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यह है ड्रैगन का अनदेखा, अनजाना चेहरा

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 06, 2022 | 9:01 PM IST

चीन का नाम सुनते ही कैसी छवि आपके दिमाग में बनती है? एक ऐसा देश की, जो तरक्की की सीढ़ियां तो काफी तेजी से चढ़ रहा है, लेकिन आज भी वहां ड्रैगनों के किस्से खूब सुनाए जाते हैं।


एक ऐसा मुल्क जिसके रहने वाले सूटबूट पहनना काफी पसंद करते हैं, लेकिन वहां आज भी कूफूं का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है। वैसे, आज हम आपको रूबरू करवाएंगे कंफ्यूसियस के इस वतन के एक अनजाने और अनदेखे चेहरे से। सिर्फ चेहरे ही नहीं, उसकी तहजीब भी चीन की संस्कृति से काफी जुदा है।


वह काफी दिक्कत से चीनी बोल पाता है। पठानी कपड़ों में चीन का यह दूसरा चेहरा आपको मिलेगा गलियों में कबाब बेचते हुए, जो किसी भारतीय चेहरे को देखते ही चिल्ला उठता है ‘आमिर खान’। यह अनोखा चीनी चेहरा थिरकता है बॉलीवुड के डिस्को गानों पर। अगर ज्यादा उत्साहित हुआ तो वह आपसे अरबी में कुछ बातें भी कर लेगा। वह शंघाई की चमकदार गलियों में नहीं, बल्कि चीन के उथल-पुथल वाले पश्चिमी प्रांत शिंजियांग में बसता है।


यह चेहरा है चीन के यूगुरों का। चीन के शिंजियांग यूगुर स्वायत्तशासी क्षेत्र में रहने वाले यह लोग कबाबवाले और कबुलीवाले का पेशा अपनाकर अपना गुजर-बसर चलाते हैं। इन लोगों से आप कबाब और मेवे के साथ-साथ कई ‘रोचक’ चीजें भी खरीद सकते हैं। इन चीजों में हशीश भी शामिल है।


कितने पास, कितने दूर


ज्यादातर लोगों को लगता है कि चीन में एक तरह के लोग रहते हैं और उन सभी की तहजीब एक ही है। सभी 5000 साल पुराने चीनी इतिहास से जुड़े हुए हैं और सभी एक ही जुबान बोलते हैं। माना कि इस मुल्क में 90 फीसदी से ज्यादा लोग हान समुदाय के हैं, लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी यहां 55 अलग-अलग तरह अल्पसंख्यक समुदाय भी रहते हैं। उन सभी की संस्कृति अलग है, भाषा है और तो और परंपराएं भी अलग हैं।


इस हकीकत को जान लेने के बाद चीन का एक नया चेहरा नजर आता है न। यह चेहरा काफी रंग-बिरंगा और कुछ हद तक परेशान करने वाला भी है। इस नए चीनी चेहरे का सबसे विवादित हिस्सा है चीनी तुर्की मुस्लिमों का, जिसके बारे में काफी कम लोग जानते हैं। यही हैं शिंजिआंग के यूगुर। ये लोग चीन की कुल क्षेत्रफल के छठे हिस्से पर बसते हैं।


हालांकि, तिब्बत की आग चाहे-अनचाहे भारत में ज्यादा जल्दी पहुंच जाती है। कारण कई लोगों हो सकते हैं,लेकिन शिंजिआंग के रणनीतिक रूप से अहम और संसाधनों से भरे-पूरे इस हिस्से के बारे में काफी कम जानकारी मिल पाती है, जिसे चीन में काफी पहले से ही विवादों में रहने वाले हिस्से के तौर पर जाना जाता है।


नया इलाका


शिंजियांग का चीनी भाषा में मतलब होता है ‘नया इलाका’। यह चीन के पांच अल्पसंख्यक स्वायत्तशासी क्षेत्रों में से एक है। यह चीन के उत्तर-पश्चिमी सीमा के पास एक ऐसी जगह स्थित है, जहां मिलन होता है छह अलग-अलग तहजीबों का। ये छह तहजीबें हैं, रूस, मध्य एशिया (कजाखस्तान और ताजिकस्तान), मंगोलिया, भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान), तिब्बत और चीन की।


