स्टॉक मार्केट में टेक्सटाइल क्षेत्र मंदी की मार झेल रहा है। साथ ही टेक्सटाइल मंत्रालय ने इस क्षेत्र की संभावनाओं पर विश्वास बनाए रखते हुए 2012 तक 50 अरब अमेरिकी डॉलर के निर्यात का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, जिसकी समयसीमा पहले 2010 रखी गई थी।
हालांकि वास्तविकता इन दोनों के बीच में है। बुनियादी तौर पर देखा जाए तो भारतीय टेक्सटाइल उद्योग में पिछले 15 साल में कभी भी इतनी बेहतर संभावनाएं नहीं रही हैं। टेक्सटाइल और परिधानों का वैश्विक कारोबार मुक्त व्यापार से इस कदर जुड़ा हुआ है, जितना कि हो सकता है। इसका परिणाम यह है कि कुछ विकसित देश, चुनिंदा विकसित बाजारों में कर मुक्त कारोबार का आनंद ले रहे हैं।
वास्तविकता यह है कि सभी विकसित देशों, जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान शामिल हैं, में सारी सुविधाएं हैं लेकिन वे इससे वाकिफ हैं कि टेक्सटाइल कारोबार का भविष्य उनके लिए लंबे समय के लिए बेहतर नहीं है। इसी के मुताबिक उन्होंने अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात करना शुरू कर दिया है।
चीन अभी भी टेक्सटाइल और कपड़ा उद्योग के विनिर्माण और निर्यात के मामले में पूरी दुनिया में शीर्ष पर बना हुआ है। लेकिन अगर बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें तो वहां भी निर्यात मंदी की चपेट में है। इसमें कमी की तमाम वजह है। सबसे अहम बात यह है कि चीन की अर्थव्यवस्था विकास की ओर है जिससे घरेलू मांग बढ़ रही है। इसके साथ ही मजदूरी बढ़ने से इस पर आने वाली लागत बढ़ रही है।
साथ ही वहां की करेंसी के मजबूत होने से भी निर्यात लड़खड़ाया है। खराब आधारभूत ढांचे और राजनीतिक माहौल के बेहतर न होने के बावजूद वैश्विक बाजार में भारत की अलग पहचान बनी है। इसमें टेक्सटाइल और परिधान खरीदार (खुदरा कारोबारी और ब्रांड) और आपूर्तिकर्ताओं (टेक्सटाइल और परिधान उत्पाद के निर्माता, विनिर्माण के लिए नए स्थलों की पहचान कर रहे है) का विश्वास लौटा है।
भारत में कच्चे माल का आधार बढ़ा है और इससे मानव निर्मित फाइबर और कॉटन की उत्पादकता और उत्पादन को मजबूती मिली है। घरेलू बाजार खूबसूरती से मात्रात्मक और कीमतों में वृध्दि के साथ आगे बढ़ रहा है। यह संभावना बन रही है कि कुल कारोबार वर्तमान के 35 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2014 तक 50 अरब अमेरिकी डॉलर के आंकड़े पर पहुंच जाएगा।
अंत में, केंद्र और राज्य सरकारें और टेक्सटाइल मंत्रालय इस सेक्टर का बहुत ज्यादा समर्थन कर रहे हैं। इस नीति को उद्योग जगत का न केवल जोरदार समर्थन मिल रहा है, बल्कि आगे बढ़कर वे निवेश भी कर रहे हैं।
संपूर्ण रूप से देखें तो इस उद्योग की राजस्व क्षमता 2014 तक 50 अरब अमेरिकी डॉलर ( 200,000 करोड़ रुपये से अधिक) और 2020 तक बढ़कर 125 अरब अमेरिकी डॉलर होने की संभावना है। इतने कम समयांतराल में उपभोक्ता वस्तुओं और इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, मीडिया और इंटरटेनमेंट, नागरिक उड्डयन, फार्मास्यूटिकल्स, हेल्थकेयर सर्विसेज या इंश्योरेंस सेवा क्षेत्र में इतनी बढ़ोतरी की संभावना नहीं है।
