अरुणाचल प्रदेश में स्टीलवेल रोड सुना है? आपमें से कई पूछेंगे इस नाम की कोई सड़क भी है मुल्क में क्या? लेकिन हुजूर आपके अनजान होने से इस सड़क की ऐतिहासिक अहमियत कम नहीं होती।
स्टीलवेल रोड में एक अजीब सा जादू है, जो इतने सालों के बाद अब भी बरकरार है। इस सड़क की अपनी ऐतिहासिक दास्तान है जो कभी खत्म नहीं हो सकती है। इस सफर की शुरुआत में मैंने अपने आप से एक वादा किया था कि जितना संभव होगा मैं इस रास्ते की खोज करूंगा। इस सड़क की शुरुआत होती है असम की तराई में स्थित खादानों के शहर, लीडो से।
हम इस सड़क पर आ चुके हैं, इसका अंदाजा हमें लगा एक जंग लगी सूचना पट्टी से। ऐसा लग रहा था मानो वहां के गांवों में रहने वाले लोग-बाग 18वीं सदी में ही जीवन जी रहे हों। स्टीलवेल रोड पर मेरा पहला ठहराव था छठे मील पर। फानेंग के ताई अहोम और ताईसेक समुदाय के बड़े-बुजुर्गों ने लैंप की टिमटिमाती रोशनी में हमारा स्वागत किया।
वहां उन्होंने हमें लजीज खाने का दावत भी दिया, जिसका हमने खूब लुत्फ उठाया। उनलोगों ने इस सड़क की दास्तान सुनानी शुरू की। इनके पूर्वजों ने सड़क बनाने के लिए बांस का इंतजाम किया। सड़क के लिए काम करने वाले मजदूरों को खिलाने के लिए बहुत सारी गोभी का इंतजाम भी किया।
सुबह होते ही मैंने अपना सफर शुरू किया और आगे की ओर बढ़ने लगा। असम की सीमा के अंतिम शहर जागुन को पार करने के बाद मैं पटकाईबुम पर्वत के घने जंगलों की ओर बढ़ा। रास्ते में काफी चहल पहल भी दिखी। जंगलों में रहने वाले टंगसास समुदाय के लोग जागुन के बाजार में अपनी खरीदारी करने जाते हैं। खासतौर पर ये लोग चाय, चावल और गुड़ खरीदते हैं।
फिलहाल भारत में स्टीलवेल रोड का विस्तार अरुणाचल प्रदेश तक ही है। जयरामपुर के विधायक और अरुणाचल प्रदेश विधानसभा के स्पीकर सेतोंग सेना ने खराब मौसम के मद्देनजर अपनी महिन्द्रा बोलेरो गाड़ी और अपने एक निजी सहयोगी को गाइड के तौर पर मेरे साथ भेजने की पेशकश की।
नामपोंग के चौकी के पास आकर मुझे इसका अहसास हुआ कि मुझे इन सुविधाओं से क्या सहूलियत मिली हैं। बारिश का उफान जोर पर था और आगे का रास्ता कीचड़ से भर गया था। मजे की बात यह थी कि वह कीचड़ कम कं क्रीट और गोंद का मिश्रण ज्यादा था जो चारों तरफ चिपक सा गया था। आखिरकार हम सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुंच गए।
इतिहास के पन्नों पर हम नजर डाले तो हम पाएंगे की 1942 का साल बेहद भयानक था। उस वक्त पश्चिमी देशों के गठजोड़ के अभियान का निशाना जापान था जिसे बर्मा और चीन से बाहर करना था। अमेरिका के जनरल जोसेफ वारेन स्टीलवेल को जब दक्षिण एशिया के अमेरिकी अभियान के तहत चीन-बर्मा-भारतीय मोर्चे के कमांडर के तौर पर रखा गया था तब सारी चीजों ने एक नया रुख ले लिया। इसके साथ ही वे चीनी सेना के स्टाफ प्रमुख भी बनाए गए।
श्यांग-काई-शेक को असम जाने के लिए बाध्य कर दिया गया। चीनियों तक सामान पहुंचाने के लिए हवाई उड़ान की सहायता ली जा रही थी लेकिन यह साफ था कि एक नए जमीनी रास्ते की जरूरत भी थी। वर्ष 1942 में 1 दिसंबर को यह फैसला लिया गया कि आसाम के जंगली क्षेत्र लीडो से लेकर बर्मा के भामो तक एक नया रास्ता बनाया जाए। भामों में ब्रिटिशों का कब्जा था जहां से चीन के कुनमिंग तक रेलमार्ग की सुविधा भी थी।
