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गन्ना कारोबार में विवादों की लहलहाती फसल

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 06, 2022 | 11:44 PM IST

गन्ने की फसल कट रही है और उसकी पेराई का मौसम चल रहा है। पर शायद कम लोगों ने गौर किया होगा कि न्यायालयों में गन्ने से संबंधित मुकदमों की ‘फसल’ बारहों महीने लहलहाती रहती है।


ये मुकदमे गन्ने के केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित ‘वैधानिक न्यूनतम मूल्य’, राज्य सरकारों द्वारा तय ‘राज्य सलाहकार मूल्य’, बाजार मूल्य, खरीद कर और दूसरे तरह के शुल्कों से संबंधित होते हैं। पिछले कुछ हफ्तों में इस तरह के मुकदमों की ‘बंपर पैदावार’ सुप्रीम कोर्ट में भी देखने को मिली है। सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न पीठों ने हाल में इन मुकदमों से संबंधित कम से कम 5 महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। फिलहाल गन्ने की कीमतों से संबंधित कम से 25 अपीलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट को करनी है।


दरअसल, गन्ना उत्पादक राज्यों में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा तय की जाने वाली कीमतों पर हर साल  बवाल मचता है। इस बारे में कोर्ट के कई फैसले भी आ चुके हैं। पर इन फैसलों से न तो चीनी मिल, न गन्ना उत्पादक और न ही राज्य सरकारें पूरी तरह संतुष्ट हो पाती हैं। इस बारे में केन कमिश्नर भी अपने आदेश जारी करते हैं, जो अक्सर राजनीति से सराबोर होते हैं। श्रम से संबंधित मुद्दे भी अक्सर सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंचते हैं।


कर्नाटक राज्य बनाम श्री चमुंडरेश्वरी शुगर मिल के मामले का फैसला देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इसी महीने अपने पिछले उन दो फैसलों की मदद ली, जो गन्ने की कीमतों और उत्पादकों को दी जाने वाली सब्सिडी से संबंधित थे। इस मामले में राज्य सरकार ने अपील जीत ली और कोर्ट ने आदेश दिया कि राज्य सरकार को हासिल होने वाले ‘राज्य सलाहकार मूल्य’ पर राज्य सरकार को ‘खरीद कर’ वसूलने का अधिकार है।


कोर्ट ने यह आदेश भी दिया कि राज्य सरकार, केंद्र सरकार और बाजार इन तीनों द्वारा तय कीमतों में से जो कीमत सबसे ज्यादा हो, उसे ही मानक कीमत मानते हुए उसी पर खरीद कर लगाया जाना चाहिए। महालक्ष्मी शुगर मिल लिमिटेड बनाम केंद्र सरकार के मामले का फैसला करीब 2 दशकों से भी ज्यादा वक्त के बाद आया है।


इस मामले में मुद्दा यह था कि केंद्र द्वारा आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत लेवी शुगर (चीन मिलों को अपने कुल उत्पादन का एक खास हिस्सा सरकार को बेचना पड़ता है, चीनी की इस खास मात्रा को लेवी शुगर कहते हैं ) की कीमतें निर्धारित किए जाने के वक्त किन बातों का ख्याल रखा जाना चाहिए। यह विवाद 1983-84 से संबंधित था, लिहाजा कोर्ट ने इस मामले में कहा – ‘इस मामले के दोनों पक्ष यह लड़ाई 22 वर्षों से भी ज्यादा वक्त से कर रहे हैं।


लिहाजा उन्हें खाली हाथ नहीं जाने दिया जाना चाहिए।’ कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह उन चीनी मिलों के लिए लेवी शुगर की कीमतों का निर्धारण नए सिरे से करे, जो इन वर्षों में लगातार केंद्र सरकार की उम्मीदों पर खरे उतरते रहे हैं। उत्तराखंड किसान सहकारी चीनी मिल्स बनाम वर्ध्द्रन लिंकर्स के मामले से संबंधित अपील के दौरान चीनी कारोबार से जुड़े काले पहलुओं का खुलासा हुआ।


इस मामले में एक ट्रांसपोटर्र को राज्य के चीनी मिलों से अवशिष्ट पदार्थों (मिल में गन्ने की पेराई के बाद बचने वाले अवयव) को उठाकर दूसरे राज्यों तक ले जाने की इजाजत दी गई, जो इन अवशिष्ट पदार्थों की कीमत ट्रांसपोर्टर की खरीद कीमत की दोगुनी थी। इस मामले में कोर्ट ने अपने आदेश में कहा – ‘इस पूरे मामले में सुनवाई के दौरान चीजें जिस तरह सामने आई हैं, उससे साबित होता है कि वर्ध्दन लिंकर्स की उधम सिंह नगर के जिलाधिकारी व असिस्टेंट केन कमिश्नर से सांठगांठ थी।


इसी सांठगांठ के तहत महत्वपूर्ण अवशिष्ट पदार्थों की बड़ी मात्रा को औनी-पौनी कीमतों पर बेचा गया। बेचे जाने के वक्त बातचीत की प्रक्रिया को सही तरीके से अंजाम नहीं दिया गया। यहां तक कि अवशिष्ट पदार्थ बिक्री समिति की इजाजत के बगैर ही इस पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया गया। अवशिष्ट पदार्थ की बिक्री ऐसे पार्टी को की गई, जो इसके लिए कानूनी तौर पर योग्य नहीं था।’


इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को बहाल रहने दिया, जिसमें वर्ध्दन लिंकर्स को दी गई अवशिष्ट पदार्थ उठाए जाने संबंधी इजाजत को रद्द किया गया था। इसी तरह, यूपीसीयूईएफ लिमिटेड बनाम केन कमिश्नर का एक मामला है। इस मामले में उत्तर प्रदेश केन कमिश्नर ने गन्ने की पेराई के मौसम की अवधि में बिना किसी से सलाह-मशविरा किए तब्दीली कर दी थी। इस बारे में कर्मचारियों को इत्तला भी नहीं किया गया।


पहले से गन्ना पेराई का मौसम अक्टूबर से जुलाई के बीच तय था, जिसमें तब्दीली की गई थी। कर्मचारियों ने इस फैसले पर ऐतराज जताया और कहा कि उनसे पूछे बगैर की गई इस तब्दीली से उनकी रोजगार की अवधि और वेतन पर बुरा असर पड़ेगा। हालांकि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस तब्दीली को सही करार दिया, पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इस तब्दीली को गैरकानूनी करार दिया।


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूपी औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत इस मामले में कर्मचारियों की सलाह ली जानी चाहिए थी, पर ऐसा नहीं किया गया। लिहाजा इस तरह की तब्दीली मान्य नहीं है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के पास आई अपीलें कई तरह की हैं। इनमें केंद्र और यूपी सरकार द्वारा गन्ने की तय की गई कीमत से संबंधित मामले हैं।


कई अपीलों में सरकार, चीनी मिलों और गन्ना उत्पादकों द्वारा हाई कोर्ट के फैसलों को चुनौती दी गई है। दरअसल, सरकार ने अब तक गन्ने की देशव्यापी कीमतें तय किए जाने की कोई पहल नहीं की है। जब तक ऐसा नहीं होता, विवादों की फसल लहलहाती रहेगी।

First Published : May 15, 2008 | 11:20 PM IST