पर्यावरण परिवर्तन पर बने संयुक्त राष्ट्र के पैनल और अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर को वर्ष 2007 का नोबल शांति पुरस्कार देकर क्या नोबल पुरस्कार समिति ने कोई गलती की थी?
मेरा ऐतराज इस बात पर नहीं है कि इस पुरस्कार ने पर्यावरण परिवर्तन जैसे विषय को अहमियत दी और उसे दुनिया भर में बहस का अहम मुद्दा बनाया। मेरी आपत्ति यह है कि नोबल पुरस्कार के जरिये वैसे लोगों और संस्थाओं को चैंपियन साबित किया गया जो संकीर्ण मानसिकता वाले हैं, फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं और पर्यावरण परिवर्तन के मसले पर किताबी ज्ञान और जानकारियों से बाहर निकल ही नहीं पाते।
हालांकि ऐसा किए जाने में कुछ गलत नहीं है। पर अब सही वक्त आ गया है जब दुनिया विकास की अवधारणा को नए सिरे से परिभाषित करे। आर्थिक रूप से ताकतवर और संपन्न देशों द्वारा पैदा की गई समस्याओं का खामियाजा गरीब देशों की जनता को भुगतना पड़ रहा है, जो एक बड़ा सवाल है। इसका जवाब भी तलाशे जाने की सख्त जरूरत है।
मुझे लगता है कि परिवर्तन लाना आसान नहीं होगा। इसके लिए समाज द्वारा काफी सख्त कदम उठाए जाने की दरकार है। मैं अपने शहर यानी दिल्ली को लेकर ही अपने तजुर्बे का जिक्र यहां करना चाहती हूं। दिल्ली में 15 किलोमीटर दूरी के लिए बस रैपिड ट्रांजिट (बीआरटी) की शुरुआत की गई है और जिसे लेकर काफी हंगामा खड़ा हो गया है।
हर कोई इस बात से सहमत है कि जन परिवहन (पब्लिक ट्रांसपोर्ट) बेहद महत्वपूर्ण है। इस बात पर भी कोई विरोधाभास नहीं है कि एक न एक दिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट की हालत अच्छी होगी। पर कोई भी यह कहने का तैयार नहीं है कि चीजें यदि इतनी ही आसान हैं तो विकसित देशों के शहरों में आज तक परिवहन के व्यापक साधनों (बसों, लाइट या मेट्रो रेल आदि) को कायदे से लागू कर धुआं उगलने वाली कारों की बढ़ती संख्या को कम किए जाने की दिशा में काम क्यों नहीं किया गया?
सच्चाई यह है कि धनी ‘विकसित’ देशों में परिवहन तंत्र और निजी वाहनों द्वारा किए जाने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगातार इजाफा दर्ज किया जा रहा है। जरा दिल्ली की बात करें, जहां हमें यह सीख मिल रही है कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट दूसरों को दिया जाने वाला उपदेश है, जिसे खुद पर लागू किए जाने की कोई जरूरत नहीं। राज्य सरकार ने काफी विचार-विमर्श के बाद दिल्ली में पहले बीआरटी कॉरिडोर के निर्माण का फैसला पिछले साल लिया।
बीआरटी सिस्टम के तहत बसों के लिए एक सेंट्रल लेन बनाई जाती है, ताकि बसें बिना किसी बाधा के उस खास लेन में दौड़ें। इसके बाद सड़क का बाकी हिस्सा कारों (कारों के लिए दो या तीन लेन छोड़ी जाती है), बाइक्स और पैदल यात्रियों के लिए छोड़ दिया जाता है। दिल्ली में बीआरटी की शुरुआत के खिलाफ मीडिया में मुहिम छेड़ दी गई। यहां तक कि यदि आप किसी पढ़ेलिखे शख्स से भी बात करें, तो वह आपको बताएगा कि बीआरटी सिस्टम को लागू किया जाना महज एक पागलपन है।
