पश्चिमी देशों की बैंकिंग व्यवस्था में आज कल जो हो रहा है, उसे मीडिया ने ‘निजी फायदे और सार्वजनिक नुकसान’ की उपाधि से नवाजा है।
ऐसा क्यों कहा जा रहा है, इसका अंदाजा आपको ब्रिटेन की नॉर्दर्न रॉक और अमेरिकी बियर स्टर्न्स के अधिग्रहण, अपने बाजारों में तरलता को बरकरार रखने के लिए केंद्रीय बैंकों की घटिया परिसंपत्तियों की खरीदारी और बुश द्वारा मकानमालिकों के लिए जारी किए गए धन से लग सकता है।
अमेरिकी सरकार के इस राहत पैकेज से तकरीबन चार लाख मकानमालिकों को महंगे लोनों से राहत मिल पाएगी। यह रकम अमेरिकी सरकार फैनी मे और फ्रेडी मैक के जरिये लोगों के बीच बांटेगी। उम्मीद है कि इस पैकेज की वजह से अमेरिकी खजाने पर करीब 300 अरब डॉलर का भारी-भरकम बोझ पड़ेगा। वैसे, इसका सबसे ज्यादा फायदा तो उन दलालों और बैंकों को ही होगा, जिन्होंने लोगों के बीच खुले हाथों से सब-प्राइम लोन बांटे थे।
फेनी मे और फ्रेडी मैक निजी स्वामित्व वाली कंपनियां हैं, लेकिन इन्हें पैसा सरकार की तरफ से मिलता है। अमेरिका में लोगों को हॉऊसिंग लोन देने में इन कंपनियों की अहम भूमिका होता है। इसका अभी बाजार में कुल मिलाकर 5.2 हजार अरब डॉलर (अमेरिका के जीडीपी का 40 फीसदी हिस्सा) लगा हुआ है। साथ ही, बाजार में लिए गए कुल कर्ज में उनका हिस्सा 2.3 हजार अरब डॉलर का है। बाजार की निगाह से देखें तो उनका तो दिवाला निकल चुका है। फिर भी सरकारी मदद के बूते पर उनकी रेटिंग आज भी काफी जबरदस्त है।
पिछले हफ्ते, जो हुआ उसके बाद से तो यह बात और भी खुले तरीके से सामने आ गई है। इसमें कोई शक नहीं है कि अगर वहां लोग अपने कर्जे चुकाने में नाकामयाब रहते तो इससे केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में बड़ा संकट खड़ा हो जाता। ऐसा इसलिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगी एक हजार अरब डॉलर की पूंजी बाहरी मुल्कों से आती है। अब तक होता यही आया है कि जब तक वक्त अच्छा होता है लोगों का फायदा होता है। जब बुरा समय आता है तो सरकार घाटा सहती है। लंबे समय से बाजार में यही होता आया है।
तो फिर दिक्कत कहां हो रही है? मैं फिलहाल सिटीबैंक का इतिहास पढ़ रहा हूं। इसमें एक जगह अमेरिकी फेडरल रिजर्व के तत्कालीन अध्यक्ष ऑर्थर बर्न्स, उस समय सिटीबैंक के अध्यक्ष वॉल्टर रीटसन से कहते हैं, ‘वॉल्टर तुमने अपने बैंक के लिए कमाई का लक्ष्य तय करके एक गलत कदम उठाया है। यह मुमकिन ही नहीं है।’ उस दौर में बैंक एक अर्ध सरकारी संस्थान हुआ करते थे। न कि कोई कारोबार, जिसका मकसद अपने शेयरधारकों, कर्मचारियों और मैनेजमेंट के लिए ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना होता है।
रीटसन के कार्यकाल में सिटीबैंक ने अपना इंसानी चेहरा गंवा दिया और शुध्द कारोबारी चोला ओढ़ लिया। और उसका मकसद मुनाफा कमाना बन गया तो दूसरे बैंक भला कैसे पीछे रहते। उन्होंने अपने मुनाफे को ज्यादा से ज्यादा करने की हर मुमकिन कोशिश की। इन बैंकों और उन्होंने जो वित्तीय बाजार बनाए थे, उन्हें परिपक्व बाजारों की संज्ञा दी गई। यह संज्ञा केवल पश्चिमी मुल्कों ने ही नहीं, बल्कि हम जैसे देशों ने भी दी। लेकिन हाल के समय में उनके साथ जो हुआ है, उसे देखते हुए कोई भी यह कहेगा, ‘परिपक्व? पागल हो क्या? वे तो बस लालची हैं और उन्हें अपना धंधा भी करना ठीक से करना नहीं आता।’
मुझे तो इस बात पर हैरत है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के कथित रूप से बड़े जानकारों और अमेरिकी बैंकिंग उद्योग इतनी बड़ी भूल कैसे कर सकते हैं? उन्हें कैसे लगा कि वहां मकानों की कीमतें अब ऊपर ही चढ़ती रहेगी? उन्हें घाटे के विकराल रूप का अंदाजा लगाने में इतनी देर कैसे लग गई? लगातार दूसरी तिमाही तक एक के बाद एक बैंकों ने मोटे घाटे दिखाए थे। क्या परिसंपत्तियों और खतरे का प्रबंधन अच्छे से अच्छे वित्त संस्थानों के इतना मुश्किल हो गया है? एक रिस्क मैनेजमेंट कंसल्टेंट के रूप में मुझे इस बात पर भी हैरत है कि कैसे कारोबारियों ने उन बैंकों के इनवेस्टमेंट पोर्टफोलियो को तोला था?
यह तो इंटरनल कंट्रोल का एक अहम तरीका है, जिसे या तो कारोबारी खुद या फिर किसी दूसरी संस्था को सौंपते हैं। दूसरी तरफ, जब बैंकों के पास पर्याप्त मात्रा में हेज फंड नहीं रह गए, तो उन्होंने अपने खुद के हेज फंड शुरू कर दिए। कई बैंकों ने सिटी बैंक के हेज फंड में मोटे पैसे लगाए थे, लेकिन आज वे खून के आंसू रो रहे हैं। सिटीग्रुप ने विक्रम पंडित को अपनी तरफ लाने की खातिर उनके हेज फंड को अरबों डॉलर में खरीदा था। मजे की बात यह है कि आज जब उनका हेज फंड जबरदस्त घाटे की चपेट में है और वह सिटीग्रुप के मुखिया की कुर्सी पर हैं।
अगर मुनाफा पर इतना जोर देना गलत है, तो क्या बैंकरों को इसकी आस ही छोड़ देनी चाहिए? क्या उन्हें सारी मार्केटिंग और नई सोच से पल्ला झाड़, लोगों के लिए समाज सेवा शुरू कर देनी चाहिए? कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता। हालांकि, उन्हें मुनाफे और लोगों की सेवा के बीच में एक संतुलन बिठाना चाहिए। उन्हें अपनी कारोबारी क्रूरता और सामाजिक भलाई के बीच एक सामंजस्य बिठाना पड़ेगा।
इस मामले में अरस्तू की बात सचमुच काफी हद लागू होती है। उन्होंने कहा था कि किसी बात पर अड़े रहना सबसे बड़ा पाप है और समझौता करना सबसे बड़ा पुण्य। इस बात को अगर बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें तो इसका मतलब यह निकलता है कि हमें ताबड़तोड़ मुनाफा कमाने की बात सोचने के साथ-साथ समाज के भले के बारे में सोचना चाहिए। तभी इस तरह के संकटों से हम बच पाएंगे।