यह दौर बेहतरीन है तो सबसे बदतर भी है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका में नौकरी के अवसर कम होते जा रहे हैं।
केवल अमेरिका में ही यह समस्या नहीं है बल्कि दुनिया की कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाएं जिनमें जापान, फ्रांस और इटली जैसे देश शामिल हैं, भी इससे अछूते नहीं हैं। लेकिन भारत में तस्वीर एकदम जुदा नजर आती है।
यहां लोगों को नौकरी के अवसरों में अगले साल या उससे आगे तक कोई कमी नजर नहीं आ रही है। इस तरह के रुझान अप्रैल में हुए नील्सन ग्लोबल कंज्यूमर कॉनफिडेंस सर्वे में सामने आए हैं। इंटरनेट का उपयोग करने वाले 500 भारतीयों पर किए गए सर्वे में 26 फीसदी ने देश में नौकरी के अवसरों को बेहद शानदार बताया जबकि 60 फीसदी लोगों ने नौकरी के अवसरों को अच्छा बताया।
सर्वे में इस लिहाज से नॉर्वे के बाद भारत दूसरा सबसे बड़े आशावादी देश के रूप में उभरा है। लेकिन इस आशावाद में भी कमी आई है। इससे एक साल पहले हुए सर्वे में 45 फीसदी लोगों ने देश में नौकरी के अवसरों को बेहद शानदार बताया था जबकि 48 फीसदी ने उनको अच्छा बताया था। दुनिया भर में आर्थिक मंदी को देखते हुए ताजा रुझान भी कतई बुरे नहीं हैं। छह महीनों के अंतराल पर होने वाले इस सर्वे की अपने में बहुत मान्यता है।
अप्रैल वाला सर्वे 51 देशों के 28,253 इंटरनेट उपभोक्ताओं के आधार पर हुआ जबकि इससे पहले सर्वे में 48 देशों के 26,000 लोगों को शामिल किया गया था। इनमें से एशिया प्रशांत के 10 देशों में से 4 ने मंदी को लेकर चिंता जताई। लेकिन क्षेत्र के तीन देशों ने इसको खारिज भी किया। अगले एक साल में मंदी से प्रभावित होने के लिहाज से भारत इस सूची में नौवें स्थान पर था।
मंदी के बारे में भारतीय उत्तरदाताओं में से 38 फीसदी का मानना था कि यह दौर जल्द ही आने वाला है, 33 फीसदी ऐसा नहीं सोचते जबकि 29 फीसदी तो इसके बारे में ही नहीं जानते। दूसरी ओर 6 महीने पहले 27 फीसदी लोग ही मंदी को लेकर चिंतित थे जबकि 46 फीसदी लोग इसको लेकर गंभीर नहीं थे। भारत में 69 फीसदी लोग महंगाई दर को लेकर परेशान हैं जबकि 44 फीसदी ब्याज दरों को लेकर।
पिछली बार के नील्सन के सर्वे में भारतीय सबसे ज्यादा राजनीतिक अनिश्चितता को लेकर परेशान बताए गए थे। सर्वे के मुताबिक नौकरी को लेकर भारतीयों को कोई चिंता नहीं थी जबकि पुर्तगाल, सिंगापुर और कोलंबिया में यह बहुत ही गंभीर समस्या बनी हुई है। लेकिन इस बात में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि साल की दूसरी छमाही में भारत भी इस सूची में शामिल हो जाए। महंगाई को काबू में करने के लिए सरकार मौद्रिक नीति को और सख्त बना सकती है।
जिसकी वजह से कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा। जब कंपनियों के खजाने में रकम ही कम होगी तो वेतनों में वृद्धि भी रुक सकती है और यह भी हो सकता है कि कंपनियां नौकरी में कटौती भी कर दें। ‘मा फोई मैनेजमेंट कंसल्टेंट्स’ के प्रबंध निदेशक पंडिया राजन कहते हैं कि इस साल रोजगार सृजन में कमी आ सकती है। इस साल सूचना प्रौद्योगिकी और सूचना प्रौद्योगिकी आधारित सेवाओं में 70,000 नौकरियां मिलने का अनुमान है जो कि पिछले साल से 30 फीसदी कम है।
पिछले साल इस श्रेणी में 1,00,000 लोगों को नौकरी मिली थी। नौकरी के अवसर मुहैया कराने वाली वेबसाइट नौकरी डॉट कॉम के सीईओ संजीव बीखचंदानी कहते हैं कि इनफोसिस के प्रवक्ता के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में कंपनी 25,000 नए लोगों को नौकरी देगी जबकि पिछले साल इस कंपनी ने 33,177 लोगों को नौकरी दी थी। समस्या केवल नौकरी को लेकर ही नहीं है बल्कि वेतन को लेकर भी पैदा हो गई है।