ऐसे लोग यह तर्क देते नजर आते हैं कि बसों को सड़क के बीचोंबीच दौड़ाए जाने का फैसला अजीब है। इतना ही नहीं, तर्क यह भी दिया जा रहा है कि बीआरटी की वजह से सड़क पर कारों को दौड़ने के लिए दी जाने वाली जगह में कटौती कर दी गई है और यह पूरी तरह गलत है। सचाई यह है कि कारों के लिए जगह में कोई कटौती नहीं की गई है।
सड़क का इस्तेमाल करने वाले लोगों के हिसाब से जगह का समान बंटवारा किया गया है। इस धनी शहर (दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे ज्यादा है) में रोजमर्रा आवाजाही करने वाले 60 फीसदी से ज्यादा लोग बसों की सेवा लेते हैं। कारों और दोपहिया के जरिये बमुश्किल 20 फीसदी लोग रोजाना आवाजाही करते हैं।
यह भी साफ है कि राजधानी में कारों की संख्या काफी तेजी से बढ़ रही है और इससे सड़क पर जगह की कमी महसूस होने लगी है, बावजूद इसके लिए नई सड़कें और फ्लाइओवर बन रहे हैं। इस बात में भी हैरत नहीं है कि यह शहर तेजी से ट्रैफिक कंजेशन और वायु प्रदूषण की गिरफ्त में आता जा रहा है।
इस बात को भी स्वीकार किया जाना जरूरी है कि दिल्ली (जहां बीआटी सेवा शुरू की गई है) में दूसरे शहरों के उलट कारों की मौजूदा संख्या ही सड़कों पर भारी साबित हो रही है। जैसे-जैसे कारों की संख्या बढ़ रही है, सड़कों पर जगह की जबर्दस्त किल्लत पैदा हो रही है और पूरे तनाव की जड़ में यही बात है। जररूत इस बात की है कि सड़क पर जगहों पर बंटवारा नए सिरे से किया जाए, पर समस्या का समाधान इतना आसान भी नहीं है।
दिल्ली में अंडरग्राउंड मेट्रो का निर्माण हो रहा है, पर काफी खर्चीला होने की वजह से इसका विस्तार शहर की गली-गली और मुहल्ले-मुहल्ले तक किया जाना संभव जान नहीं पड़ता। ऐसे में बस सेवा (जो सस्ती और तेज दोनों है) को बेहतर बनाया जाना सबसे ठोस समाधान नजर आता है। इस पूरे मामले में जंग जारी है। हालांकि अपने सहयोगियों, विपक्ष और मीडिया की ओर से बनाए जा रहे दबावों के बावजूद मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने बीआरटी प्रोजेक्ट को जारी रहने देने का साहस दिखाया है।
पर हैरानी की बात यह है कि जन परिवहन की पैरोकारी करने वाले लोग बीआरटी को लागू किए जाने के पक्ष में सामने आने से बच रहे हैं। जाहिर है इससे नाव के बीच नदी में ही डूब जाने का खतरा पैदा हो गया है और परिवर्तन की राह काफी मुश्किल भरी हो गई है। दुनिया का नजरिया भी कुछ इसी तरह का है, जहां बड़े सवालों के छोटे जवाब ढूंढे जा रहे हैं। मिसाल के तौर पर बायो-फ्यूल के इस्तेमाल को ही लिया जा सकता है।
यह कहा जा रहा है कि बायो-फ्यूल का इस्तेमाल बढ़ने से प्रदूषण पर रोक लगेगी। पर इस बात पर कोई भी नहीं सोच रहा कि जिस हिसाब से गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है, उससे क्या सही मायने में प्रदूषण कम होगा। इसी तरह हाइब्रिड कारों की बात की जा रही है। मैं न तो बायो-फ्यूल और न ही हाइब्रिड कारों के खिलाफ हूं। मेरा कहना बस इतना है कि ये सभी कदम बड़े बदलाव का महज छोटा हिस्सा भर हैं।
लिहाजा ऐसे चैंपियंश की शिद्दत से तलाश की जानी चाहिए, जो नए आयामों को आगे बढ़ा सकें। उम्मीद है कि नोबल प्राइज समिति अगली दफा पुरस्कार दिए जाने का फैसला करते वक्त सिर्फ बुध्दिमत्ता को ही पैमाना नहीं बनाएगी, बल्कि यह भी देखेगी कि साहसी कौन है।