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परदेस में भी शान से लहराता तिरंगा

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 7:40 PM IST

जब दुनिया वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर हुए आतंकी हमले से सहमी हुई थी, अमेरिका के नामी गिरामी बिजनेस स्कूल, केलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के भारतीय डीन दीपक सी जैन को अपने संस्थान के छात्रों के भविष्य की चिंता सता रही थी।


जैन अमेरिका के नामी गिरामी बिजनेस स्कूल में प्रमुख बनने वाले पहले भारतीय हैं। उस समय जैन अपने संस्थान के पूर्व छात्रों को पत्र लिखने में तल्लीन थे ताकि पूर्व छात्र, ग्रेजुएशन कर रहे छात्रों को नौकरी दिलाने में मदद कर सकें।

जैन कहते हैं, ‘मुझे लगने लगा कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के बदलने से छात्रों को नौकरी दिलाना खासा मुश्किल हो सकता है। हमारे संस्थान के कई छात्र छोटी और मझोली आकार की कंपनियों में महत्वपूर्ण पदों पर काम कर रह थे ऐसे में मुझे लगा कि वे मददगार साबित हो सकते हैं।’ हालांकि इस कदम से उनकी काफी आलोचना भी हुई। कहा गया कि उन्होंने डीन की गरिमा को चोट पहुंचाई है।

दरअसल केलॉग का प्लेसमेंट रिकॉर्ड शानदार रहा है। तकरीबन 91 फीसदी प्लेसमेंट के साथ यह अमेरिका के बिजनेस स्कूलों में सबसे चोटी पर था। लेकिन वह साल मुश्किलों भरा था इसलिए जैन की चिंता भी जायज ही थी।

अब जरा जैन के जीवन पर कुछ नजर डालते हैं। असम के तेजपुर जिले में उनका जन्म हुआ और वहीं पर वह पले बढ़े। उनको पहले से ही स्थिति के हिसाब से काम करने की आदत पड़ी हुई थी। जैन कहते हैं, ‘मेरे रास्ते में भी बहुत बाधाएं आईं लेकिन मैंने उन सभी को पार करके अपने लिए अलग मुकाम बनाया।’ वह कहते हैं कि भारत में उनको बहुत पक्षपात का सामना करना पड़ा।

जैन कुछ साल पहले की घटना का जिक्र करते हैं। यह नई दिल्ली के पांच सितारा होटल का वाकया है। हुआ यूं कि वह नाश्ते के लिए बैठे हुए थे लेकिन बैरे ने उनको नजरअंदाज करते हुए उनके पीछे बैठे हुए विदेशी को पहले सर्व(नाश्ता परोसा) किया।

दिल्ली से आगे बढ़कर दक्षिण के हैदराबाद की बात करें तो वहां भी जैन का अनुभव बढ़िया नहीं रहा। वहां के एक पांच सितारा होटल ने जैन को एक गंदा और छोटा कमरा दिया जबकि उनके तीन अमेरिकी मित्रों को काफी स्पेस वाला सुइट दे दिया। उन अमेरिकियों को भारत से कुछ खास लेना-देना नहीं था वे तो बस केलॉग के डीन के साथ कुछ वक्त बिताने के लिए आए थे।

इस घटना के कुछ वक्त बाद जाने-माने मार्केटिंग गुरू फिलिप कोटलर जो कि केलॉग की फैकल्टी के सदस्य भी हैं, ने एक सेमीनार में अपनी जगह बोलने के लिए जैन के पास बुलावा भेजा। सेमीनार में जैन ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि कोटलर उत्पाद को अधिक अहमियत देते हैं और उनके लिए ग्राहक अधिक अहम है। लेकिन इस बात ने भी उन दोनों के बीच दीवार नहीं खड़ी की।

जैन को गाड़ी चलाना नहीं आती थी ऐसे में कोटलर ही उन दिनों जैन को घर तक छोड़कर आते थे। इस वक्त कोटलर पूरे अमेरिका में सेलेब्रिटी के तौर पर पहचान बना चुके हैं और जैन काफी लोगों के लिए अनजान हैं। जैन का मानना है कि आयोजकों को कोटलर के विकल्प के रूप में वह पसंद नहीं आए होंगे।

जैन बताते हैं कि उस सेमीनार में उनका परिचय कराते हुए चेयरमैन ने कहा था, ‘आप सभी फिलिप कोटलर के बारे में जानते हैं आज हम आपको उनके बॉस से मुखातिब कराते हैं।’ जैन के मुताबिक एक स्तर पर आकर आपकी योग्यता की बजाय आपका रवैया ज्यादा अहमियत रखता है। रवैये से उनका मतलब यहां काम के लिए लगन से है।

