है और इसका असर कीमतों पर तो दिखाई ही देगा।
ध्यान रहे कि पिछले कुछ महीनों में महंगाई के बढ़ने की एक बड़ी वजह तिलहान और खाद्य तेल की कीमतों में तेज इजाफा रहा है। अब अगर इनकी कीमतों में और भी इजाफा हुआ तो महंगाई दर को बढ़ने से कोई नहीं रोक पाएगा। हालांकि, किस्मत से उत्तर और पूर्वी भारत में अच्छी बारिश हुई है। इसलिए चावल की कीमतों के घटने से हो सकता है कि थोड़ी राहत मिले। दूसरी तरफ, स्थानीय स्टील उत्पादकों भी स्टील कीमतों को न बढ़ाने के अपने फैसले के बारे में फिर से सोच रहे हैं।
संभावना है कि वे जल्द ही अपने फैसले को वापस ले लेंगे। दरअसल, पिछले कुछ महीनों में लौह अयस्क जैसे कच्चे माल की कीमतों में खासा इजाफा हुआ है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय बाजार और देसी बाजार में स्टील कीमतों में भी अब अच्छा-खासा अंतर आ चुका है। अगर स्टील उत्पादकों इस अंतर को कम कर अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों की बराबरी करने की इजाजत दे दी जाती है, तो महंगाई की दर पर इसका भी अच्छा-खासा असर होगा।
इसके अलावा, पूरी तरह से ताजा आंकड़े न जुटाना भी एक नई मुसीबत के रूप में हाल के दिनों में सामने आई है। इस वजह से भी महंगाई की दर में तेज इजाफा देखने को मिलता है। अक्सर सरकार के थोक मूल्य सूचकांक में कई चीजों की ताजा कीमत को शामिल नहीं किया जाता है। इस वजह से आंकड़ों का अच्छा-खासा ‘बैकलॉग’ बन जाता है, जिसे एक ही बार में पूरा करने की कोशिश की जाती है। इससे अचानक महंगाई की दर में काफी ज्यादा इजाफा आ जाता है। साथ ही, कीमतों में भी खासा उछाल आ जाता है।
अब मिसाल के तौर लोहे और स्टील की कीमतों को ही ले लीजिए। इनमें पिछले साल की आखिरी तिमाही से इजाफा होना शुरू हो गया था, लेकिन सरकारी थोक मूल्य सूचकांक में इस उछाल को मार्च में ही जगह मिली। इसी वजह से तो आपको मार्च के महीने में महंगाई दर में तेज उछाल देखने को मिलेगा। विलेश्षकों की मानें तो आज की तारीख में थोक मूल्क सूचकांक में सीमेंट, बिजली और उवर्रक की ताजा कीमतें भी नहीं हैं। इस वजह से जब उनकी असल कीमतें सूचकांक में दिखाई देंगी, तब महंगाई की दर में मोटे-ताजे इजाफे के लिए तैयार रहिएगा।
हालांकि, कच्चा तेल अब भी इस पूरे मामले में छुपा रुस्तम है। अगर वैश्विक कीमतों और स्थानीय कीमतों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन दुनिया भर में फैली महंगाई और कच्चे तेल की कीमतों के बीच संबंध को नकार नहीं सकता। अगर कच्चे तेल की कीमतें गिरेंगी, तो दूसरी चीजों की कीमतों में भी कमी आएगी। यह हमें भी महंगाई से राहत देगा। मैं यह कॉलम ऐसे वक्त में लिख रहा हूं, जब कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में 145 डॉलर प्रति बैरल के शिखर से कुछ ही दिनों में गिरकर 130 डॉलर के स्तर पर आ गई हैं।
दिल तो कह रहा है कि इसमें और भी गिरावट की भविष्यवाणी कर दूं। लेकिन पिछले साल इस बारे में मेरी आधी दर्जन भविष्यवाणियां गलत साबित हुई हैं। इसलिए मैं संभलकर कदम उठाना चाहता हूं। नहीं समझे? दरअसल, मैं भी यही सोचता हूं कि तेल की कीमतों को जबरदस्ती बढ़ाया गया है। यह कीमत उस स्तर से काफी ज्यादा है, जहां मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन स्थापित होता है। हकीकत तो यह है कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी मंदी को देखते हुए कच्चे तेल की हेजिंग की जा रही है।
इसलिए कच्चे तेल में लगी यह आग दो रास्तों से ही बुझ सकती है। पहली बात तो यह है कि अगर अमेरिकी वित्त बाजार के ऊपर से संकट के बादल छंट जाएं, तो कच्चे तेल की कीमतों में अच्छी-खासी गिरावट हो सकती है। लेकिन निकट भविष्य में ऐसा होने की उम्मीद कम ही है। फ्रेडी मैक और फैनी मे की नई रिपोर्ट से अमेरिकी मंदी की पुष्टि होती है। उनका साफ कहना है कि आने वाले दिनों में कई बड़े वित्तीय संस्थानों को अपना बोरिया बिस्तर बांधना पड़ सकता है। दूसरा रास्ता कच्चे तेल का हेजिंग के बाजार में घटता प्रभाव है।
ऐसी हालत में बाजार को कच्चे तेल की कीमतों पर फिर से विचार करना होगा। ऐसा असर पिछले हफ्ते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की गिरती कीमतों में नजर आया था। लेकिन यह जारी रहेगा, यह कहना जल्दीबाजी होगा। जैसे ही कुछ बड़े बैंकों का दीवाला निकलेगा और आशंकाओं का बाजार गर्म होगा, कच्चा तेल फिर से 140 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ जाएगा। उथल-पुथल से भरे इस दौर में चौकसी हमेशा काम आती है।
कारोबारी, निवेशक और नीति-निर्धारक का ध्यान कुछेक हफ्तों की महंगाई दर के आंकड़ों से भंग नहीं होना चाहिए। उन्हें हमेशा आगे की सोचनी चाहिए। उन्हें राहत की सांस तभी लेनी चाहिए, जब हालात स्थिर रूप से बेहतर होते नजर आएं। महीने के अंत में मौद्रिक नीति की घोषणा होने वाली है। आज के हालत को देखते हुए तो आने वाले वक्त में रिजर्व बैंक ब्याज दरों में और इजाफे का ऐलान कर सकता है।