तकरीबन 15 हजार अमेरिकी सैनिक, 35 हजार असम के मजदूर और भारी संख्या में चीनी सैनिकों ने इस सड़क पर काम करना शुरू किया जिसकी उस लागत थी 150 मिलियन डॉलर। सड़क का काम तो शुरू कर दिया गया था लेकिन जमीनी स्तर की जानकारी के लिए कोई नक्शा मौजूद नहीं था ताकि निर्माण कार्य में सहूलियत मिल सके।
सैनिकों और मजदूरों को भारत और चीन की सीमा पर स्थित पांगसाउ दर्रे के पास सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ी या यूं कहें कि काम करने में उनके दांत खट्टे हो गए। शायद यही वजह थी कि उन्होंने इस जगह का नाम दिया ‘हेलपास’ या ‘नरक दर्रा’। करीब 4,500 फीट की ऊंचाई पर बन रही सड़क के लिए 1 लाख क्यूबिक फीट प्रति मील की दर से मिट्टी की खुदाई करनी पड़ी।
उसके बाद मौत की झील के पास दलदली क्षेत्र में काम करना भी बेहद मुश्किल भरा अनुभव रहा। मेरे गाइड का कहना था कि जिन फौजियों ने इस घाटी को पार किया वे कभी वापस घर नहीं लौट सके। हालांकि उसकी इस बातों की सच्चाई साबित नहीं हो सकी।
जनरल जार्ज सी मार्शल ने 1 जुलाई 1943 से 30 जून 1945 तक की अपनी द्विवार्षिक रिपोर्ट में यह बात लिखी है कि उसने जनरल स्टीलवेल को सबसे मुश्किल काम का भार सौंपा था। बाद में मानसून के दौरान हुक्वांग घाटी से हवाई जहाज से गुजरते हुए लार्ड माउंटबेटन ने अपने स्टाफ से पूछा कि इस नदी का नाम क्या है।
उसके बाद उन्हें यह जानकारी दी गई कि यह नदी नहीं है बल्कि यह लीडो रोड है। बहरहाल बर्मा से 110 किलोमीटर अंदर शिंगबियांगमें निर्धारित समय से 3 दिन पहले ही 27 दिसंबर 1943 को पहला बुलडोजर पहुंच गया था।
कहा जाता है कि इस सड़क को बनाने के दौरान तकरीबन 11 सौ अमेरिकियों की मौत हो गई। दो चीनी नागरिकों के समाधि स्थल भी है लेकिन कितने स्थानीय लोग इस सड़क के निर्माण के दौरान मरे इसका कोई सबूत मौजूद नहीं है। हालांकि इसे जंग की रणनीतियों की खासियत ही कही जा सकती है कि उस समय तक स्टीलवेल का काम पूरा हो गया था।
अमेरिकी अभियान ‘आईलैंड हापिंग’ के तहत प्रशांत महासागरीय क्षेत्र से जापानी सेना के वर्चस्व को कम कर दिया गया। इसी वजह से इस सड़क का इस्तेमाल धीरे-धीरे कम होने लगा। इस सड़क पर कार से अंतिम यात्रा लीडो से मिटकियाना तक की आगे तक की गई । यह कहा जा सकता है 1955 में ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज यूनीवर्सिटी के ओवरलैंड एक्सपीडिशन के तहत कार से की गई यह अंतिम थी जिसका सबूत मौजूद है।
आज नरक दर्रे के पास केवल एक सीमा रेखा है जिसके जरिए इसकी पहचान होती है। हालांकि आप एक बोर्ड के जरिए तुरंत जान सकते है कि चीन का कुआनमिंग यहां से 1,676 किलोमीटर दूर है शायद नई दिल्ली से भी ज्यादा नजदीक। हो सकता है कि आप यहां की अगली यात्रा के बारे में सोचने लगें। बहरहाल स्टीलवेल की इस सफलता को बनाए रखने के लिए यहां पिछले दशक से ही इस सड़क में थोड़े बदलाव लाने की कोशिशें जारी है।
यह कोशिशें 1995 में सेतोंग सेना के चुनाव होने के बाद से ही शुरू हो गई। सेना तांगसा समुदाय से आते हैँ। उनका कहना है कि उन्होंने पांगसू दर्रे के जरिए कारोबार का सिलसिला फिर से शुरू करने का बीड़ा उठाया है। यह शुरूआत तब हुई जब भारत और म्यांमार के अधिकारी और भारतीय सेना इस दर्रे पर एक हफ्तावार बाजार लगाने के लिए समझौते की बातचीत करने के लिए जुटे। सेना कहते हैं कि सीमा पार लोगों के साथ भी हमारा पुराना रिश्ता है।
