दुनिया भर में खाने के सामानों की कीमतों में हो रही बेतहाशा वृध्दि अब कोई दबी-छुपी बात नहीं रह गई है।
अंतर तो केवल इस मुद्दे पर है कि विश्व के किन-किन देशों में खाद्यान्नों की कीमत में कितने फीसदी का इजाफा हुआ है। अगर केवल एशिया पर गौर करें, तो यहां भी महंगाई सुरसा की शक्ल अख्तियार करती जा रही है। लेकिन यहां भी यह देखना वाकई जबरदस्त है कि कौन सा मुल्क इस सुरसा से कितना परेशान है।
इस ऊंच-नीच का असर केवल कृषि नीतियों और खाद्य सुरक्षा पर ही नहीं, बल्कि पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था पर बड़े तौर पर पड़ रहा है। आंकड़ों की मानें तो महंगाई के दानव से सबसे ज्यादा परेशान वियतनाम है। यहां खाने के सामानों की कीमत में इस साल पिछले वर्ष की तुलना में कम से कम हर महीने 20 फीसदी का इजाफा हो रहा है।
अप्रैल में तो यह बढोतरी पूरे 34 फीसदी की रही। चीन और इंडोनेशिया में भी इस साल खाद्यान्नों की कीमत में इजाफे का प्रतिशत दहाई के आंकड़ों में चल रहा है। पिछले महीने चीन का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक तो 8.5 फीसदी के आंकड़े को पार कर गया। इससे इस बात की संभावना तेज हो गई है कि अब सरकार को इस मामले में अपनी टांग अड़ानी ही पड़ेगी, जिससे विकास दर पर असर पड़ सकता है।
हांगकांग के हालात भी काफी हद तक चीन से जुड़े हुए हैं, जिस वजह से यहां भी जनवरी से मार्च के दौरान महंगाई की दर दहाईं के आंकड़े को पार कर चुकी है। इंडोनेशिया का भी हाल पस्त है। यहां भी खाने के सामानों की कीमतों में इस साल अप्रैल तक 11 से 16 फीसदी तक का इजाफा हो चुका है।
दूसरी तरफ, एशियान के बाकी के देशों पर इस महंगाई का ज्यादा असर नहीं पड़ा है। अब फिलीपीन्स और थाईलैंड को ही ले लीजिए। अप्रैल से पहले तक तो यहां पर महंगाई की दर इकाई के आंकड़ों में ही चल रही थी। हालांकि, अप्रैल में यहां पर भी महंगाई का पारा चढ़कर 12 फीसदी (फिलीपीन्स) और 10 फीसदी (थाईलैंड) तक पहुंच चुका था।
मलेशिया पर तो इस सुरसा की काफी कम मार पड़ी है। यहां इस साल खाने के सामानों के बीच महंगाई की दर पांच फीसदी से भी कम रही है। सिंगापुर जैसे पूरी तरह आयात पर निर्भर रहने वाले मुल्क में भी इस साल जनवरी से मार्च के दौरान छह से आठ फीसदी के बीच में ही रही।
भारत में भी तो इस दौरान महंगाई की दर चार से छह फीसदी के बीच रही, लेकिन अप्रैल में तो अपने मुल्क में भी महंगाई आठ फीसदी के आसपास पहुंच गई। वैसे, एक बात ध्यान में रहे कि और देशों से जुदा अपने मुल्क में महंगाई थोक मूल्य सूचकांक के जरिये नापी जाती है।
एशिया के अमीर मुल्कों में से केवल ताइवान ही इस कमरतोड़ महंगाई से परेशान है। वहां महंगाई की दर इस वक्त 10 फीसदी के आंकड़े को छू रही है। दूसरी तरफ, जापान में तो जैसे कोई दिक्कत ही नहीं है। वहां तो महंगाई की दर केवल दो फीसदी के आसपास ही चक्कर काट रही है। दक्षिण कोरिया में भी तो महंगाई की दर दो-तीन फीसदी के बीच में ही घूम रही है।
एक लाइन में कहें तो हो सकता है कि खाने की बढ़ती कीमतें दुनिया भर के लिए एक दिक्कत हो, लेकिन कुछ एशियाई देशों के लिए यह एक बेहद छोटी समस्या है, तो बाकियों के लिए बहुत बड़ी। वैसे, यह समझना भी ठीक नहीं होगा कि समस्या केवल इतने तक सीमित है। मूल्य सूचकांक के आंकड़ों में पूरी तरह से भरोसा करना काफी मुश्किल काम है।
