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भाडे क़े प्रदर्शनकारियों को बुलाने लगा है उद्योग जगत

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 1:45 AM IST

इस साल अप्रैल के पहले सप्ताह में लोगों का एक समूह नई दिल्ली के विज्ञान और पर्यावरण केंद्र (सीएसई) पर जमा हुआ।


उनके हाथों में मेरे खिलाफ आक्रामक नारे लिखी हुईं तख्तियां थीं। हम इस बात को समझ गए कि यह खतरनाक कीटनाशकों के उद्योग में लगे लोगों के दिमाग की उपज है। मुझे स्पष्ट करने दें।

पिछले कुछ साल से कीटनाशकों के उद्योग में बड़े और ताकतवर उद्यमियों ने काम करना शुरू किया है। उन्होंने देश के कोने-कोने में प्रेस कान्फ्रेंस कर सीएसई के उस शोध का विरोध किया, जिसमें खाने, पंजाब के किसानों के खून और मिट्टी, पानी में कीटनाशकों के घुलमिल जाने और केरल के पाडरे गांव में इसके दुष्प्रभाव से चर्मरोग होने के बारे में बताया गया है।

इस अवधि में हमें इस उद्योग की ओर से मामूली आधार पर दर्जनों कानूनी नोटिस मिले और इस सिलसिले में धमकियां मिलीं। हर बार हमने इन नोटिसों का जवाब दिया, तथ्यों के बारे में जानकारी दी। उसके बाद उन्होंने इस सिलसिले में कुछ नहीं किया लेकिन कुछ अन्य मामूली आधार पर एक और नोटिस भेजा गया जिसमें गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई थी। एक साल पहले हद तो तब हो गई जब उन्होंने मेरे आपत्तिजनक कार्टून फैलाने शुरू कर दिए।

इस दौरान भले ही हमने उनकी धमकियों के आगे नहीं झुकने का फैसला किया था लेकिन साथ ही हमने उनके विरोध के अधिकार का सम्मान भी किया। कुछ दिन बाद एक दैनिक का पत्रकार आया और उसने गेट पर विरोध कर रहे लोगों में से एक को पहचाना। पत्रकार ने बताया कि वह न तो कीटनाशक दवा बनाने वाली कंपनी का कर्मचारी है और न ही विरोध कर रहे एनजीओ से जुड़ा है।

वह आदमी एक जनसंपर्क एजेंसी का कर्मचारी था, जो पत्रकार से बिस्कुट विनिर्माताओं के प्रतिनिधि के  रूप में मिल चुका था। उसकी इच्छा थी कि विद्यालयों में चल रही करोड़ों रुपये की मध्याह्न भोजन योजना में पकाए गए खाने की जगह पर प्रसंस्करित खाद्य पदार्थों की अनुमति दी जाए।

हम हैरान और परेशान थे। निश्चित रूप से भारतीय उद्योग इस बात पर गौरवान्वित है कि वह किराये पर विरोध करने वालों को जुटा सकता है? सम्मानित जनसंपर्क एजेसियां क्यों इस तरह के डराने धमकाने और गंदे तरीके अपनाने का काम कर रही हैं? हम जानते हैं कि इस तरह के काम अमेरिका में होते हैं, जहां कार्पोरेशंस लॉबी बनाने वालों और सफेदपोश बदमाशों को किराये पर लेते हैं। लेकिन क्या अब यह भारत में भी होने लगा है?

जब हमने नामी-गिरामी जनसंपर्क कंपनियों से इस कंपनी के बारे में जानना चाहा तो किसी ने इसका नाम नहीं सुना था। अंत में हमारे कुछ सहयोगियों ने जब इस कंपनी के बारे में छानबीन की तो पता चला कि वह मुंबई के छोटे से इलाके में है। हमने यह भी जाना कि कंपनी ने प्लास्टिक उद्योग और कीटनाशक उद्योग का प्रतिनिधित्व किया जो सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं, साथ ही उन्होंने बिस्कुट विनिर्माताओं के हितों की रक्षा के लिए काम किया।

कंपनी के बॉस ने बड़े गर्व के साथ कहा कि हमारे लोगों ने ही ऑफिस के बाहर प्रदर्शन किया था। इसके साथ ही उसने यह भी कहा कि उस प्रदर्शन से कंपनी का कोई लेना-देना नहीं था। हमने महसूस किया कि उसने ऐसा क्यों कहा। उस प्रदर्शन से उसका दूसरे ढंग से हित जुड़ा हुआ था। 

