अब सैन्य टकराव बढ़ने की आशंका और अधिक हो गई है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं। ऐसे में भारत को भावी झटकों से निपटने की तैयारी करने का सुझाव दे रहे हैं टीटी राम मोहन
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों कहते हैं, ‘हम युद्धरत हैं।’ वहीं जर्मन चांसलर ओलाफ शुल्ज के स्वर कुछ संयत सुनाई पड़ते हैं। शुल्ज कहते हैं, ‘हम एक बेहद गंभीर दौर में हैं…..किंतु हम तैयार हैं।’ संदर्भ यूक्रेन युद्ध ही है। वहां छिड़ी अपेक्षाकृत कम तीव्रता वाली जंग को छह महीने से अधिक हो गए हैं, लेकिन अब आर्थिक और सैन्य दोनों मोर्चों पर टकराव में तेजी आने की आशंका कहीं अधिक बढ़ गई है। यह विश्व अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक है। ऐसे में भारतीय नीति-निर्माताओं को कड़ी चुनौती के लिए तैयार रहने की आवश्यकता है।
रूस ने नॉर्ड स्ट्रीम-1 गैस पाइपलाइन बंद कर दी है। यह पाइपलाइन यूरोप को गैस की आपूर्ति करती है। गत वर्ष यूरोप में आयातित रूसी गैस का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा इसी पाइपलाइन के जरिये पहुंचा। इसे बंद करने के पीछे रूस ने कहा है कि पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण उसके लिए पाइपलाइन का प्रभावी रखरखाव कर पाना मुश्किल हो गया है। वहीं नार्ड-2 के जरिये इस वर्ष के आरंभ से यूरोप को गैस आपूर्ति शुरू की जानी थी, लेकिन उस पर भी अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों का अंकुश लगा है, जिससे उसका उपयोग दंडनीय अपराध हो गया है।
रूस ने नॉर्ड स्ट्रीम-1 पाइपलाइन के बंद करने का फैसला जी-7 देशों के सम्मेलन में रूसी तेल के मूल्यों पर नियंत्रण सीमा लगाने को लेकर बनी सहमति के तुरंत बाद लिया था। जी-7 देशों की यही मंशा थी कि रूस से तेल खरीदने वाले सभी देशों पर वे यह मूल्य सीमा लागू करेंगे। ऐसे में बड़ा सवाल यही था कि गैर जी-7 देशों पर मूल्य सीमा को कैसे लागू करें? इसके लिए यही विचार था कि जी-7 द्वारा तय मूल्य सीमा से ऊपर ढुलाई करने वाले तेल कार्गो को वित्त एवं बीमा की सुविधा न दी जाए।
यूरोपीय संघ तो रूस से आयातित गैस की भी मूल्य सीमा निर्धारण करने पर विचार कर रहा है। पश्चिम की दलील है कि गैस की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के कारण उसके पास बहुत कम विकल्प हैं। दूसरी ओर, इस महीने की शुरुआत में पूर्वी यूरोपीय आर्थिक मंच पर व्लादीमिर पुतिन ने गैस की आसमान छूती कीमतों के लिए पश्चिम को ही दोषी ठहराया था। पुतिन ने कहा कि रूस यूरोपीय संघ और अन्य खरीदारों को काफी लंबे समय से दीर्घावधिक अनुबंध करने के लिए समझा रहा था-एक वक्त रूस 100 डॉलर में 1,000 घन मीटर गैस आपूर्ति के लिए मोलभाव कर रहा था।
इस साल यूक्रेन में युद्ध छिड़ने के बाद उसने अपने यहां से गुजरने वाली दो पाइपलाइनें बंद कर दीं। पोलैंड ने भी अपने यहां से गुजरने वाली पाइपलाइन पर प्रतिबंध लगा दिया। इस वजह और अन्यान्य कारणों से 1,000 घन मीटर गैस के दाम 3,000 डॉलर तक चढ़ गए हैं। अब यूरोपीय संघ को इसके जवाब में रूसी गैस पर मूल्य नियंत्रण का विकल्प ही सूझ रहा है। इस पर पुतिन ने चेतावनी दी है कि मूल्य सीमा अनुबंधित बाध्यताओं का उल्लंघन करेगी और यदि ऐसा होता है तो रूस तेल, गैस, कोयला और ईंधन तेल जैसे सभी ऊर्जा संसाधनों की आपूर्ति रोकने से हिचकेगा नहीं।
मानो आर्थिक युद्ध में ऐसी तेजी ही हालात खराब करने के लिए काफी नहीं थी कि अब जमीनी स्तर पर सैन्य स्थिति में भी बदलाव हो रहा है। कुछ दिन पहले तक यही आम धारणा बन रही थी कि युद्ध में ऐसा ही छिटपुट संघर्ष चलता रहेगा। मगर उत्तर में खारकीव क्षेत्र और दक्षिण में यूक्रेन के जबरदस्त पलटवार ने इस नजरिये को बदल दिया है। पुनः प्राप्त हुए क्षेत्रों को लेकर यूक्रेनियों के दावों को जले पर नमक छिड़कने की तरह देखा जाए।