जिंदगी की मुश्किल राहों पर जैन को अपनी सहायता और मार्गदर्शन के लिए लोग मिलते रहे। गुवाहाटी विश्वविद्यालय से मैथमैटिकल स्टैटिस्टिक्स में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद वह मार्केटिंग के प्रोफेसर बन गए। 1983 में वह टैक्सास चले गए जहां उन्होंने फ्रैंक एम बास के निर्देशन में पीएचडी की। उन्होंने पीएचडी डाटा बेस मैनेजमेंट पर की थी लेकिन बाद में उनका कस्टमर रिलेशनशिप मैनेजमेंट (सीआरएम) की ओर अधिक झुकाव हो गया।

उनकी सफलता में बास का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गणित के प्रति जैन को अब भी बहुत लगाव है। वह कहते हैं, ‘आंकड़े महत्वपूर्ण होते हैं, राय नहीं।’ गणित के अलावा भारतीयता का एहसास भी उनमें मौजूद है। अवसरों, कार्य संस्कृति के लिए उन्हें अमेरिका प्यारा लगता है लेकिन भारत से अब भी उनका लगाव है।

उनको जानने वाले कई लोगों को पता है कि शादी के लिए हां कहने से पहले उन्होंने अपनी पत्नी को देखा भी नहीं था। जैन याद करते हैं, ‘अगर आप किसी लड़की को पसंद करते हैं तो वह आपके लिए खास हो जाती है।’ आपको जानकर हैरानी होगी कि तब तक दीपक जैन के पिता पूरी तरह से अंधे हो चले थे। सच्ची श्रध्दा इसी को कहते हैं।

अगर कोई पक्षपाती रवैया भी मेरे रास्ते में बाधा बनती है तब भी मैं उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देता हूं। – दीपक सी. जैन, डीन, केलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट, इलीनोईस

जब मन में हौसला हो और दुनिया की जंग में जीतने का जज्बा हो तो हर राह मुमकिन होती है। जी हां यह बिल्कुल सच है, और केवल महिला होने से ही आपकी तरक्की के रास्ते बंद नहीं हो सकते। इसकी मिसाल हैं पुनीता कुमार सिन्हा।

इन्होंने वर्ष 1985 में इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ टेक्नोलॉजी नई दिल्ली से केमिकल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया। उन्हें यह जानकर बेहद आश्चर्य हुआ था कि कई कंपनियां महिला इंजीनियर को तरजीह नहीं देती। जब वह यह सुनती है कि उनके ससुर यशवंत सिन्हा के राजनीतिक कद और सरकार में उनकी मौजूदगी का लाभ उनके करियर को बनाने में मिला तो उन्हें तकलीफ होती है और वह कहती हैं, ‘मैंने अपना करियर खुद ही बनाया है।’

पूर्व वित्त मंत्री के बेटे से उनकी मुलाकात आईआईटी में हुई थी और उन दोनों की शादी साल 1986 में हुई। जब उनकी शादी हुई थी उस वक्त यशवंत सिन्हा राजनीतिक गलियारे में बहुत चर्चित नहीं थे। उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा से अपना नाता तोड़कर राजनीति को अपना करियर बनाने की सोची।

पुनीता का कहना है, ‘जब हमारी शादी हुई थी तब हमारे ससुराल वालों के पास तो हमारी शादी कराने तक के लिए पैसा नहीं था।’ बहरहाल वह अभी अपने ससुराल वालों के साथ भारत में नहीं रह रही है। उनका कहना है, ‘किसी भी राजनीतिज्ञ की बहु के बारे में किसी की दिलचस्पी नहीं होती है। अगर किसी की दिलचस्पी भी हो तो उनके बेटे या बेटी के बारे में होती है अगर वह कुछ खास कर रहे हों। मैं तो अपने घर से काफी दूर रही हूं तो लोगों को मेरा ख्याल कैसे आ सकता है।’

वह एक बड़े सपने के साथ फाइनेंस एंड इंवेस्टमेंट की दुनिया में करियर बनाने के लिए विदेश चली गई थीं। जयंत मैकिंजे एंड कंपनी में अपना मुकाम हासिल कर रहे थे। उन्हें विदेश में करियर बनाने की राह में दो तरह की मुश्किलें थी मसलन वह एक महिला है इसके साथ ही वह एक भारतीय हैं।

