वर्ष 1980 से लेकर 1997 के बीच मैं पत्रकार था। शौकिया नहीं बल्कि, यही मेरा पेशा हुआ करता था। उसके बाद मैंने इस अखबार के लिए कॉलम लिखना शुरू कर दिया और आज तक लिखता आ रहा हूं।
इसके लिए मुझे हर दिन करीब तीन घंटे समय देना पड़ता है और अपने बाकी समय में मैं अपने हिसाब से कुछ और काम कर लेता हूं। पर चूंकि मेरी शुरुआती पहचान पत्रकार के रूप में ही बनी थी, इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, अगर कोई मुझसे मीडिया के बारे में शिकायत करता है। शायद उन्हें लगता हो कि मैं इस विषय में कुछ कर सकता हूं।
पहले मैं अपने पत्रकार सहकर्मियों का बचाव किया करता था, पर अब ऐसा नहीं करता क्योंकि मुझे लगता है कि शायद पत्रकारों की जिम्मेदारियां काफी होती हैं और कई ऐसे सवाल हैं जिनके लिए वास्तव में उन्हें जवाबदेह होना चाहिए। दो कारणों से मैंने सोचा है कि मुझे इस लेख को मीडिया को समर्पित करना चाहिए। पहली वजह है कि 11 वर्ष पत्रकारिता को समर्पित करने के बाद अब मुझे यह तो समझ ही लेना चाहिए कि मैं अब अपने पूर्व पत्रकार सहकर्मियों का और बचाव करना बंद कर दूं।
साथ ही पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले हैं जिनमें लोगों ने मीडिया के खिलाफ अपना विरोध जताया है। पर जब लोग मीडिया के बारे में शिकायत करते हैं तो यह समझने में काफी समय नहीं लगता है कि दरअसल वे टेलीविजन से नाराज हैं। प्रिंट मीडिया को लेकर आमतौर पर लोगों की कम ही शिकायतें आती हैं। दूसरी बात यह भी है कि मीडिया को लेकर जितनी भी शिकायतें आती हैं वे दरअसल लोगों में किसी बात को लेकर खीझ पैदा करने से जुड़ी होती हैं।
आपको ऐसा कम ही देखने को मिला होगा कि रिपोर्टिंग में हुई किसी गड़बड़ी को लेकर शिकायत की गई हो। इससे स्पष्ट हो जाता है कि आखिर क्यों प्रिंट मीडिया को लेकर कम शिकायत होती है। प्रिंट मीडिया आमतौर पर किसी को परेशान नहीं करता है (परेशानी उन्हीं लोगों को होती है जिनके बारे में गलत तथ्य दिए जाते हैं)। ऐसे लोग जिनके बारे में कुछ गलत लिखा गया होता है वे भी कम ही अखबार के दफ्तरों में पहुंच कर अपनी शिकायत दर्ज करवाते हैं। ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि वे खीझ कर अखबार के दफ्तर में एक फोन घुमा दें।
तीसरे अगर हम वित्तीय अखबारों के बारे में बात करें, जिनके बारे में मैं यह दावा कर सकता हूं कि मुझे उनकी थोड़ी बहुत जानकारी है, वहां चीजों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का रिवाज नहीं के बराबर होता है। हां कई बार नासमझी में कुछ खबरें आ जाती हैं जो कई दफा बेतुकी भी लगती हैं। उदाहरण के लिए जिस दिन आरबीआई ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की, ठीक उसके एक दिन पहले देश में सबसे अधिक सर्कुलेशन वाले अखबार ने कहा था कि आरबीआई ऐसा कोई कदम उठाने पर विचार नहीं कर रही है।
पर जब दूसरे ही दिन ब्याज दरों में बढ़ोतरी की घोषणा की गई तो सबसे अधिक देखे जाने वाले बिजनेस चैनल के रिपोर्टर ने सारा दोष आरबीआई पर ही मढ़ते हुए कहा कि आरबीआई ने बाजार को बरगलाने की कोशिश की। उस रिपोर्टर ने कहा कि एक दिन पहले ही आरबीआई ने कहा था कि वह हालात को और बेहतर और सुचारू बनाने की तैयारी में है। वहीं अभी हाल ही में एक प्रतिष्ठित अखबार ने पहले पन्ने पर यह खबर छापी थी कि भारत ने अप्रैल से जून के बीच जितना डॉलर जमा किया है, हर उस डॉलर की कीमत उसे 169 रुपये पड़ रही है। वास्तविक आंकड़ा तो 43 रुपये से भी कम है।
