Categories: लेख

रस्ता है कठिन, चलना जरा संभल के

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 5:02 PM IST

हम बात आजादी की करते हैं। सवाल उठता है कि आखिर इस आजादी के मायने क्या हैं? कुछ लोगों के लिए आजादी पतंग की तरह उन्मुक्त होकर आसमान में उड़ जाने की चाहत का नाम हो सकता है।


तो कुछ के लिए हर तरह के भय से मुक्ति का नाम आजादी है। दीगर बात है कि आतंकी हमलों की आशंका और संगीनों के साए के बीच मनाए जाने वाले 15 अगस्त के दिन हम सबसे ज्यादा डरे हुए होते हैं। खैर, देश के औसत आदमी की बात करें तो उसके लिए आज भी आजादी का अर्थ है रोटी, कपड़ा और मकान की चिंताओं से छुटकारा।

तत्कालीन वित्त मंत्री आर के षणमुखम चेट्टी द्वारा 26 नवंबर, 1947 को पेश किए गए आजाद भारत के पहले आम बजट में आम आदमी की इन चिंताओं को आसानी से देखा जा सकता है। चेट्टी ने अपने बजट भाषण के दौरान कहा कि ‘भारत गंभीर खाद्यान्न संकट से गुजर रहा है। बीते तीन वर्षो के दौरान हमने 127 करोड़ रुपये के खाद्यान्न का आयात किया है।’

उल्लेखनीय है कि इस समय भारत की राजस्व प्राप्तियां 230.52 करोड़ रुपये थीं। उस दौरान दुनिया भर में खाद्यान्न का उत्पादन 7 प्रतिशत की कमी आई थी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें काफी अधिक थीं। आजादी के बाद सरकार ने कृषि उत्पादन को बढ़ाने पर खास जोर दिया। हरित क्रांति के बाद के वर्षो के दौरान भारत खाद्यान्न का एक बड़ा निर्यातक देश बनकर उभरा।

अब जरा वित्त मंत्री पी चिदंबरम द्वारा 29 जुलाई, 2008 के दिए बजट भाषण पर गौर कीजिए। वित्त मंत्री ने कहा कि ‘अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं और चावल की कीमतें क्रमश: 88 प्रतिशत और 15 प्रतिशत बढ़ गई हैं। ये रुझान महंगाई को बढ़ाने वाले हैं और घरेलू कीमतों विशेष कर खाद्य पदार्थो पर कीमतों का दबाव है। खाद्य पदार्थो के आपूर्ति पक्ष का प्रबंधन करना इस साल सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण होगा।’

खाद्यान्न के क्षेत्र में देश अपनी आत्मनिर्भरता खो रहा है। देश 1947 में विभाजन की त्रासदी झेल रहा था। चेट्टी के बजट भाषण में शुरुआत से अंत तक विभाजन और उससे पैदा होने वाली चुनौतियों का जिक्र छाया रहा। उन्होंने कहा कि ‘देश की आर्थिक और सांस्कृतिक एकता खंडित हो गई है।

इसका तात्कालिक राजनीतिक असर चाहे जो भी हो लेकिन दीर्घकाल में विभाजन के आर्थिक असर इस बात पर निर्भर करेंगे कि दोनों पक्ष आम आदमी के भले के लिए किस तरह का सहयोग कायम कर पाते हैं।’ यहां भी ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ वाला हाल है और आजादी के जश्न के बीच कश्मीर आज भी जल रहा है। आजादी से अब तक देश ने लंबा सफर तय किया है।

वित्त वर्ष 1948-49 के दौरान जहां सरकार की राजस्व प्राप्तियां मजह 230.52 करोड़ रुपये थी वहीं 2008-09 के दौरान इसके 602,935 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। इस दौरान राजस्व व्यय 257.37 करोड़ रुपये के मुकाबले बढ़कर 6,58,118 करोड़ रुपये हो गया है। आयकर संग्रह 1947 के 130 करोड़ रुपये के मुकाबले बढ़कर 138,314 करोड़ रुपये हो गया है। उल्लेखनीय है कि इस साल पहली बार कर प्राप्तियों में प्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी अप्रत्यक्ष करों के मुकाबले अधिक हो गई है।

First Published : August 15, 2008 | 3:52 AM IST