सीमा रेखा के दूसरी ओर स्टीलवेल रोड सिंगल लेन वाली कच्ची सड़क है जो शिंगबियांग से 30 किलोमीटर दूर तक जाती है। पार्टनरशिप फॉर डेवलपमेंट की कारिन जोढा फिशर कुछ ऐसे लोगों में से एक हैं जिन्होंने कुनमियांग से शिंगबियागं तक इस रास्ते पर यात्रा की है। इनका कहना है कि यह बेहद अदभुत यात्रा थी वह भी एक ऐसे देश में जहां सैनिक शासन है।
चीन के लोग काफी सहयोग कर रहे थे क्योंकि वे भी यह चाहते थे कि यह सड़क फिर से खुल जाए। वे लोग इस रोड को फिर से बनाने में अपनी मदद दे रहे हैं खासतौर पर मिटिकियाना के रास्ते के लिए। मिटिकियाना की सड़क रणनीति के लिहाज से बेहद खास है और यह रेल से भी जुड़ा है। यह इतिहास के पन्ने में दर्ज एक ऐसे जंग की जमीन है जहां जनरल स्टीलवेल ने जापानियों को निकाल बाहर किया था।
फिशर के मुताबिक इस रोड पर फिर से यातायात की बहाली से सिंगफो,कचिन और जिनपाओं समुदाय के लोगो के लिए इसकी भावनात्मक अहमियत है। इसकी वजह यह है कि ये सभी एक ही जाति से संबंध रखते हैं बस इनके बीच राजनीतिक सीमाएं खड़ी कर दी गई है। उनकी यह यात्रा उम्मीदों से परे बेहद आश्चर्य भरी थी। उन्होंने मिटिकियाना में एक सिख अप्रवासी समुदाय को भी देखा जो यहां हिन्दुस्तान यूनीलिवर के सेल्समैन है।
इसके अलावा उनकी मुलाकात हॉलीवुड के निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग की प्रोडक्शन टीम से भी हुई जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के गाडियों की खोज कर रहे थे जो उनके मुताबिक अब भी चलने लायक है। राष्ट्रीय राजमार्ग विकास प्राधिकरण (एनएचएआई) ने जब राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-153 का नक्शा तैयार किया तब यह स्टीलवेल रोड को पूरा करने की दिशा में पहला कदम था।
इसके लिए साप्ताहिक ट्रायल तय किया गया जो बाद में पाक्षिक हो गया और हर महीने की 15 और 30 तारीख को यह ट्रायल होने लगा। लेकिन सेना का कहना है कि दोनों ओर के लोगों ने साप्ताहिक बाजार की शुरुआत कर दी है। यहां तक कि बर्मा के लोग लेन-देन के लिए भारतीय मुद्रा का प्रयोग करते हैं। हालांकि इस साप्ताहिक बाजार के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। 1970 में व्यापार को रोका दिया गया था।
सेना का कहना है कि बर्मा के लोगों के पास बेचने के लिए काफी चावल हुआ करता था। लेकिन अब वे आयोडीन नमक, स्टील, साइकिलें, उपभोक्ता वस्तुऐं, किताबें और साइकिल मशीन खरीदा करते हैं। बर्मा के लोगों का मानना है कि भारत में बने इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, चीन में बने उत्पादों की तुलना में बेहतर हैं।
साधारण कारोबार के अलावा स्टीलवेल रोड महत्वाकांक्षी एशियाई राजमार्ग नेटवर्क परियोजना के पूर्वी भारत के प्रवेश द्वार के तौर पर भी उभर रहा है। इस सहभागी परियोजना के जरिये एशिया के कई देशों को सड़क मार्ग से जोड़ने की योजना है। संयुक्त राष्ट्र ने 1959 में एशिया में राजमार्गों की दशा सुधारने के लिए एशिया प्रशांत क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग(ईएससीएपी) के जरिये इस अभियान की शुरुआत की थी।