जाहिर सी बात है,   अपने आस-पड़ोस के सांस्कृतिक प्रभावों और इतिहास का असर तो उस पर पड़ेगा ही पड़ेगा। इस प्रांत में 100 या 200 नहीं, पूरे 23 हजार पंजीकृत मस्जिदें हैं। इसकी जमीन पर भी शिंजियांग के आस-पड़ोस का भी असर काफी दिखाए देता है।


यहां आपको बड़ी-बड़ी चट्टानों के साथ-साथ रेत के टीले भी आपको मिल जाएंगे। शायद इसीलिए चीन में तो इसे ‘लुओहो’ और ‘लुआन’ के नाम से जाना जाता है। जानते हैं, इनका मतलब क्या है? इसका मतलब है, ‘पिछड़ा हुआ’ और ‘अस्त व्यस्त’।


विवादित इतिहास


चीन का इस इलाके पर दावा का काफी पहले से ही काफी विवादित और खून-खराबे से भरा रहा है। पहले इस इलाके पर अंग्रेजों का असर हुआ करता था, लेकिन 20 शताब्दी की शुरुआत में ये इलाका रूसी दबदबे की गिरफ्त में आ गया। सरकारी तौर पर इस इलाके को 1949 में चीन ने इसे इलाके को ‘आजाद’ करवाया। करीब एक सदी तक इसकी सीमा सोवियत रूस से मिलती रहीं।


आज शिंजियांग में करीब दो करोड़ लोगबाग रहते हैं। इनमें 47 फीसदी यूगुर हैं, जबकि बाकी में हुई, कजाक, मंगोल और दौड़ रहते हैं।  यूगुर, चीन की बहुसंख्यक आबादी हान से काफी अलग हैं। वे हनाफी संप्रदाय के सुन्नी मुस्लिम हैं, जो पांच वक्त नमाज पढ़ने में यकीन रखते हैं। साथ ही, तुर्की की भाषाओं को बोलते हैं और अरबी लिपि का इस्तेमाल करते हैं।


चीनी तो इन लोगों के लिए काफी मुश्किल भाषा है। उनके आस-पड़ोस के देशों में रहने वाले यूगुरों के साथ भी करीबी संबंध हैं। तकरीबन 1,85,000 यूगुर कजाखस्तान में रहते हैं।  इनके चीन से ज्यादा करीब नस्लीय, ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध तो मध्य एशिया के साथ हैं। मध्य एशिया के करीब छह करोड़ लोग तुकी मुस्लिम हैं। इसी वजह से तो कुछ साल पहले तुर्की के प्रधानमंत्री सुलेमान देमेरियल ने यहां तक कह दिया था कि,’तुर्की का दबदबा तो अरब से लेकर चीन की दीवार तक है।’


दीवार के पीछे की घुटन


लेकिन यूगुरों को तो इस महान दीवार के भीतर काफी घुटन महसूस होती है। उन्हें इस दीवार और अपने मुल्क के साथ जोड़े रखना चीनी सरकार के लिए कोई आसान काम नहीं है। शिंजियांग सोच और हकीकत में चीन से काफी दूर है। चीन की राजधानी बीजिंग से इस प्रांत की राजधानी की दूरी पूरे 3800 किमी की है।


दुनिया के टाइम जोन के हिसाब से शिंजियांग बीजिंग से आधे या एक नहीं, पूरे दो घंटे पीछे है (वैसे, आधिकारिक तौर पर पूरे चीन में एक समय चलता है)। दोनों तो इस बात पर भी सहमत नहीं हो पाते कि दोनों एक दूसरे जुड़ कैसे गए। चीनी तो इस बारे में काफी रूमानी कहानियां सुनाते हैं। उनका दावा है कि 18वीं सदी में फ्रैगनैंट कॉनकुबिन चीन के सम्राट की सबसे प्यारी दासी थी, जो शिंजियांग से ताल्लुक रखती थी।


सम्राट की इस मोहब्बत की वजह थी कॉनकुबिन की मदहोश कर देने वाली खुशबू। लेकिन यूगुरों का दावा है कि वह सम्राट से मोहब्बत नहीं, नफरत करती थी। इसी वजह से तो वह हर वक्त हथियारबंद रहा करती थी कि अपनी सहूलियत के हिसाब से सम्राट का कत्ल कर सके।