राजन का कहना है कि भारत में मांग और आपूर्ति की स्थिति शुरू हो चुकी है जो कि नियोक्ताओं के लिहाज से फायदेमंद है। खैर नौकरी के मामले में दूसरा सबसे बड़ा आशावादी देश भारत को लोक वित्त के मामले में भी डेनमार्क की लंबी छलांग की वजह से थोड़ा पीछे रहना पड़ा है। पिछले सर्वे में 14 फीसदी लोगों ने लोक वित्त को बेहतरीन बताया था जबकि 74 फीसदी ने इसको बढ़िया कहा था। इस बार के सर्वे में 12 फीसदी लोगों ने लोक वित्त को बेहतरीन बताया है जबकि 67 फीसदी लोगों ने इसको बढ़िया कहा है।
भारतीय उत्तरदाता अगले एक साल में अपनी मनचाही चीजों को खरीदने के प्रति कम आशावान हैं, इस मामले में रिकॉर्ड 14 फीसदी की गिरावट आई है। भारतीय मुश्किल स्थिति का सामना करने से कतरा रहे हैं। उनमें से कई छुट्टी पर जा रहे हैं, छुट्टियों पर जाने की संख्या में 4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यह इसलिए हो रहा है क्योंकि अतिथि सत्कार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मजबूती से उभरते क्षेत्र सूचना प्रौद्योगिकी क्षेतर में रोजगार में आई कमी की भरपाई कर सकते हैं।
राजन का कहना है कि संगठित क्षेत्र में 3 फीसदी की वृद्धि हुई है। महंगाई दर के परेशान करने के बावजदू देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 9 फीसदी की दर से बढ़ना जारी रखेगा। विशेषज्ञों का भी यही कहना है कि जब तक देश का सकल घरेलू उत्पाद 7 फीसदी से अधिक की दर से बढ़ना जारी रखेगा तब तक संगठित क्षेत्र में भी वृद्धि होती रहेगी।
बीखचंदानी इस बात से सहमति भी जताते हैं कि जब तक भारत इसी रफ्तार से तरक्की करता रहेगा तब तक नौकरियों को लेकर संकट की स्थिति पैदा नहीं होगी। नौकरी डॉट कॉम के आंकड़े भी इस बात की ही तस्दीक करते हैं। इस वेबसाइट का कहना है कि वर्ष 2007-2008 के दौरान उनकी वेबसाइट के जरिये 32,500 लोगों को नौकरी मिली जबकि इससे पिछले वर्ष उनकी वेबसाइट के माध्यम से 27,000 लोगों ने नौकरी पाई थी।
रिटेल क्षेत्र और फैलने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। पेंटालून जैसी कंपनी इस साल अपने स्टोरों की संख्या बढ़ाकर दोगुना करना चाहती हैं, जिसके लिए उनको नये लोगों की जरुरत पड़ना एकदम लाजिमी है। इस बाबत फ्यूचर ग्रुप के संजय जोग कहते हैं कि अभी कंपनी के पास 25,000 कर्मचारी हैं और इस साल के आखिर तक हम उनको बढ़ाकर 45,000 तक करना चाहते हैं। उनका मानना है कि वैश्विक मंदी जैसी किसी भी चीज का असर रिटेल के कारोबार पर नहीं पड़ा है।
बिजनेस स्कूल वेतनों में वृद्धि और इस बात को लेकर शेखी बघार रहे हैं कि उनके छात्रों को नौकरी देने के लिए ब्लूचिप कंपनियां उनके दरवाजे पर आ रही हैं। एक भारतीय बिजनेस स्कूल तो न केवल नौकरी के अवसरों में बढ़ोतरी की बात कर रहा है बल्कि शानदार वेतन की भी बात कर रहा है। वर्ष 2007 में 202 कंपनियों ने इस प्रक्रिया में भाग लेकर 581 नौकरियां दी थीं वहीं इस साल इस प्रक्रिया में 230 कंपनियां शामिल हो रही हैं जो 657 नौकरियां ऑफर कर रही हैं। औसत वेतन में 26 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और यह 19 लाख रुपये तक पहुंच गया है।
इसके अलावा दूसरे दरजे के बिजनेस स्कूलों में भी नौकरी के अवसरों की भरमार है। मुंबई के प्रतिष्ठित एस पी जैन इंस्टीटयूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च में इस बार 100 कंपनियां नौकरी ऑफर कर रही हैं, इस संस्थान में नौकरी देने वाली कंपनियों के लिहाज से इस बार 43 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। कई मानव संसाधन विशेषज्ञों का कहना है कि मंदी का भारत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। बदतर स्थिति में हम अपनी बंद मुट्ठी वाली नीति पर भरोसा कर सकते हैं।