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आपके मोबाइल पर मंडराता खतरा

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 9:00 AM IST

रक्षिता कोलस्कर (वास्तविक नाम नहीं) हाल ही में एक एसएमएस पाकर बेहद आश्चर्यचकित थीं। इस एसएमएस के जरिए यह बताया गया कि वह 12.5 करोड़ रुपये के ईनाम के साथ शेल इंटरनेशनल मोबाइल ड्रॉ की विजेता हैं।


यह भी सूचना दी गई कि उन्हें अपनी ईनामी रकम के लिए इंटरनेशनल नंबर पर कॉल करना होगा। जब उनकी खुशी और उत्साह थोड़ा कम पड़ा तो उन्होंने याद करने की कोशिश की कि कभी उन्होंने शेल प्रोडक्ट या सर्विस का इस्तेमाल किया था या नहीं, जैसा कि एसएमएस में कहा गया था। बहुत जल्द ही उन्होंने यह महसूस किया कि उसने तो ऐसा कभी किया ही नहीं था।

जब उन्होंने फोन किया तो शेल के अधिकारियों ने यह बताया कि इस तरह के अवॉर्ड की उन्होंने कोई घोषणा ही नहीं की है। अब वह सोचने पर मजबूर हो गई कि यह एसएमएस कहां से आया? आपका स्वागत करते हैं विशिंग की दुनिया में जहां आवाज के जरिए हैकर लोगों को ठगते हैं। ये हैकर वॉयसओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल, एसएमएस और इंटरनेट के जरिए लोगों को बेवकूफ बनाकर उपभोक्ताओं को कुछ आर्थिक लाभ पाने का लालच देते हैं। उन्हें जरूरी जानकारी पाने के लिए फोन करने का निर्देश दिया जाता है।

कोलस्कर के केस में भी मोबाइल स्पैम और विशिंग का इस्तेमाल भी इसीलिए किया गया था कि उपभोक्ता उन्हें फोन करें। इस तरह के फिशिंग से जुड़े मामले तकरीबन 2.8 बिलियन तक है। गार्टनर के मुताबिक वर्ष 2006 में केवल एक आदमी को 1,244 डॉलर और 2005 में 257 डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा था। रिपोर्टों के मुताबिक इस साल की शुरुआत से ही बैंकों में फिशिंग की घटनाएं बढ़ रही हैं। दुनिया में पहली बार 2006 में विशिंग जैसी घटनाओं की शिकायत दर्ज कराई गई थी लेकिन ऐसी घटनाएं काफी बढ़ रही हैं।

इस साल से पहले एफबीआई के इंटरनेट क्राइम सेंटर का कहना था कि इन्हें कई तरह की विशिंग की रिपोर्ट मिल रही है। कई लोगों को ऐसा लगता है कि इस तरह की घटनाएं भारत में भी हो रही हैं। प्रत्येक महीने लगभग 80 लाख लोग यहां ग्राहक बनते हैं और एसएमएस करने वालों की भी बहुत बड़ी संख्या है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय उपभोक्ताओं को निशाना बनाना बेहद आसान हो सकता है।

एशियन स्कूल ऑफ साइबर लॉ के प्रेसीडेंट रोहस नागपाल का कहना है कि इस तरह की घटनाएं सामाजिक संरचना पर हमला करने जैसा है जिसका इस्तेमाल बाद में धोखाधड़ी के काम में किया जाता है। शायद इसके जरिए ही विशिंग के लिए सारी चीजें तय कर ली जाती हैं। उन्हें यकीन है कि अगर इस तरह की धोखाधड़ी नेट पर हो रही है तब उसका हल भी मौजूद है। यानी ग्राहक उस खास साइट को पहचान सकते हैं। विशिंग के मामले में यह बेहद मुश्किल हो जाता है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसे देश में टेलीकॉम ऑपरेटर से डाटाबेस बड़ी आसानी से मिल जाता है जिसके कारण से ही इस तरह की घटनाएं होती हैं। एक सुरक्षा विशेषज्ञ कहते है, ‘अगर आप नई दिल्ली में नेहरू प्लेस में जाते हैं तो आप कुछ हजार रुपये खर्च करके मोबाइल नंबर का डाटाबेस पा सकते हैं।’ कई लोग इस बात की जरूरत महसूस करते हैं कि कानून को थोड़ा और कड़ा होना चाहिए। भारत में मैकएफी के क्षेत्रीय निदेशक कार्तिक साहनी का कहना है, ‘सभी को पता है कि नेटवर्क ऑपरेटर इस तरह के डाटाबेस बेचते हैं। प्रत्येक ग्राहक  से होने वाली औसत कमाई से संबंधित डाटा भी कोई पा सकता है।

भारत में दूसरे लोगों को डाटाबेस मुहैया कराने का नियम कानून भी काफी कमजोर है।’ आर ऐंड एच सिक्यूरिटी कंसल्टिंग के सीइओ और प्रेसीडेंट और व्हाइट हाउस में साइबरस्पेस सुरक्षा के पूर्व विशेष सलाहकार हॉवर्ड शिमिडिट ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि जैसे-जैसे मोबाइल का इस्तेमाल बढ़ेगा वैसे वैसे इनके लिए सुरक्षा का मसला भी उठेगा ही। समस्या यह है कि इसका हल मौजूद है लेकिन लोग इसका इस्तेमाल नहीं करता है। ट्रेंड माइक्रो के सार्क और भारत के कंट्री मैनेजर नीरज कौशिक कहते हैं कि विशिंग अभी अपने शुरूआती दौर में है। बहुत कम ऐसे ऑपरेटर हैं जो सिक्यूरिटी सॉल्यूशंस को मुहैया कराते है जिससे मोबाइल हैंडसेट पर इस तरह के स्पैम पर नियंत्रण किया जा सके।

First Published : July 2, 2008 | 10:23 PM IST