हालांकि कीव में सरकार पश्चिम से हथियारों के प्रवाह को लेकर अतिरंजना व्यक्त करती रही है। फिर भी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि उत्तर में रूसी सेना को झटका लगा है। इससे रूस में राष्ट्रवादी आक्रोश फूट पड़ा है और मीडिया के एक हिस्से से बड़ी तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं। रूस ने यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में मिसाइलें दागकर जवाबी हमला किया, जिसके कारण कई हिस्सों में बिजली गुल हो गई।
रूस ने ‘विशेष सैन्य अभियान’ का नाम देकर यह मुहिम छेड़ी थी, जिसमें यही मंशा प्रकट की गई कि इसके जरिये यूक्रेन के उन दो पूर्वी प्रांतों में लोगों की रक्षा करना है, जिन्होंने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की थी। हालांकि यूक्रेन को बढ़ते पश्चिमी सैन्य सहयोग और जमीनी स्तर पर लगे झटकों के बाद रूस को अपनी रणनीति में व्यापक रूप से बदलाव करना होगा। पुतिन पर यही दबाव है कि वह यूक्रेन पर पूरी ताकत से हमला कर उसे पटखनी दें। वार्ता के माध्यम से शांति की संभावनाएं अब बहुत कमजोर पड़ गई हैं।
यह घटनाक्रम वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को बदरंग कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने वैश्विक आर्थिक वृद्धि को पिछले वर्ष के 6.1 प्रतिशत से घटाकर 2022 के लिए 3.2 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया है और 2023 के लिए यह 2.9 फीसदी है। यह आधारभूत परिदृश्य है। आईएमएफ का एक वैकल्पिक परिदृश्य भी है, जो रूसी तेल निर्यात में 30 प्रतिशत की गिरावट और रूसी गैस निर्यात के गिरकर शून्य पर आने और मुद्रास्फीतिक अनुमान कहीं ज्यादा चढ़ने की स्थिति पर केंद्रित है। ऐसे परिदृश्य में 2022 के लिए वैश्विक वृद्धि 2.6 प्रतिशत और 2023 में दो प्रतिशत ही रह जाएगी।
इस झटके की सबसे अधिक तपिश यूरोपीय संघ को झेलनी होगी, जहां वृद्धि करीब शून्य रहेगी। ऐसे दौर में बदला दृष्टिकोण विकसित देशों में मौद्रिक नीति के मोर्चे पर अनिश्चितताएं बढ़ाएगा, जहां नीतिगत दरों कों बढ़ाना या न बढ़ाने का निर्णय बड़ा मुश्किल हो जाएगा। इसमें संभवतः अमेरिका एक अपवाद रहे।
वैश्विक वृद्धि को लेकर बढ़ती अनिश्चितताओं को लेकर भारत की प्रतिक्रिया कैसी होनी चाहिए? पहला तो यही कि आज के उथल-पुथल भरे परिवेश में निर्यात के सहारे वृद्धि की नैया पार लगाने की उम्मीद बेमानी-अव्यावहारिक होगी। ऐसे में बहु स्तरीय रणनीति पर काम करना होगा। एक तो हरसंभव तरीके से निर्यात बढ़ाने की संभावनाएं तलाशी जाएं और साथ ही संतुलित संरक्षण एवं सब्सिडी के जरिये स्वदेशी उत्पादन को प्रोत्साहन मिले।
दूसरा यही कि विनिमय दरों में अति-अवमूल्यन से बचा जाए, खासकर यह उम्मीद न रखी जाए कि उनमें कमी से लगे झटके की पूर्ति निर्यात में बढ़ोतरी से हो जाएगी।वर्तमान जैसे संकट में डॉलर निवेशकों के लिए सबसे माकूल विकल्प होता है। जुलाई और अगस्त में शुद्ध विदेशी संस्थागत निवेशक प्रवाह सकारात्मक हुआ है।
डॉलर के मुकाबले रुपये में भारी गिरावट इस रुझान को पलट सकती है। ऐसे में रुपये की सेहत को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक को नजर बनाए रखकर उसका प्रभावी प्रबंधन जारी रखना होगा। इस समय जैसा कि कई लोग बड़े सुधारों की पैरवी कर रहे हैं, उसमें बुद्धिमानी नहीं होगी। बदरंग वैश्विक परिदृश्य में हमें देश में और राजनीतिक बखेड़ा खड़ा करने की आवश्यकता नहीं। इसके बजाय हमें आगे के मुश्किल दौर के लिए तैयारी पर ध्यान केंद्रित करना होगा।