लेकिन 1975 तक आते-आते वित्तीय समस्याओं और भू-राजनीति के चलते यह योजना खटाई में पड़ गई। इसके बाद 1992 में इस योजना में फिर से नई जान आई और इसके एक दशक बाद नवंबर 2003 में कई देशों की सरकारों के बीच एक समझौता हुआ। इस योजना के तहत 32 सदस्य देशों के बीच 55 रूटों की पहचान की गई और 1,40,000 किलोमीटर सड़क बनाने पर सहमति बनी।
अप्रैल 2004 में 23 देशों के बीच एक समझौता हुआ जिसमें भारत भी शामिल है। अब इस परियोजना से जुड़े देशों की संख्या घटकर 28 रह गई है। ईएसपीएसी के आंकड़ों के मुताबिक इस परियोजना पर 2007 तक लगभग 1,000 अरब रुपये खर्च हो चुके हैं जबकि इसको पूरा करने करने के लिए अभी तकरीबन 520 अरब रुपये की और दरकार है।
मणिपुर में मोरे और तामू को पूर्वी भारत में द्वार के तौर पर चिह्नित किया जा रहा है। दरअसल 1995 की एक संधि के चलते यहां से थोड़ा-बहुत कारोबार चलता रहा है। लेकिन स्टीलवेल रोड दो वजहों से आकर्षक बनता जा रहा है। पहली तो यह कि इसके जरिये दूरी बहुत कम रह जाती है (चीन और थाइलैंड भी इसका समर्थन करते रहे हैं) और यहां पर राजनीतिक स्थिरता भी है क्योंकि यहां एक ही राजनीतिक वर्ग का दबदबा है।
विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता का कहना है कि हमें असम और अरुणाचल सरकार से प्रस्ताव मिले हैं। उनका कहना है कि हम इसके पक्ष में हैं लेकिन म्यांमार सरकार को भी तो बुनियादी ढ़ांचे और सुरक्षा के मुद्दे पर कुछ कदम उठाने होंगे। मणिपुर को इससे थोड़ी निराशा जरूर हाथ लगी हैऔर वह लाभकारी व्यापार पोस्ट बनाने के लिए लॉबिंग कर रहा है।
इस प्रतिस्पर्धा को समझते हुए अरुणाचल सरकार इसको गंभीरता से ले रही है। राज्य के लोक निर्माण विभाग ने पांगसाउ दर्रे तक के दो लेन वाले राजमार्ग पर काम करना भी शुरू कर दिया है। तकनीकी रूप से यह सीमा सड़क संगठन के दायरे में आता है। इसके अलावा कम कीमत वाले व्यापारिक केंद्र के अलावा ट्रकों की पार्किंग और कंटेनर डिपो पर भी काम चल रहा है।
म्यांमार सरकार ने भी शिंगबियांग तक की सड़क की मरम्मत के लिए भारत से सहायता की गुहार लगाई है। सेना का कहना है कि यह भारत और म्यांमार का द्विपक्षीय मामला है लेकिन उसको उम्मीद है कि 2009 तक व्यापार शुरू हो जाएगा। यदि किसी वजह से यह योजना लटकती है तो वह सुरक्षा से जुड़ी हुई ही होगी।
भारत और बर्मा दोनों देशों की सीमाओं पर जंगल है जो अलगाववादियों के लिए छुपने की मुफीद जगह हैं। लेकिन इस योजना के समर्थकों का मानना है कि व्यापार शुरू होने से यह समस्या भी हल हो सकती है।
सीमा सड़क संगठन के पूर्व महानिदेशक ई एन राममोहन इस योजना के बड़े समर्थकों में से एक हैं, उन्होंने 2005 में इस विषय में एक पत्र भी लिखा है। अब स्टीलवेल रोड की बात करें। बरसात रुक चुकी है। चाहे थोड़े समय के लिए ही रुकी हो। यहां पर सूरज कभी कभार ही दर्शन देता है। मैं सड़क मार्ग से चीन तक की यात्रा के बारे में कल्पना कर रहा हूं।
भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच व्यापार का लेखा-जोखा
देश – निर्यात – आयात
चीन – 27,259.97 – 80,206.52
थाईलैंड – 5,055.62 – 6,947.42
सिंगापुर – 20,743.64 – 22,708.93
मलेशिया – 6,313.89 – 18,023.62
म्यांमार – 498.31 – 2,409.20
वियतनाम – 1,802.30 – 498.66
कंबोडिया – 143.91 – 3.11
लाओस – 11.84 – 0.31
(अप्रैल-दिसंबर 2007 के आंकड़े करोड़ रुपये में वाणिज्य विभाग के साभार से)