चौथी बात यह है कि जिस हिसाब से देश में पब्लिकेशन की संख्या बढ़ती जा रही है, उससे सभी अखबारों या पत्रिकाओं में स्तंभकारों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। इन स्तंभकारों के लिए अखबारों में जगह सुनिश्चित होती है और इसका नतीजा यह है कि जिन लोगों को विषय की थोड़ी बहुत या न के बराबर भी जानकारी होती है, उसे भी प्रकांड पंडित के तौर पर देखा जाने लगता है। उनकी जो मर्जी आता है वे वही लिखते हैं। पांचवी बात यह है कि भले ही इसके सीमित उदाहरण हों पर कुछ मौकों पर ऐसा देखने को मिला है कि संपादकीय की गुणवत्ता में गिरावट देखी जा रही है।
कई ऐसे अखबार हैं जहां इन्हें पहले काफी गंभीरता के साथ लिया जाता था, पर अब ज्यादातर अखबारों में खानापूर्ति ही समझा जाता है। पहले कम से कम संपादकीय पृष्ठ समाज के कुछ तबकों या फिर आम लोगों के हित से जुड़े मुद्दों को उठाता रहता था, पर अब तो कई अखबार इसमें अपने संपादक की ही आवाज को बुलंद करने में लगे रहते हैं। इसके दो उदाहरण गौर करने लायक हैं। दक्षिण के एक प्रमुख अखबार ने परमाणु समझौते के बारे में लिखा था कि भारत अब चीन के खिलाफ अमेरिका की लड़ाई में अमेरिका का कवच बनने का काम करेगा।
वहीं दूसरा उदाहरण दिल्ली से निकलने वाले भाजपा के एक अखबार का है जिसमें लिखा गया था कि नेपाल से राजतंत्र का सफाया हिंदुओं के लिए एक बड़ा झटका है। यहां इस बात पर भी ध्यान देना जरूरी नहीं समझा गया कि दरअसल जिन लोगों ने राजतंत्र के सफाये के लिए वोट डाले थे वे खुद भी हिंदू ही थे। अब बुद्धिजीवियों से संपादकीय लिखवाने की परंपरा भी दम तोड़ने लगी है क्योंकि विवेकपूर्ण और चतुर लोगों से संपादकीय लिखवाने के लिए अधिक पैसे खर्च करने पड़ते हैं और इससे बेहतर तो अखबार वाले कम रकम लेने वाले लेखकों से ही अपने पन्ने भरवाना ठीक समझते हैं।
छठा, जिस हिसाब से टीवी चैनल इन दिनों काम कर रहे हैं, अपने आप में चर्चा का विषय है। उनका सिद्धांत मानो अब इतना भर रह गया है कि खबर की भनक पड़ी नहीं कि उसे टीवी पर चला दो। ऐसे में स्वाभाविक है कि टीवी चैनलों को कामगारों की जरूरत पड़ेगी। उन्हें तो बस कामगारों से ही सरोकार होता है, ये पेशेवर हों जरूरी नहीं। कहने का मतलब है कि इनमें से कितने होंगे जिन्हें खबरों की थोड़ी बहुत भी समझ होगी। किसी खबर के प्रसारण के दौरान एंकर ने कोई भी बेतुका सा सवाल पूछ दिया और ये रिपोर्टर न सिर्फ खबर बताने लगते हैं बल्कि बाकायदा उस पर अपनी राय भी देने लगते हैं।
पर मैंने पहले भी कहा था कि टीवी चैनलों पर ऐसी खबरें बस खीझ पैदा करती हैं। वास्तव में अगर कोई दुख देता है तो वह है प्रिंट मीडिया। मैं चाहूं तो इस बारे में अपनी राय देता चला जाऊं, पर मैं जो समझाना चाहता हूं शायद कुछ हद तक वह साफ हुआ होगा। अब जो लोग मीडिया पर उंगली उठाते हैं उनके पास पहले की तुलना में अधिक ठोस वजहें होती हैं। मीडिया के लिए जरूरी है कि वह अपनी खामियों को दूर करे और खुद में सुधार लाए, खासतौर पर टेलीविजन। अगर इसी तरीके से चैनलों की होड़ अधिक से अधिक टीआरपी बटोरने की रहेगी तो वे दर्शकों को खुद से दूर ही करते नजर आएंगे। ऐसे भी पहले जितनी गंभीरता के साथ लोग समाचार सुना करते थे, अब वैसा नहीं है।