स्वार्थ हो रहे हैं पूरे


चीन ने इस प्रांत को अपनी मुख्यधारा में शामिल करने की काफी कोशिशें कीं। उसकी आर्थिक और राजनैतिक एकीकरण की इसी जबरदस्त कोशिश का एक नमूना है शिजियांग प्रोडक्शन एंड कंस्ट्रक्शन कर्ॉप्स। पीसीसी नाम से विख्यात इस ईकाई में हिस्सा है चीन की कम्युनिस्ट पार्टी, चीनी सरकार और वहां की फौज का।


वैसे, आलोचकों की मानें तो इसने 1949 के बाद इस इलाके में एक भयंकर दमनचक्र चलाया था।  आज इस इलाके को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार दे रही है मोटी सब्सिडी, जो वहां आती है पीसीसी के रास्ते से। बीजिंग ने पिछले कुछ सालों में उस इलाके को भर दिया है फैक्टरियों और औद्योगिक प्लांटों से। साथ ही, इसे संचार लाइनों से भी अच्छी तरह से जोड़ दिया है। साथ ही, इस इलाके के बुनियादी ढांचे को भी काफी अच्छे तरीके से विकसित किया गया है।


सरकार की मानें तो यह सबकुछ किया गया है, इस इलाके के विकास के लिए। लेकिन हकीकत तो यह है कि वह इस संसाधानों से भरे हुए इलाके का पूरा इस्तेमाल करना चाहती है। वैसे, इस काम से उसे मोटा मुनाफा भी मिल रहा है। आज की तारीख में ऊर्जा के लिए भूखे चीनी उद्योग-धंधे शिंजियांग के कोयले, प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं।


इस प्रांत का उत्तरी हिस्सा तो कमोबेश ड्रैगन के साथ हाथ मिला चुका है, लेकिन असल दिक्कत तो प्रांत के दक्षिण पश्चिमी हिस्से में है। इस दिक्कत की असल वजह है इस इलाके की पाकिस्तान, अफगानिस्तान और भूतपूर्व सोवियत संघ के हिस्सों से उसकी नजदीकी।


किसे मिल रहा है फायदा


एक ओर जहां यह प्रांत पूरे चीन का भरन-पोषण कर रहा है, वहीं इसके आलोचकों का आरोप है कि ये ही अपने भरन-पोषण के लिए चीन पर निर्भर है। हालांकि इस बात में कोई दो राय नहीं है कि सरकारी सब्सिडी के जरिये इस सूबे को काफी मदद पहुंचाई गई है, लेकिन इस बात को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि इसका फायदे असल में मिल किन लोगों को रहा है।


इसके अलावा आबादी के ट्रासंफर का मुद्दा भी काफी विवाद है। यह ऐसा मसला है, जिसके खिलाफ तिब्बती भी अपनी आवाज उठाते रहते हैं। आलोचकों का आरोप है कि इस प्रांत के बड़े भूभाग का इस्तेमाल निर्वासित, बेरोजगार और आवारा लोगों और विकास के लिए चल रही परियोजना के मद्देनजर विस्थापित लोगों को बसाने में किया जा रहा है। इस नीति ने राज्य की जातीय संरचना को बदलकर रख दिया है और इस वजह से यहां के लोगों में काफी गुस्सा और रोष है।


मशहूर चीनी विशेषज्ञों डोनाल्ड मैकमिलन, इमली हानम और निकोलस बेक्वीलीन के मुताबिक, 1949 में इस राज्य की कुल 42 लाख आबादी में 90 फीसदी गैर-हेन लोग थे और हेनों की तादाद महज 7 फीसदी के आसपास थी। 1978 तक आते-आते यह आबादी बढ़कर 41 फीसदी तक पहुंच गई।


हालांकि इस बाबत 1990 के आकंड़ों के मुताबिक, हेनों की आबादी इससे थोड़ी कम 37.5 फीसदी थी। आधिकारिक अनुमानों में कहा जा रहा है कि जन्मदर में कमी के कारण यह आबादी घटकर 25 फीसदी तक पहुंच जाएगी।


ड्रैगन की चुनौती


शिंजियांग की लोकेशन काफी अहम होने के वजह से इस प्रांत को नजरअंदाज करना र्कतई मुमकिन नहीं है। इसका ऊपरी भाग मध्य एशिया सीमाओं से सटा है। इसके अलावा यहां तेल, कोयला और गैस का भी काफी भंडार है, जो ऊर्जा की कमी झेल रहे देश चीन के लिए बहुत अहम है।