इस पृष्ठभूमि को देखते हुए भी इस बात पर आश्चर्यमिश्रित निराशा होती है कि ज्यादातर भारतीय औद्योगिक घराने तथा नए और उभरते हुए बड़े उद्यमी इस क्षेत्र की सुरक्षित और स्थायी रूप से लाभदायक क्षमता को कम करके आंकते हैं।
बड़े दुख की बात है कि इस क्षेत्र में प्रति साल निवेश की क्षमता 10 अरब अमेरिकी डॉलर या इससे भी ज्यादा है, लेकिन पिछले 5 साल के आंकड़ों पर गौर करें तो इस क्षेत्र में कुल निवेश 10 अरब अमेरिकी डॉलर का रहा है। पिछले 15 साल में इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 1 अरब अमेरिकी डॉलर से भी कम रहा है।
इस क्षेत्र में उत्साह की कमी का सबसे बड़ा कारण यह लगता है कि जब स्वतंत्रता के बाद भारत में औद्योगीकरण की नींव पड़ी तो ज्यादातर बड़े औद्योगिक घरानों ने इस क्षेत्र में कदम रखा, लेकिन कुछ दशक पहले इस क्षेत्र पर ढेरों मुसीबतें आईं। इसमें 80 और 90 के दशक में सरकार की हतोत्साहित करने वाली नीतियों ने संगठित टेक्सटाइल उद्योग पर बुरा प्रभाव डाला।
जहां कुछ औद्योगिक घरानों के कारोबार में गिरावट आई वहीं बिड़ला समूह और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसे कुछ अन्य ने इस क्षेत्र में से धीरे-धीरे निवेश कम करने के साथ ही दूसरे लाभकारी क्षेत्रों में कदम रखना शुरू कर दिया। यह सुझाव देना बहुत कठिन है कि कौन से कदम उठाए जाएं जिससे कपड़ा निर्माण के क्षेत्र में आमूल-चूल परिवर्तन आ जाए, उद्योग जगत का विश्वास फिर से जागे जिससे वे इस सेक्टर में भारी-भरकम निवेश करें।
वे टेलीकॉम, रिटेल, रियल एस्टेट, इन्फ्रास्ट्रक्चर और अन्य क्षेत्रों में जहां तरह तरह के जोखिम और चुनौतियां हैं उन क्षेत्रों में भारी भरकम निवेश करने के बजाय सुरक्षित कपड़ा उद्योग में निवेश करें। बहरहाल सरकार और योजना आयोग के लिए ‘फैब पालिसी’ (सेमीकंडक्टर्स) को मिली जबरदस्त प्रतिक्रिया एक सीख हो सकती है। इस क्षेत्र में रिलायंस, वीडियोकॉन और मोजर बेयर के अलावा तमाम बड़े औद्योगिक घरानों ने अरबों डॉलर का निवेश करने का वादा किया है।
शायद टेक्सटाइल मंत्रालय को टेक्सटाइल अपग्रेडेशन फंड स्कीम (टीयूएफएस) से भी बेहतर एक नई नीति तैयार करनी होगी। जिसमें टेक्सटाइल सेक्टर के लिए बड़ी ग्रीनफील्ड निवेश योजनाओं (25 करोड़ अमेरिकी डॉलर या इससे भी ज्यादा) को बढ़ावा दिया जाए। इसमें परिधान और टेक्निकल टेक्सटाइल, बने बनाए परिधान, टेक्सटाइल और परिधान उत्पादन मशीनरी शामिल हो सकते हैं।
इस क्षेत्र में रिटेल और हेल्थकेयर के अलावा भी रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। इसके लिए जमीन उपलब्ध कराने और अन्य ढांचागत सुविधाओं के लिए राज्यों के समर्थन की भी जरूरत है। इस क्षेत्र में बड़े निजी इक्विटी फंडों और तमाम बड़े वैश्विक निवेशकों के भी निवेश करने की उम्मीद है।