छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा जिले के बारे में तो आप सभी जानते ही होंगे। नक्सली समस्या से जूझ रहे इस जिले में एक गांव है नेंद्रा।
दांतेवाड़ा के कलेक्टर ने इस गांव के उन किसानों को 10 किलो धान के बीज मुफ्त में देने का ऐलान किया है, जो यहां फिर से खेती करना चाहते हैं। नेंद्रा, दांतेवाडा के कोटा ब्लॉक का एक गांव है, जो पिछले तीन सालों से सुनसान पड़ा है।
वजह है, यहां सलवा जुडूम और पुलिस के लगातार होते हमले। आप सोच रहे होंगे कि ऐसे में कलेक्टर ने यह घोषणा क्यों की? दरअसल, इसके पीछे है वनवासी चेतना आश्रम नाम की एक संस्था, जो इस गांव के लोगों को वापस लाने के लिए काम कर रही है। इस गांव के लोग सलवा जुडूम और पुलिस के आंतक की वजह से या तो जंगलों में छुप गए या फिर आंध्र प्रदेश के सीमावर्ती गांवों में विस्थापित हो गए हैं। कुछ लोग राज्य सरकार के कैंपों में जैसे-तैसे जिंदगी गुजार रहे हैं।
इस संस्था ने लोगों को वापस लाने की कोशिश इस महीने शुरू की। इसके 11 सदस्य अपने घर लौट रहे आदिवासियों के इर्द-गिर्द एक मानव ढाल बनाकर जंगल से गांव तक पूरे रास्ते चलते रहे और गांव में भी उनके साथ रहे। लेकिन उन्हें पुलिस से न के बराबर ही सहयोग मिला। उल्टे पुलिस ने तो आदिवासियों पर गोलीबारी भी की। पहली बार तो जब गोलीबारी की घटना हुई तो गांव वाले बुरी तरह से डर गए और वापस जंगलों की तरफ भाग गए।
पिछले हफ्ते पुलिस ने आंध्र प्रदेश में स्थित बाजार से अपने गांव लौट रहे 16 साल के दो किशोरों, मकदम भीम और वेट्टी पूजा को पकड़कर दांतेवाड़ा जेल में डाल दिया। पिछले हफ्ते पुलिस ने फिर से गांव में गोलीबारी की। लेकिन इस बार गांव वाले भागे नहीं और पुलिस उन लोगों को बिना कोई नुकसान पहुंचाए वापस लौट गई। हिमांशु कुमार, वनवासी चेतना आश्रम को पिछले 16 सालों से बस्तर इलाके में चला रहे हैं। उनका कहना है , ‘अब तो कई सारे खाली पड़े गांवों के बाशिंदे हमारे मानव ढाल की मांग कर रहे हैं।
25 सुनसान पड़े गांवों के लोग-बाग आजकल नेंद्रा में एक बैठक कर रहे हैं, जिसमें वह अपने गांवों के लिए भी मानव ढाल मांग रहे हैं। वैसे, नेंद्रा के लिए हमारी मानव ढाल के कार्यकर्ता अपने साथ 15 क्विंटल धान और 100 परिवारों के लिए खूब सारे कपड़े लेकर गए थे। वे नेंद्रा में आजकल लोगों को खेती फिर से शुरू करने में मदद कर रहे हैं।’ उनके इस काम में कलेक्टर की घोषणा एक बड़ी मदद के रूप में सामने आई। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि छत्तीसगढ़ की सरकार नक्सलियों से लड़ने के लिए नागरिकों को हथियारों से लैस करके एक असंवैधानिक और गैरकानूनी काम कर रही है।
योजना आयोग ने भी अपनी एक रिपोर्ट में यही बात दोहराई। आयोग का कहना है कि, ‘सलवा जुडूम सरकार की एक बहुत बड़ी भूल थी। एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक समाज में ऐसे आंदोलन के लिए जगह नहीं होनी चाहिए।’ योजना आयोग की रिपोर्ट को पिछले हफ्ते गृह मंत्रालय के टास्क फोर्स के सामने पेश किया गया। लेकिन नीति निर्धारक को यह बात कौन समझाए कि लोगों का सबसे पहला अधिकार अपने घरों में रहने का होता है और उन्हें अपने ही मुल्क में शरणार्थियों की तरह जिंदगी बिताने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
इस बीच यह मानव ढाल का कार्यक्रम अब दूसरे गांव की तरफ रुख करने की तैयारी कर रहा है। इस कार्यक्रम की अगली मंजिल है बिजापुर जिले के बैरमगढ़ ब्लॉक का वेछापाड गांव। वैसे, हिमांशु कुमार का कहना है कि, ‘पुलिस हमें अभी इंतजार करने के लिए कह रही है क्योंकि उस इलाके में नक्सलियों के खिलाफ पुलिस ने बहुत बड़ा अभियान छेड़ रखा है।’ वैसे इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि सलवा जुडूम कैंपों को अलविदा कह वापस आ रहे लोगों को नक्सली और जंगलों में रह रहे लोग-बाग इतनी जल्दी माफ कर देंगे।
आखिर, सलवा जुडूम के सिर पर जो जुल्मों का बोझ है, उसे लोग इतनी जल्दी थोड़े ही भूल जाएंगे। वैसे, हिमांशु कुमार की राय इस मामले में थोड़ी अलग है। उनका कहना है कि, ‘मैंने सलवा जुडूम कैंपों के बाहर जिंदगी गुजार रहे लोगों से बात की है। उनका कहना है कि उन्हें तो कोई खतरा महसूस नहीं होता है। साथ ही, हमने नक्सलियों से भी बात की है। उन्होंने भी वादा किया है कि वे सलवा जुडूम को अलविदा कहकर अपने घर आने की इच्छा रखने वाले लोगों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे।’
एक ऐसे वक्त में जब सरकार को सलवा जुडूम के बारे में गंभीरता से सोच विचार कर रही है और नक्सल समस्या से निपटने का कोई रास्ता उसे नहीं दिख रहा, तो नागरिकों से सारे संपर्क के रास्ते बंद कर देना उसके लिए काफी खतरनाक साबित हो सकता है। इसकी जगह उसके नए रास्तों की तलाश करनी चाहिए। ऐसे रास्ते, जिन तक पहुंचने की पगडंडी हिंमाशु कुमार और बिनायक सेन जैसे कार्यकर्ताओं ने बनाई है।
लेकिन इससे पहले उसे अपनी उस सोच बदलने की जरूरत है, जो इन सामाजिक कार्यकर्ताओं को षडयंत्रकारी समझती है। उसे समझने की जरूरत है कि जेल और पुलिस अपराधियों के लिए होती है, न कि सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए।