बात 1990 की है जब मैं पॉल सैमुअलसन से मिलने अमेरिका गया था। सैमुअलसन आधुनिक गणितीय अर्थव्यवस्था के जनक माने जाते हैं।
जब हम बात कर रहे थे तभी एक छात्र ने दरवाजा खोला और कहा, ‘हैलो पॉल, क्या आप इसे रॉबर्ट को देंगे?’ और मेज पर एक किताब रख दी। वह छात्र जिस रॉबर्ट की बात कर रहा था, वह खुद एक अर्थशास्त्री हैं जिन्होंने नोबेल पुरस्कार जीता था।
प्रोफेसर सैमुअलसन ने मेरे चेहरे के भाव को पढ़ लिया था और उन्होंने कहा, ‘आपके देश में ऐसा नहीं होता, पर हमारे देश में एक पूंजी के रूप में मानव का मूल्य बड़ी तेजी के साथ गिर रहा है।’ मैं आपको यह कहानी इसलिए बता रहा हूं क्योंकि खुद मैं भी यह मानता हूं कि अगर मानव का मूल्य समय के साथ गिरता है तो उसे गिरने देना चाहिए।
दूसरे शब्दों में कहें तो युवाओं को अपने विचारों को रखने के अधिक से अधिक मौके दिए जाने चाहिए। इस विचार से मैं इतना प्रभावित हुआ हूं कि मैंने तय कर लिया है कि इस अखबार के लिए अब यह मेरा आखिरी स्तंभ होगा। मैं चाहता हूं कि अगले महीने से मेरी जगह 40 वर्ष का कोई युवा इस अखबार के लिए स्तंभ लिखे।
पिछले कुछ सालों में लोगों ने मुझसे अक्सर यह पूछा है कि इस स्तंभ का नाम ‘लाइन ऐंड लेंथ’ क्यों है? मेरा मानना है कि जिस तरीके से गेंदबाजी में लाइन ऐंड लेंथ को सही रखा जाए तो गेंदबाजी बेहतरीन होती है ठीक इसी तरह अच्छा लिखने के लिए भी यही नियम लागू होते हैं। एक वजह यह भी है कि इस स्तंभ के लिए पहली बार यह नाम तब चुना गया जब भारत 1992 के विश्व कप क्रिकेट से बाहर हो गया था।
शुरुआत के 14 सालों में यह स्तंभ साप्ताहिक हुआ करता था और ऐसे में स्वाभाविक है कि अगर कोई स्तंभकार हर हफ्ते कुछ न कुछ लिखेगा तो उसमें काफी कुछ बकवास भी होगा और मैं भी उनसे अलग नहीं हूं। पर कभी कभार ऐसा भी हुआ है कि भूले भटके मैंने भी कुछ अच्छा लिखा है और जैसा कि मार्क एंटनी कहा करते थे कि अक्सर बुरी चीजों को भुला दिया जाता है।
ईश्वर का धन्यवाद है कि मेरी बुरी रचनाओं को भी भुला दिया गया। पर अगर ऐसा हुआ है तो इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि यह अखबार स्तंभकारों के लिए स्वर्ग की तरह है। आपको पूरी स्वतंत्रता है कि आप जिस तरीके से चाहें अपने विचारों को रख सकते हैं, हां आपके विचारों में शालीनता होनी चाहिए।
मुझे लगता है कि सभी स्तंभकारों ने ऐसा महसूस किया होगा और अगर नहीं किया तो उन्हें इस बात का एहसास होना चाहिए कि चाहे वे कितना भी ध्यान से क्यों न लिखें अक्सर पाठक लेख का कुछ और मतलब निकाल लेता है, भले ही लेखक का संदेश उससे अलग क्यों न हो। कई बार तो ऐसा भी होता है कि लेखक कहना कुछ और चाहता है और लेखक ठीक उसका उलटा मतलब निकाल लेता है।
ऐसा क्यों होता है इसका जवाब मनोवैज्ञानिकों के पास है। और अगर उनके पास इसका जवाब नहीं है तो उन्हें इसका जवाब ढूंढना चाहिए क्योंकि ऐसा सिर्फ अखबारों के स्तंभ के साथ ही नहीं होता है। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि पहले तो पाठक के पास स्तंभों को पढ़ने का समय नहीं होता और अगर वे कुछ समय निकाल भी लें तो वह इसे पूरा पढ़ने में कुछेक मिनटों से ज्यादा समय नहीं लगाता।
स्तंभकारों के साथ एक और बड़ी समस्या होती है कि उनकी याददाश्त कुछ खास चुस्त दुरुस्त नहीं होती। मैं भी कई बार अपने स्तंभों में यह लिख देता हूं कि, ‘जैसा कि मैंने कुछ साल पहले अपने स्तंभ में कहा था (या कुछ हफ्तों या महीनों पहले)’। अगर आप अक्सर लिखा करते हैं तो स्वाभाविक है कि किसी न किसी स्तंभ में आप पिछले स्तंभ का जिक्र करेंगे ही और तब भूलना शायद उनकी सेहत के लिए फायदेमंद नहीं होता।
मेरे साथ भी भूलने की ऐसी समस्या शुरू होने लगी थी और तभी मैंने सोच लिया था कि यही सही समय है जब मैं स्तंभ लेखन को अलविदा कह दूं। मेरा मानना है कि स्तंभकारों को तीन वर्गों में बांटा जा सकता है। पहला वह जो समझाते हैं, दूसरा वह जो कैंपेन चलाते हैं और तीसरा वह जो कुछ नहीं कहते, वे केवल इसलिए लिखते हैं क्योंकि उनका नाम छपता है और उन्हें इसके लिए पैसे मिलते हैं।
कई ऐसे पत्रकार हैं (बेहतर है कि इन्हें पत्रकार नहीं कहें) जो 800 या 1,000 शब्दों के स्तंभ में एक साथ कई मुद्दों को उठाना चाहते हैं। ये उन स्तंभकारों से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं जो कुछ नहीं कहते। स्तंभ लिखने का एक नियम है कि एक स्तंभ में एक ही मुद्दा उठाएं। अगर आप ऐसा करते हैं तो आप सही हैं।
ऐसा देखा गया है कि शिक्षा जगत से जुड़े लोग स्तंभ लिखने में माहिर नहीं होते। मेरे विचार से तो उनमें सीखने की क्षमता भी सबसे कम होती है। प्रशासनिक सेवा से ताल्लुक रखने वाले (जो अब अपने पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं) भी बढ़िया स्तंभ नहीं लिख पाते। उनकी लेखनी अक्सर पाठकों को खीझ दिलाती है और कई बार उनमें मुद्दों के बारे में समग्र जानकारी भी नहीं होती।
क्या पेशेवर पत्रकार उन लेखकों से बेहतर स्तंभ लिखते हैं जो पत्रकार नहीं होते? इसका जवाब बड़ा सीधा और सरल है- हां। शायद इसकी एक वजह है कि स्तंभ लिखने के पहले उन्हें ऐसा करने का प्रशिक्षण दिया जा चुका होता है। कम से कम किसी मुद्दे को संक्षेप में और निपुणता के साथ कैसे रखना है इसका अनुभव तो उनके पास पहले से होता है।
वजह चाहे जो भी हो पर अगर आप चोटी के 10 स्तंभकारों का नाम लें तो उनमें से 7 तो पत्रकार ही होंगे। तो इन सब बातों का आखिर क्या निष्कर्ष निकलता है? सीधा सा निष्कर्ष यही है कि इससे पहले कि लोग आपसे जाने को कहने लगें आपको खुद बाहर का रास्ता देख लेना चाहिए।