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कांटों भरी है व्यापार से विकास की राह

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 4:05 PM IST

कई विश्लेषकों की मानें तो दोहा दौर को बहुस्तरीय व्यापार वार्ता का नाकामयाब होना, एक बहुत बड़ा झटका है।


उनके मुताबिक एक साथ जुड़ने के कई फायदे होते हैं, भले ही वह फायदे किसी एक मुल्क को ज्यादा मिलें और दूसरे मुल्क को कम। हालांकि, कई विश्लेषक ऐसे भी हैं, जिनके मुताबिक दोहा दौर की बैठक का यही अंजाम होना था। उनके मुताबिक यह उतनी दूर तक पहुंच चुका था, जहां तक काबू रख पाना उसके लिए नामुमकिन हो चुका था।

अंतरराष्ट्रीय कारोबार के नए-नए क्षेत्रों पर काबू करने की इसकी ख्वाहिश अलग-अलग मुल्कों के बीच विवादों को पार नहीं कर सकी। इन देशों को इसकी यह कोशिश अपने उस सार्वभौमिक अधिकार का हनन लगा, जिसके मुताबिक उन्हें अपने हितों की रक्षा करने का अधिकार है।

लोगों को सात साल पुरानी इस वार्ता का बेनतीजा अंत भला लग सकता है या बुरा। लेकिन यह बात एक बुनियादी सवाल को तो उठाती ही है। इस वार्ता के केंद्र में विकास ही था, तो क्या इसका अंत एक ऐसी दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती को लेकर आया है जिसमें मुक्त कारोबार और अलग-अलग मुल्कों का एक साथ रहना ही तेज और समान आर्थिक विकास का रास्ता है?

कम से कम वैश्विक कारोबारी व्यवस्था के विकास और उत्पादों व सेवाओं, पूंजी और बौध्दिक संपदा के लिए बनाए गए अलग-अलग नियमों को देखकर तो यह लगता है। जब तक कोई सामूहिक संस्था अपने सदस्यों के अलग-अलग होने की बात का सम्मान नहीं करती, वह बरकरार नहीं रह सकती है। किसी व्यापारिक व्यवस्था की यही तो जान होती है।

गैट और इसके उत्तराधिकारी डब्लूटीओ में इस बात का ध्यान रखते हुए अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग नियम-कायदे बनाए। ऐसा इसलिए ताकि उन देशों को सहूलियतें हों, जो बाहर के सस्ते उत्पादकों से अपने मुल्क के उत्पादकों को बचाने की कवायद में जुटे हैं।

असल में इस तरह के नियम कायदों के होने का मकसद यही होता है कि अलग-अलग बर्ताव किया जाए। बाद में वक्त के मुताबिक इस बर्ताव को बदल भी दिया जाता है क्योंकि दुनिया के साथ जुड़ने से उन मुल्कों को भी तो काफी फायदा होता है। वहां के उत्पादक भी तो सस्ते उत्पाद बनाने लगते हैं।

जब तक उन मुल्कों को अलग-अलग बर्ताव के नियमों में बदलाव से कोई नुकसान नहीं दिखता, वे उसका विरोध भी नहीं करती हैं। यहां यह बात काफी अहम है कि डर का जो भाव वह बीते दिनों के अनुभव को देखते हुए ही आता है। अगर बीते दिनों में आए बदलाव काफी फायदेमंद साबित होते हैं, तो बदलावों को आसानी से स्वीकारा जा सकता है।

हालांकि, अनिश्चितता में ऐसी साहासिक छलांग मारना बिल्कुल ही अलग बात है, जहां कई खिलाड़ियों को अपनी सुरक्षा को दांव पर लगाना होता है। अब इस बात को समझने के लिए इसे भारतीय परिप्रेक्ष्य की नजर से देखते हैं। इस बात में कोई शक नहीं है कि दोहा दौर की बैठक 2001 में शुरू होने के बाद से दुनिया के बाजार में भारतीय अर्थव्यवस्था की अहमियत में भारी इजाफा हुआ है।

इस वजह से तो दुनिया के बाजार में हिंदुस्तान की मोल-भाव करने की ताकत में भी काफी इजाफा हुआ है। हालांकि, हमारे साथ सबसे बड़ी दिक्कत हमारे उन कामगारों की भारी तादाद है, जो आज भी कमाई के लिए खेती पर निर्भर हैं। हालांकि, जीडीपी में खेती के हिस्से में काफी गिरावट आई है, फिर भी हम इस तादाद में कमी नहीं कर सके हैं।