यह वास्तव में भारतीय उद्योग का नया चेहरा था- जिसमें लॉबीइंग करने वाले लोग बहुत ही कलात्मक ढंग से अपने क्लाइंट के केस ले लेते हैं। वे कंपनियों से पैसा लेते हैं और सशरीर प्रदर्शन करके ताकत दिखाने का काम करते हैं। यह सब कुछ भाड़े पर होता है।

स्पष्ट है कि किसी भी मामले पर असहमत होने पर उद्योग जगत इस तरह के हथकंडे अपनाता है। इससे आम आदमी की राय दब जाती है और जनसंपर्क द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। अगर आप मेरा विश्वास नहीं करते तो इस मामले पर गौर फरमाएं- एक ही समय में कीटनाशक उद्योग ने प्रदर्शनकारियों और वैज्ञानिकों के खिलाफ अनगिनत केस दर्ज कराए, लेकिन इसमें महत्त्वपूर्ण भिन्नता भी रही।

यह मामले बिल्कुल उसी तरह के हैं जैसा कि अमेरिका में एसएलएपीपी (लोक भागीदारी के खिलाफ रणनीतिक कानूनी मामले) के रूप में होता है। यह अलग-अलग होते हैं क्योंकि कार्पोरेशन इसे न्याय के लिए नहीं, बल्कि धमकियां देने और दबाव बनाने के लिए मामले दर्ज कराते हैं। ये मामले संस्थाओं के खिलाफ नहीं दर्ज कराए जाते हैं, जिससे कि उन्हें न्याय मिल सके बल्कि व्यक्तिगत रूप से या उन लोगों के खिलाफ दर्ज कराए जाते हैं, खासकर पेशेवरों के खिलाफ जो उद्योग जगत की सुविधा के मुताबिक उनकी कठपुतली बनने को तैयार नहीं होते हैं।

कुछ साल पहले पेस्टीसाइड एसोसिएशन ऑफ इंडिया, जो अब कॉर्प केयर फाउंडेशन आफ इंडिया के नाम से जाना जाता है, ने पडरे के एकमात्र चिकित्सक वाई. एस. मोहन कुमार के खिलाफ कानूनी नोटिस भेजा, जिसमें उनपर जनहानि का आरोप लगाया गया था। आखिर उनका अपराध क्या था?  उन्होंने गांववालों के बीच अनवरत काम किया और उन लोगों की जान बचाने की कोशिश की, जो कीटनाशकों के जहर से अपना मानसिक संतुलन खो चुके थे या तमाम बीमारियों से लड़ रहे थे।

उन्होंने इस मामले को एक गांव से निकालकर सार्वजनिक किया। पडरे गांव एंडोसल्फान के छिड़काव के बाद से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। वहां के हर घर इसकी चपेट में हैं और न्याय की तलाश में भटक रहे हैं। उद्योग जगत अपने इस शर्मनाक काम का खंडन करता रहा है। इसके बदले वहां के लोगों को धमकियां और गालियां ही मिलती हैं। हाल ही में इसकी शिकार एक सेवानिवृत्त सरकारी वैज्ञानिक हुई हैं, जिनके शोध कार्यों से यह खुलासा हुआ कि कीटनाशकों ने पडरे गांव में जहर घोल दिया है। 

जब वे अहमदाबाद की नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ हेल्थ से जुड़ी थीं और उद्योग तथा उसके एजेंटों ने कुछ भी नहीं किया। बाद में जब वह सेवानिवृत्त हो गईं तो हमले शुरू हो गए। उन्हें दो कानूनी नोटिस दिए गए। इसके अलावा उन्हें कई बार धमकियां दी गईं। हम इस घटना के बारे में जानते हैं और इस पर नजर बनाए हुए हैं। उद्योग जगत ऐसा इसलिए करता है कि उसे इस बात का ‘आश्वासन’ मिल जाए कि भविष्य में दूसरा कोई ऐसा करने का साहस न करे।

जब मैं इसके बारे में लिख रही हूं, मुझे एहसास हो रहा है कि कीटनाशक उद्योग हम पर हमले करने के गंदे तरीके निकालने के अतिरिक्त काम में जुट जाएगा। पिछले सप्ताह उसने फैसला किया कि हमारे घर को लक्ष्य बनाकर प्रदर्शन किया जाए, जिससे मेरी 80 साल की बुजुर्ग मां को पीड़ा पहुंचे। लेकिन हम सभी जानते हैं कि इसका विरोध करने के लिए हमने पत्थरों और डंडों से अपनी हड्डियां तुड़वाने के लिए दांव पर लगा रखी हैं।

First Published : May 26, 2008 | 11:33 PM IST