आज से कोई 15 साल पहले डॉ. मनमोहन सिंह ने ही इंस्पेक्टर राज से मुल्क के उद्योग धंधों को निजात दिलाने की शुरुआत की थी।
आज कोई भी इस पहल का हिन्दुस्तानी कारोबारी जगत पर पड़े असर को देख सकता है। आज भारतीय कंपनियों के झंडे दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों के ऊपर लहरा रहे हैं। ऊपर से, गुणवत्ता के मामले में भी हम उन्हें कांटे की टक्कर दे रहे हैं।
ऐसे में यह कहना कि संगठित रिटेल कंपनियों के आने से किराना दुकानों की सेहत पर ज्यादा असर नहीं होगा, कितना सही होगा। कम से कम आईसीआरआईईआर (इक्रियर) का तो यही कहना है। यहां राज करने वाले इंस्पेक्टरों पर लगाम कसने की कोशिश कभी नहीं की गई।
साथ ही साथ, उन्हें कर्ज तक आसान पहुंच भी नहीं दी गई। एक ताजा सर्वे के मुताबिक 1.4 करोड़ रिटेल स्टोरों में से केवल सात लाख दुकानें ही सरकारी वित्तीय संस्थानों या बैंकों से कर्ज ले पाती हैं। इसी वजह से तो 10 दिन पहले एक बी-स्कूल में इक्रियर की संगठित रिटेल पर जारी की गई इस रिपोर्ट पर विश्वास करने में काफी लोगों को मुश्किल हो रही है।
वामपंथी दल और किराना दुकान मालिकों के मुताबिक चूंकि इस सर्वे में सैम्पल ही गलत लिए गए हैं, इसलिए ये भरोसे के लायक नहीं है। हालांकि, हकीकत में दिक्कत कहीं और है। असल में इक्रियर के मुताबिक पहले साल में संगठित रिटेल के आने से आस-पास के किराना दुकानों की कमाई पर भारी असर पड़ेगा। इसके मुताबिक पहले साल में रिटेल चेन के आने से आस-पड़ोस के दुकानदारों की कमाई और मुनाफा 23 फीसदी तक गिर जाएगा।
हालांकि, इक्रियर ने इसे बड़ा खतरा नहीं बताया है। उसके अनुसार यह घाटा केवल तात्कालिक है। संस्था का कहना है कि दूसरे साल में यह घाटा कम होकर 6 से 7 फीसदी रह जाएगा। वहीं, तीसरे साल में घाटा 7 से 10 का रह जाएगा और पांचवें साल के आते-आते उनकी कमाई पर केवल 0.3 फीसदी का असर पड़ेगा। लेकिन इक्रियर ने एक ही किराना स्टोर या उसके बहीखाताओं का पांच सालों तक लगातार सालाना अध्ययन नहीं किया।
इसने तो बस कुछेक खास रिटेल कंपनियों के डेटा लिए, जो एक खास इलाके में साल भर से या दो साल से या ज्यादा से ज्यादा तीन सालों से काम कर रहे हैं। इसने फिर इन अलग-अलग डेटा के सहारे एक टाइम लाइन बना डाली। अलग-अलग डेटा के सहारे एक टाइमलाइन बनाने की कोशिश को कभी सही नहीं माना गया है। अगर आप ऐसा करते हैं, तो नतीजे भयानक होते हैं।
चलिए रिपोर्ट की बात को मान भी लेते हैं, तो पहले साल में उस किराना दुकान की बिक्री में 22.8 फीसदी की गिरावट होगी। दूसरे साल में 7.5 फीसदी की और आगे भी इस तरह से घाटा कम होता जाएगा। इसका मतलब यह है कि पांचवें साल तक, जब चीजें काफी हद स्थिर भी हो जाएंगी, तो पहले साल में 100 रुपये कमाने वाले किराना दुकानदार की आमदनी घट कर 52 रुपये रह जाएगी। इस झटके को किसी भी तरह से हल्का नहीं कहा जा सकता है।
यह तो तब की बात है, जब इस सीधे-सीधे तरीके से जोड़ा जाए। अगर इसमें महंगाई का भी तड़का मिला दें तो हवा इतनी गर्म हो जाएगी कि सांस भी लेना मुश्किल हो जाए। दूसरी तरफ, संस्था की यह बात भी गले नहीं उतर रही है कि छठे साल तक घाटा घट कर केवल 0.3 फीसदी का रह जाएगा, जबकि पहले साल का घाटा 22.8 फीसदी के जबरदस्त स्तर पर होगा।
ऊपर से यह भी नहीं बताया गया है कि कैसे दूसरे साल में घाटा कम होकर 7.5 फीसदी के स्तर पर आ जाएगा। इस हालत का सच होना काफी मुश्किल है। यह तभी मुमकिन है, जब किराना दुकानों की आमदनी में पहले साल तेज गिरावट के बावजूद दूसरे साल से जबरदस्त रफ्तार आ जाए। इक्रियर ने अपनी रिपोर्ट में इस बारे में कुछ नहीं कहा है और न अब कह रही है।
इसलिए तो वामदलों के प्रतिनिधि इस संस्था से पूछ रहे हैं कि, जब उसके मुताबिक इसका किराना दुकानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा, तो क्यों उसने अपनी सबसे पहली सिफारिशों में सरकार को को-ऑपरेटिव सोसाइटी बनाने में किराना दुकानदारों की मदद करने को कहा है? क्यों उसने कहा है कि सरकार को इन को-ऑपरेटिव भारी तादाद में चीजों को खरीदने में और इनके बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में मदद करनी चाहिए? क्यों उसने कहा है कि देश के दूर-दराज इलाकों में फैली इन दुकानों में सफाई मुहैया करवाने में हर मुमकिन मदद करनी चाहिए?