आज जीडीपी का करीब 17 फीसदी हिस्से ही खेती से आता है, लेकिन इस सेक्टर में कम से कम हमारे 57 फीसदी काम करते हैं। वैसे मुल्क के अलग-अलग हिस्से में खेती में उत्पादन और प्रतिद्वंद्विता में भारी अंतर है, लेकिन इसके आस-पास चल रही राजनीति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

ऐसे हालात में नई दिल्ली की कृषि आयात से सेफगार्डों की मांग मुक्त व्यापार के फायदों के खिलाफ हो सकती है। इसका मतलब यह हुआ कि अपने मुल्क के अंदर और बाहर अलग-अलग समूहों को दोहा दौर की बैठक से जो फायदा होने वाला था. वह अब नहीं होगा।  लेकिन विकास की इस अवधारणा में कमाई की एक न्यूनतम गारंटी भी होती तो हिंदुस्तान की स्थिति को विकास विरोधी नहीं समझा जाता।

हालांकि. यह अलग बात है कि ऐसी हालत में भारत की स्थिति एक ऐसे असफल राष्ट्र की हो जाती, जो लाख कोशिशों के बावजूद भी लोगों को खेतों से खींचकर उद्योग और सेवा क्षेत्र तक खिंचने नहीं पाया। यह कहना कठिन है कि इस बड़ी विफलता का प्रभाव सराहनीय विकास गाथा की असफलता है, लेकिन यह भारत के कृषि व्यापार पर अपनाए जा रहे रुख को स्पष्ट करता है।

समझौता-वार्ता में केवल इस बात को जगह मिलती है कि वर्तमान में क्या है, इस बात के लिए कोई जगह नहीं होती कि भविष्य में क्या होने जा रहा है। लेकिन यह केवल भारत से जुड़ा हुआ मसला नहीं है। कमोवेश एशिया, लैटिन अमेरिका और खासकर अफ्रीका की स्थिति भी ऐसी ही है। घरेलू नीतियां इस बात को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं कि विभिन्न आय वर्ग की ग्रामीण जनसंख्या का संरक्षण किया जा सके।

यह पूरी तरह से देशज होता है, जिसमें एक समझौते के तहत आने वाले खतरों को देखते हुए बलिदान भी शामिल होता है।  सरल शब्दों में कहें तो एक समझौते के लिए यह जरूरी है कि इससे प्रभावित होने वाले देशों के लिए यथार्थवादी उम्मीदें हों, उन देशों के कामगारों की स्थिति में संरचनात्मक परिवर्तन की जरूरत है।

भारत इस प्रक्रिया में अभी अंतिम पायदान पर है, इसलिए उसे इस पहलू का ध्यान रखना पड़ेगा कि आपसी लेन-देन में खाद्य पदार्थों के बड़े निर्यातकों का उस पर क्या प्रभाव पड़ता है। बहरहाल,  जहां तक वैश्विक व्यापार और एकीकरण का सवाल है, यह दुनिया की आखिरी बातचीत नहीं है।

भारत और अन्य देशों की अर्थव्यवस्था में भी जो तेजी से बढ़ रहे हैं उन्हें उभरते बाजार और सस्ते इनपुट के चलते बेहतर उत्पाद देने वाले के रूप में देखा जा रहा है, जो बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। तमाम तरह के चक्र उभरकर सामने आए हैं, जिसमें लाभ का तत्व महत्वपूर्ण होता है और ऐसा महसूस किया जाता है कि इसमें शामिल होने वाली अर्थव्यवस्थाएं तेजी से बढ़ेंगी।

इसलिए क्षेत्रीय समझौतों के प्रसार को इसी परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। यह जानी-समझी बात है कि वैश्विक समझौतों से किसी का भला नहीं होता। वजह है, मुल्कों के बीच भारी अंतर। इस वजह से अनिश्चितता आती है, जो फायदों का गला घोंट देती है। दूसरी तरफ, कुछेक मुल्कों के बीच किए समझौतों से अनिश्चितता खत्म होती है क्योंकि वे सभी एक तरह के वातावरण में काम करते हैं और उनके बीच तारतम्य भी होता है।

वैसे हो सकती है कि यह बात कुछ लोगों को बुरी लगे, लेकिन क्षेत्रीय समझौते ही वैश्विक समझौतों के लिए सफलता की कुंजी है। इसलिए दोहा दौर की वार्ता की नाकामयाबी व्यापार के जरिये विकास की राह में कतई रोड़ा नहीं बन सकती। यह केवल इतना बताती है कि यह राह हर जगह नहीं बनाई जा सकती है।

First Published : August 11, 2008 | 1:01 AM IST