हाल में हमें चीन-किरगिस्तान-उजबेकिस्तान रेलवे लाइन बनाए जाने की खबरें भी सुनने को मिली हैं।यह लाइन दक्षिणी शिंजियांग से होकर मध्य एशिया तक जाएगी। इसके 2010 में पूरा हो जाने की उम्मीद है। यह रेल लाइन तेल व्यापार के लिए रास्ते का काम करेगी।


जहां चीन ने सीमा पार व्यापार और संचार तंत्रों और क्षेत्रीय सहयोग (शंघाइ सहयोग संगठन) के जरिये इस्लाम और मध्य एशिया के प्रभावों को कम करने की कोशिश की है, वहीं सीमा पार से बढ़ता सहयोग ड्रैगन के लिए एक चुनौती बनता जा रहा है। इस इलाके में स्थित चीन के सहयोगी देशों से तेल के प्रवाह के साथ-साथ धीरे-धीरे इस्लाम और संस्कृति का प्रवाह भी यहां पहुंच रहा है।


उथल-पुथल का दौर


इस पृष्ठभूमि को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस राज्य में अक्सर उथलपुथल की घटनाएं होती रहती हैं। हालांकि कभी इसकी भनक लोगों को लग जाती है और कई बार इस बारे में पता नहीं चल पाता। शिंजियांग अब भी पूर्वी तुर्किस्तान की गतिविधियों को अंजाम देने के लिए काफी मुफीद जगह है।


यह इलाका मुस्लिम आजादी के लिए कम समय तक चलने वाले 2 छोटे आंदोलनों के लिए जाना जाता है। ये आंदोलन 1912 और 1949 में हुए थे। इसके अलावा हाल में 1997 में आजाद मुस्लिम मुल्क की मांग को लेकर यहां काफी विरोध-प्रदर्शन हुआ था। यहां होने वाले जातीय उथलपुथल को सरकारी रहनुमा अपनी सुविधा के हिसाब से इस्लामिक जद्दोजेहद की संज्ञा देते हैं।


‘अलगाववादियों’ पर की जाने वाली सख्त कार्रवाई को अक्सर पूर्वी तुर्किस्तान पर कार्रवाई के रूप में देखा जाता है और इस वजह से प्रांत में निगरानी और नियंत्रण का काम हमेशा चालू रहता है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि सीमा पार से घुसपैठ की वजह से गुप्त संगठनों की तादाद में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन चीनी विद्वान इसके लिए अपने दोषपूर्ण नीतियों और अन्य गड़बड़ियों को जिम्मेदार मानते हैं।


उनके मुताबिक, नस्लीय आधार पर सत्ता के बंटवारे और इस प्रांत की अलग पहचान संबंधी मुद्दों का हल निकालने की सख्त जरूरत है। ओलंपिक शुरू होने में काफी कम दिन बचे हैं और चीन तलवार की धार पर खड़ा है। ऐसे में सबकी निगाहें चीन पर हैं और कयास लगाए जा रहे हैं कि उसे कहीं तिब्बत मामले की तरह एक और दुर्घटना का सामना न करना पड़े।


अनोखी झांकी


बाहर से देखने पर तो सब कुछ सामान्य नजर आता है। लेकिन विरोध की एक झांकी आपको यूएआर से काफी दूर चीन के पूर्वी तट पर शंघाई में हमेशा से लोकप्रिय रहा यूगुर रेस्तरां में मिल जाएगी। शंघाई के बीचोंबीच बना यह रेस्तरां में यूगुर की शानदार विरासत की याद दिलाता है। यह यूगुर की रंगीन विरासत की झांकी पेश करता है।


चीन के विरोध को असंभव बनाते हुए यह रेस्तरां अन्य चीजों के अलावा उस चीज को बेचने में भी जुटा है, जो सबसे ज्यादा बिक सकती हैं- अल्पसंख्यक संस्कृति की झांकी।
रेस्तरां के पीछे एक लड़का गाना गाता हुआ नजर आता है, जो अपने एक्सेंट में मंदारिन भाषा में डांस के अनिच्छुक लोगों को भी डांस फ्लोर पर बुला रहा है।


मानो वह कह रहा हो कि हम भले ही चीन का हिस्सा हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि हम चीनी हैं। आप इस बात को पसंद करें या नहीं, इसे आपको स्वीकार करना ही होगा।

First Published : May 3, 2008 | 12:21 AM IST