इस ‘कम और हल्के’ असर की एक वजह यह भी हो सकती है कि मुल्क के संगठित रिटेल ने अब भी एक साथ मिलकर काम करना नहीं सीखा है। आपने कितने संगठित रिटेल चेनों के बारे में सुना है, जिन्होंने आम लोगों के पैसे को किराना दुकानों से भी 15 से 20 फीसदी ज्यादा बचाने में मदद की है। मेरी एक सहयोगी, शोभना सुब्रमण्यन ने कुछ ही दिनों पहले अपने एक लेख में बताया था कि देश के सबसे बड़े रिटेलर पेंटालून की प्रति वर्ग फुट कमाई दिनोंदिन कम होती जा रही है।
2006-07 की पहली तिमाही में इसकी प्रति वर्ग फुट कमाई 2,080 रुपये थी, जबकि 2007-08 की दूसरी तिमाही में यह घटकर 1,859 रुपये हो गई। इसलिए जबतक ये रिटेल चेन संगठित नहीं होते, तब तक यह सोचना सही होगा कि किराना दुकानदारों को उनसे कोई बड़ा खतरा नहीं है। जिस दिन रिटेल चेन संगठित हो गए, उसी दिन किराना दुकानों के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा।
हालांकि, इस बीच किराना दुकानदार भी हाथ मिलने में जुटे हुए हैं। इक्रियर की रिपोर्ट के मुताबिक रिटेल चेन ‘सुभिक्षा’ की प्रति वर्ग फुट कमाई पेंटालून के मुकाबले दोगुनी है। सुभिक्षा स्टोर दिखने में थोड़े बड़े किराना स्टोरों जैसे ही लगते हैं, लेकिन यहां आप थोक में भी खरीदारी कर सकते हैं। यह बस किराना स्टोरों से केवल एक कदम आगे भर है। लेकिन संगठित रिटेल का प्रसार आम लोगों, उपभोक्ताओं और किसानों की नजरिये से देखें तो काफी जरूरी है।
इक्रियर ने ज्यादा माथापच्ची करने में वक्त नहीं दिया, लेकिन अगर संगठित रिटेल कंपनियों आम लोगों के खर्चे को 15-20 फीसदी भी कम कर दें तो हम 60-80 अरब डॉलर बचा पाएंगे। यानी हमारे मुल्क की आज की कुल बचत का पूरा 20वां हिस्सा। इस रकम से मुल्क को काफी फायदा तो मिलेगा ही, साथ ही ब्याज दरों में भी काफी कमी आ पाएगी जिससे हम और तेज विकास कर पाएंगे।
अंत में सवाल यह बचता है कि कैसे इन रिटेल चेन की वजह से बेरोजगार हुए लोगों को नौकरी मुहैया करवाई जाए? इससे काफी बेरोजगारी होनी तो तय है। असंगठित रिटेल सेक्टर में कम से कम 3.7 करोड़ लोग बाग काम कर रहे हैं। वहीं इक्रियर के मुताबिक रिटेल सेक्टर के 16 फीसदी हिस्से पर संगठित रिटेल का कब्जा होगा, लेकिन इससे केवल 17 लाख लोग जुड़े होंगे।
इसका मतलब है कि अभी मुल्क को और आर्थिक सुधारों की जरूरत पड़ेगी, ताकि उद्योग-धंधे वतन के किसी भी इलाके में आ जा सकें। इससे उन्हें मशीनों से ज्यादा इंसानों की जरूरत पड़ेगी, जिससे इस सेक्टर से बेरोजगार हुए लोगों को रोजगार मिल पाएगा। जब तक ऐसा नहीं होता है, संगठित रिटेल को राजनीतिक हमलों का सामना करना पड़ेगा।