यह अक्सर लोगों को सच्ची तस्वीर से रूबरू नहीं करवाते। इस इलाके के लगभग सभी देशों में खाद्यान्नों के उत्पादन और वितरण पर सरकार का कड़ा नियंत्रण रहता है। इसकी वजह से उस असल महंगाई का अनुमान लगाना काफी मुश्किल हो जाता है, जिसका सामना लोगों को करना पड़ता है। इसलिए कई देशों में हो सकता है कि आलम अखबारों में बताई जा रही हालत से पूरी तरह से अलग हो।
इस वक्त मैक्रोइकॉनोमिक्स पॉलिसी पर जो बहस चल रही है, उसमें सब्सिडी की भूमिका काफी अहम है। सब्सिडी का इस्तेमाल अधिकतर देश खाद्यान्नों के मैनेजमेंट के लिए करते हैं। इस वजह से महंगाई की दर और सरकारी खजाने की सेहत के बीच एक उल्टा संबंध देखा जा सकता है। यानी महंगाई की दर जितनी ज्यादा रहेगी, सरकारी खजाने की सेहत उतनी ही बुरी रहेगी।
इसकी बड़ी वजह यह है कि सब्सिडी का इस्तेमाल महंगाई को दबाने के लिए होता है। इस कमरतोड़ महंगाई का खामियाजा केंद्रीय बैंकों को भी चुकाना पड़ रहा है। उन्हें अपनी भूमिका पर अंकुश लगाना पड़ रहा है। अगर हालात सामान्य होते, तो इस वक्त हम रिजर्व बैंक से बाजार में तरलता को बढ़ाने और ब्याज दरों पर उदार कदम उठाने की अपेक्षा कर सकते थे।
इससे होता यह कि अमेरिका की तरफ जाने वाले निर्यात में आई कमी को घरेलू मांग ही पूरा कर देती। एक तरफ अमेरिका में तो ब्याज दरों को तेजी से कम किया जा रहा है, लेकिन बाकी के देशों में अमेरिकी पदचिन्हों पर चलने की हिम्मत नहीं है। कई तो उससे उलटी दिशा में जा रहे हैं। भारत और चीन को ही देख लीजिए. इन दोनों जगहों पर केंद्रीय बैंकों ने हाल ही में तो अपने कैश रिजर्व रेश्यो में इजाफा किया था।
इस एक और खामियाजा निर्यात प्रतिबंधों के रूप में भी दुनिया को झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। मतलब यह कि किसी उत्पाद के बड़े उत्पादक मुल्क अपने घरेलू बाजार में कीमतों को स्थिर रखने के लिए उस उत्पाद के निर्यात पर प्रतिबंध भी लगा सकते हैं। इससे उस वस्तु का आयात करने वाले मुल्कों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। मिसाल के लिए खुद को ही ले लीजिए।
हमारे मुल्क में खाद्य तेलों की कीमतों में अभी और इजाफा हो सकता है। वजह यह है कि इसका निर्यात करने वाले देश इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की सोच रहे हैं। इस मामले में न तो विदेशी मुद्रा के बड़े-बड़े भंडार भी आपकी मदद नहीं कर सकते हैं और न ही रुपये में हाल के दिनों में आई मजबूती। जब आपको कोई मुल्क कोई खास सामान बेचने के लिए ही नहीं तैयार है तो आप उससे वह सामान कैसे खरीद सकते हैं?
तो क्या हालत बद से भी बदतर हो चुके हैं, जहां आज खतरा अमेरिकी मंदी से नहीं, बल्कि महंगाई से है? गौर से देंखे तो नहीं। खाद्यान्नों के साथ सबसे अच्छी बात तो यही है कि इसके उत्पादन में काफी कम वक्त लगता है। इस महंगाई को देखते हुए उम्मीद तो यही है कि आने वाले दिनों में ज्यादा जमीन पर खाद्यान्न की खेती होगी। जिससे इस पूरे क्षेत्र और दुनिया भर को राहत की सांस मिलेगी।