उनका कहना है, ‘इस तरह की विचारधाराओं से मुझे हर जगह जूझना पड़ा जहां भी मैं गई। अमेरिका को समान अवसर और समानता के पैरोकार के रूप में जाना जाता है लेकिन वहां भी मुझे ऐसे ही अनुभव मिले। मुझे यह महसूस हुआ कि हर समाज में एक पक्षपाती सा रवैया मौजूद है।’ इस तरह के अनुभवों से उन्हें लगा कि ऐसे माहौल में सफलता की राह पर चलने के लिए महिलाओं को अपने आप को बेहद मजबूत करना ही चाहिए।

फाइनेंस एंड इंवेस्टमेंट सेक्टर की चुनौतियों के बावजूद पुनीता ने क्लोज्ड इंड फंड के लिए अपना बेहतरीन प्रदर्शन दिखाया। हालांकि पैसे की उगाही कराना उन्हें अब तक बेहद चुनौतीपूर्ण काम लगता है। उनके मुताबिक इस क्षेत्र की मांग इतनी होती है कि महिलाओं को संपर्क बढ़ाने, पैसे उगाही करने में काफी मेहनत करनी पड़ती है। वह अपने आप को भाग्यशाली मानती है कि उन्हें अक्सर लोगों की मदद मिल जाती है।

बोर्ड ऑफ डायरेक्टर के सभी पुरुष सदस्यों का सहयोग भी उन्हें किसी खास फैसले के वक्त मिलता है। उन्हें अपने बॉस एलेन रैपोर्ट का पूरा सहयोग मिला जब एक इंवेस्टमेंट हाउस ‘ओपेनहेमर’ के साथ कुछ मसले अटके हुए थे। जब वह नौकरी करने के लिए गई तो उन्हें इंडियन फंड्स पर ज्यादा समय देने के लिए कहा गया।

लेकिन भारतीय होने की वजह से वह केवल इसी तक नहीं सीमित रहना चाहती थी बल्कि वह इंटरनेशनल फंड को मैनेज करने में ज्यादा दिलचस्पी लेती थी। उनका कहना है, ‘मुझे इंटरनेशनल फंड के लिए काम करने में ज्यादा मजा आता था। उस लिहाज से भारत तो उस वक्त बहुत छोटा बाजार था।’ वर्ष 1994 से भारत की अर्थव्यवस्था ने जैसे तरक्की की वैसे ही पुनीता कुमार सिन्हा के करियर में भी तरक्की हुई। उन्हें पोर्टफोलियो मैनेजर का पद दे दिया गया। उन्होंने चीजों को तर्कसंगत तरीके से मैनेज करना सीखा।

उनका कहना है, ‘मुझे नहीं लगता कि लोग जानबूझ कर या चालाकी से महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं। दरअसल ऐसे लोगों की अलग सोच होती है। आमतौर पर महिलाओं के बारे में धारणा होती है कि वे बेहद भावुक होती हैं।’ उनका मानना है कि ज्यादातर टॉप नौकरियां पुरुषों के हिस्से में ही हैं।

पुनीता अपने बारे में बताती हैं, ‘मैंने अमेरिका में अपनी पढ़ाई पूरी की है लेकिन फिर भी मैं पूरी तरह भारतीय हूं।’ उनका कहना है कि किसी भी तरह के पक्षपात के मसले पर लड़ना है तो खुद को शिक्षित करना और अपनी क्षमता का विकास करना जरूरी है।

उन्होंने आईआईटी में आकर बड़ी सफलता हासिल करने के बाद उनका सफर कभी नहीं थम पाया। उनका कहना है, ‘मैनें पीएचडी की है और यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया के वॉटर्न स्कूल से फाइनेंस में मास्टर्स की डिग्री ली। मुझे लगता है कि दुनिया में तकनीकी दक्षता ही मेरा सबसे बड़ा सहारा है। मुझे लगता है कि कई तरह की बनी बनाई धारणाओं से मैं खुद ही जूझ रही हूं।’

समान अवसर का पैरोकार माने जाने वाले अमेरिका में भी मुझे हर तरह के भेदभाव का अनुभव हुआ। – पुनीता कुमार सिन्हा, सीनियर मैनेजिंग डायरेक्टर, ब्लैकस्टोन एशिया एडवाइजर,बॉस्टन

First Published : September 2, 2008 | 12:09 AM IST